यकीन मानिए जिस रोज रुचिका गिरहोत्रा मामले के प्रमुख अभियुक्त एसपीएस राठौर के गाल पर उत्सव ने चाकू घुसाया, उस रोज मैं बहुत रोया। इतना कि अपने बाबा के मरे पर भी नहीं रोया था। फिर सोचा चलो छोड़ो- दिल तो बच्चा है जी। कभी-कभी ऐसा हो जाता है लेकिन चार दिन बाद जब श्रीराम सेना के अगुआ प्रमोद मुथालिक के मुंह पर कालिख पोती गई तो फिर नहीं रहा गया।
ऐसा नहीं है कि मुझे राठौर या मुतालिक से खास हमदर्दी है, इसलिए रोया। मैं इसलिए रोया कि इस यंगिस्तान में कब तक ऐसा चलता रहेगा? मैं रोया इसलिए कि हमारी न्यायव्यवस्था हमें रुला रही है और मैं रोया इसलिए कि क्यों हम जैसे युवा खूनी उत्सव मनाने को मजबूर होते हैं? क्या इस मुल्क में एक तय समयसीमा में कोई न्याय की उम्मीद कर सकता है? कायदे से राठौरों या मुतालिकों को दंडित करने का काम न्यायालय या पुलिस का है लेकिन उन पर हमें अब भरोसा नहीं रहा। अपनी न्यायव्यवस्था की असलियत तो देखिए। जिस राठौर या मुतालिक पर सरेआम मुकदमे दर्ज हैं, जिन पर अपराध के तमाम सबूत मौजूद हैं, उन्हें तो छुट्टा घूमने दिया जा रहा है और भावावेश में आपा खो चुका उत्सव सलाखों के पीछे है।
यहां उत्सव का बचाव करना भी अपना उद्देश्य नहीं है। जो भी कानून अपने हाथ में लेता है, जितना जल्दी हो सके उसे दंड मिलना चाहिए लेकिन इस जल्दी में बड़ी मछलियां क्यों लहरों के साथ अठखेलियां करती रहती हैं? यह सवाल बड़ा है। कोई माने या न माने, अपना दिल तो साफ-साफ कहता है कि इस मुल्क में अब युवा क्रांति को कोई नहीं रोक सकता। देरी जो भी हो, वह होकर रहेगी क्योंकि अब यह भी तय है कि इस कलियुग में कोई ईश्वरीय अवतार होने से रहा। देश और समाज को बचाना है तो युवाओं को ईश्वरीय अवतार लेना ही होगा। वह होगा, संभल जाओ दानवों!
Saturday, February 13, 2010
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

पता नहीं इस पर आपकी क्या उम्मीद थी, कि पाठक गंभीर चिंतन में चला जाएगा या फिर हँसेगा..पर मुझे हंसने वाला रास्ता ज्यादा उचित लगा..पता नहीं किस युवा क्रांति कि बात हो रही है...युवा जो भेड़ संस्कृति का हिस्सा है...जो अपने आचरण और व्यवहार कि दिशा के लिए भी कि टी.वी. चैनल या सितारों पर निर्भर है, उससे कौन सी क्रांति कि उम्मीद है...देश में कितने ही राठौर और मुथालिक घूम रहे हैं..और कितने उन्ही युवाओं में जिनसे आप क्रांति कि उम्मीद लिए बैठे हैं में भी शामिल हैं...गरीबी और भूख से भरे भारत में छद्म-भौवतिक्तावाद का खुला नंगा नाच चल रहा है, आजादी के ६० साल बाद भी मुझे नहीं याद कभी रोटी-कपड़ा-मकान मुद्दारहे हों, और बड़ी आसानी से १% लोग मीडिया भी जिसका हिस्सा है बाकी ९९% लोगों को ये बताने में सफल हैं कि उन्हें कब क्या कैसे करना है..बाजारवाद का जमाना है जी, और देश का युवा भी उसी सिस्टम में है, उससे पता है कि पेप्सी पीने के बाद ये दिल मांगे मोर...ये क्रांति-वान्ति में उसके लिए कुछ रखा नहीं है...और अगर बात-बात पर आपका हाथ उठ जाए तो आपकी खोपड़ी में कुछ प्रॉब्लम है...आपको क्रांति नहीं खोपड़ी के तेल कि जरूरत है...सपने बीक रहे हैं साहब सब तरफ किसके पास टाइम है शौपिंग से...
ReplyDelete