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Thursday, April 14, 2011

अन्ना के बहाने

सोचा था कि लिखने-पढ़ने का कोई फ़ायदा नहीं है, 'मगर दिल है कि मानता नहीं.' भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन लोकपाल विधेयक की मांग को लेकर अन्ना हजारे के आंदोलन के बाद कुछ लिखने को मज़बूर हूँ.
दरअसल, बहुत पहले इसी ब्लॉग पर एक पोस्ट की थी-  उस दिन मैं बहुत रोया. पोस्ट हरियाणा के चर्चित रुचिका गिहरोत्रा मामले को लेकर थी, उस मामले में कोई उत्सव नाम के युवक ने डीजीपी एसपीएस राठोर के गाल पर छुरा घोंप दिया था. मैंने लिखा था कि इस देश में युवा क्रांति को कोई नहीं रोक सकता. तब सात समंदर पार रह रहे मेरे बहुत करीबी दोस्त आशीष ने कमेन्ट किया था कि आप जज्बाती हो गए हैं और मैं मन मसोसकर चुप रह गया था. तब मुझे लगा था कि वह भी एक किस्म का भ्रष्टाचार है, जिसमें एक दबंग किस्म का पुलिस अधिकारी अपने धन-बल के दम पर दम भर रहा है और एक युवा उसे बर्दाश्त नहीं कर पा रहा.
बहरहाल, मैं मुद्दे पर लौटता हूँ. अन्ना हजारे ने जंतर-मंतर पर भ्रष्टाचार के खिलाफ़ अनशन किया तो उनके सपोर्ट में उतरे लोगों में आधे से ज़्यादा युवा थे और युवा ऐसे नहीं जो निठल्ले या आवारा किस्म के रहे हों. उनमें ज़्यादातर उच्च शिक्षा प्राप्त थे. इतना ही नहीं, जब मिस्र में हुस्ने मुबारक़ के खिलाफ़ वहां जन क्रांति हुई, तो मैंने फेसबुक पर नोट्स लिखा कि भारत में मिस्र क्यों नहीं हो सकता? मगर मेरे दोस्त को तब भी हैरानी हुई. अब अन्ना का आंदोलन सबके सामने है. यहाँ सवाल किया जा सकता है कि हासिल क्या हुआ? मगर ये काफ़ी नहीं कि देश के कोने-कोने में इस आंदोलन को अप्रत्याशित जन-समर्थन मिला और उसमें भी युवकों की बड़ी फौज़ थी.
भ्रष्टाचार के खिलाफ़ अन्ना के आंदोलन को लेकर तमाम तरह के तर्क-कुतर्क हैं और आए दिन वो सामने भी आ रहे हैं. जो लोग इसे वाहियात बता रहे हैं, उनमें अधिकाँश राजनेता हैं. नाम देखिए- दिग्विजय सिंह, कपिल सिब्बल, सलमान ख़ुर्शीद, एच डी कुमारस्वामी वगैरह-वगैरह... दिग्विजय ने तो चुनौती भी दे डाली कि अन्ना चुनाव जीतकर दिखाएँ और इनके पास आंदोलन करने के लिए धन कहाँ से आता है? अब इस चोट्टे दिग्विजय को कौन बताए कि 73 साल का ये जवान एक झोला लेकर चलता है और जहाँ भी अनशन में में बैठता है, दस-पांच रूपए से ही उसका झोला भर जाता है. उसे आदत ही नहीं है शिक्षाकर्मियों की भर्ती में करोड़ों डकार लेने की. समझ में नहीं आता कि इस तरह के हाईकमान के चमचों से देश की राजनीति अपना दामन कब छुड़ा पाएगी?
लिखने-कहने को बहुत सारी बातें हैं, मगर सिर्फ़ इतना ही कि जिन आरामतलबियों को अब भी कोई शक है, वो 15 अगस्त तक का इंतज़ार करें. एक बात और की इस विधेयक के पास हो जाने से इस देश से भ्रष्टाचार ख़त्म हो जाएगा, संभव नहीं है. इसके लिए सबको अपने गिरेबान में झांकना होगा.

Monday, March 22, 2010

अगर मैं संपादक होता तो...

यकीन मानिए अगर किसी अखबार का मैं संपादक होता तो सुधीश पचौरी का लिखा हरगिज नहीं छपने देता। खुदा न खास्ता मेरी जानकारी के बगैर कहीं छप भी जाता तो उनका पेमेंट नहीं होने देता। मुमकिन है मेरी इस घोषणा के साथ पचौरी जी के कुछ प्रशंसक तैश में आकर मुझे भला-बुरा कहें लेकिन अब मैं भी अपनी जिद पर आ गया हूं।
ऐसा नहीं है कि पचौरी जी के साथ मेरी कोई निजी दुश्मनी है। मैंने दो साल उनकी क्लास अटेंड की है। पढ़े-लिखे अच्छे इंसान और प्रोफेसर हैं वो। दिल्ली विश्वविद्यालय की सेंट्रल रिफरेंस लाइब्रेरी में हिंदी का शायद ही कोई प्रोफेसर जाता हो लेकिन पचौरी जी वहां अक्सर दिख जाते थे। अब भी दिखते होंगे लेकिन अब मैं वहां नहीं दिखता। बड़े पढ़ाकू और लिक्खाड़ हैं। हिंदी साहित्य में उत्तरआधुनिक विचारधारा (हालांकि कई विद्वान उत्तरआधुनिकता को कोई विचारधारा नहीं मानते) का खूंटा गाड़कर उसको थामे रहने का श्रेय पचौरी जी को तो है ही।
यहां लोग सवाल कर सकते हैं कि सर्वगुण संपन्न एक अच्छे पढ़ाकू और लिक्खाड़ प्रोफेसर के साथ ऐसा दुराग्रह क्यों? वजह बहुत साफ है। पिछले तकरीबन छह साल से मैं दिल्ली में हूं। हर अखबार और बहुद हद तक पत्रिकाओं को देखता-पढ़ता रहा हूं और करीब-करीब हर जगह सुधीश पचौरी की मौजूदगी पाई है। उनकी इस मौजूदगी को देखते हुए उनकी तुलना ब्रह्म से की जा सकती है। ब्रह्म जो व्यापक विरज अज...। यत्र-तत्र-सर्वत्र...। यूँ, किसी पत्रिका में कभी उनका परिचय पढ़ा था, रोजना एक हजार से अधिक शब्द लिखने वाले हिंदी के प्राध्यापक...। सचमुच बहुत लिखते हैं अपने पचौरी जी लेकिन सवाल है कि पचौरी जी जो लिखते हैं, किसके कितने पल्ले पड़ता है? दो बार... चार बार... छह बार पढ़ लीजिए किसी आर्टिकल को, कुछ समझ में ही नहीं आता कि आखिर कहना चाहते हैं जनाब। कई बार लगा शायद अपनी समझ कम है, इसलिए उनका लिखा समझ में नहीं आता लेकिन और जो लगनशील और चेतनापुरुष लोग हैं, उनसे जब पूछा कि आज फलां अखबार में पचौरी जी का फलां आर्टिकल छपा है, कुछ समझ में आया तो उन लोगों ने भी असमर्थता जाहिर की। कोई बहुत समझदार हो तो कल यानी रविवार, 21 मार्च के हिंदुस्तान के एडिट पेज पर सुधीश पचौरी का आर्टिकल छपा है, पढ़ के बता दे उसका सार।
तीन साल पहले मैंने रामदरश मिश्र का इंटरव्यू किया था। पत्र-पत्रिकाओं के सिलसिले में बात की तो उनका कहना था कि जब लोग केवल लिखने के लिए लिखते हैं भला कौन पढ़ेगा और क्या समझेगा। इस प्रसंग में उन्होंने बाकायदा सुधीश पचौरी का नाम लिया था। मिश्र जी ने यह भी कहा था पत्र-पत्रिकाओं में एक भरा-पूरा रैकेट काम कर रहा है। किसका लिखा छापना है, किसको कितनी पेमेंट करनी है... सब कुछ तय होता है। ऐसे में किसी आम पाठक को किसी का लिखा समझ में नहीं आता तो उसकी बला।
किसी भी अखबार का संपादकीय पेज उसकी आत्मा माना जाता है। उसमें छपने वाले लेख और विचार एक वर्ग (कम से कम पढ़े-लिखे वर्ग) की चेतना को जगाने, समाज और व्यवस्था के प्रति उसका नजरिया बदलने का काम करते हैं, कुछ नया करने की प्रेरणा देते हैं। लेकिन सुधीश पचौरी टाइप के लेखक, जो केवल लिखने के लिए लिखते हैं, मुझे निराश करते हैं। इन सठियाए लेखकों से मुझे कोफ्त सी होने लगी है।

Thursday, March 11, 2010

आनंदियां तो रोज मरती हैं

हिंदी फिल्मों में हीरो-हीरोइनों के मरने का रिवाज नहीं है। इसकी एक वजह है कि भारतीय काव्यशास्त्र में ट्रेजडी की अवधारणा नहीं है। अपने यहां दुखांत कलाओं को पसंद नहीं किया जाता। इसके इतर पाश्चात्य काव्यशास्त्र में ट्रेजडी पर जोर दिया गया। आरस्तू का विरेचन सिद्धांत ट्रेजडी को ही आधार बनाता है और शायद यही वजह है कि मशहूर नाटककार शेक्सपीयर के अधिकांश नाटक दुखांत हैं।
बहरहाल, कलर्स चैनल पर प्रसारित होने वाले सीरियल बालिका बधू की मुख्य नायिका आनंदी मर गई। उसे गोली मार दी गई। बालिका बधू ही वह सीरियल है जिसने एकता कपूर के अजर-अमर नायक-नायिकाओं और अनवरत, बारहमासी सीरियलों की बैंड बजाई। देखते-ही देखते कलर्स के आगे दूसरे मनोरंजन चैलनों का रंग फीका पड़ गया। उनकी टीआरपी कलर्स के बरक्श आधे पर ही ठहरती, खासकर बालिका बधू के प्रसारण के समय।
जैसा कि न्यूज़ चैनल वाले बता रहे थे कि देश सदमें में है, आनंदी के मरने से कम से कम मुझे सदमा नहीं लगा क्योंकि इस देश में आनंदियां तो रोज मरती हैं। जिन बाल विवाह और अनमेल विवाह जैसी समस्याओं को केंद्र में रखकर सीरियल की शुरुआत हुई, उसमें आनंदी जैसे किरदारों का मरना तो उनकी नियति है। ऐसी आनंदी, जो सासू मां की हां में हां मिलाने की जगह उससे सवाल करे। घर की इज्जत की परवाह किए बगैर छुट्टा घूमने की आदी हो, बात-बात में पति से भी झगड़ बैठे। मुझे लगता है कि आनंदी की मौत सही समय पर हुई है। निर्माता ज्यादा समय तक उसे जिंदा रखता तो सीरियल की एथेंटिसिटी मर जाती। बालिका बधू क्या, कलर्स में प्रसारित होने वाले सीरियल ऐसे हैं जो प्रेमचंद की कहानियों की याद दिलाते हैं। प्रेमचंद भी अपने पात्रों, खासकर केन्द्रीय पात्रों के साथ कोई हमदर्दी नहीं बरतते। चाहे आप गोदान के होरी को लें या रंगभूमि के सूरदास को या फिर निर्मला। घोर अत्याचार और बद से बदतर जिंदगी गुजारते हैं प्रेमचंद के पात्र। क्यों? क्योंकि भारतीय समाज का यही यथार्थ है। प्रेमचंद या बालिका बधू का निर्माता चाहता तो अपने केन्द्रीय पात्र को लंबे समय तक जिंदा रखता, उनकी जिंदगी को खुशहाल दिखाता लेकिन क्या ऐसा हमारे समाज में भी है?

Wednesday, March 3, 2010

फिदा सरकार, हुसेन का इमोशनल अत्याचार

2 मार्च की हॉट खबर थी कि मकबूल फिदा हुसेन ने कतर की नागरिकता हासिल कर ली है। नागरिकता स्वीकार करने के बाद अपने पहले इंटरव्यू में हुसैन ने कहा,   'भारत मेरी मातृभूमि है। मैं अपनी मातृभूमि से घृणा नहीं कर सकता, लेकिन भारत ने मुझे खारिज कर दिया। ऐसे में मुझे भारत में क्यों रहना चाहिए?... जब संघ परिवार ने मेरे ऊपर हमला किया तो उस समय सभी चुप्पी साधे रहे। राजनीतिक नेतृत्व, कलाकारों या बुद्धिजीवियों में से किसी ने भी मेरे पक्ष में आवाज नहीं उठाई, लेकिन मैं इस सच्चाई को जानता हूं कि भारत की 90 प्रतिशत जनता मुझे प्यार करती है।... भारत की सरकारें मेरी हिफाजत नहीं कर सकीं। इसलिए इस तरह के देश में निवास करना मेरे लिए बहुत कठिन है। राजनेताओं की नजर सिर्फ वोट पर है।'
हुसेन ने कहा, 'कतर में मैं पूरी आजादी का आनंद ले रहा हूं। अब कतर ही मेरा स्थान है। यहां मेरी अभिव्यक्ति की आजादी पर किसी का अंकुश नहीं है। मैं यहां बहुत खुश हूं।'
करीब-करीब ठीक कहा है हुसेन साहब आपने। बहुत गंदी है यहां की पॉलिटिक्स । मुबारक हो आपको आपका नया ठिकाना, लेकिन एक गुजारिश है आपसे। आप भारतवासियों पर इमोशनल अत्याचार न करें। किसी की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को आघात लगता है तो हमें भी बड़ी छटपटाहट होती है, लेकिन अफसोस है कि आपकी अभिव्यक्ति हमेशा दोयम दर्जे की रही है। मकबूल साहब बानगी कबूल करें-
इसे अजीब इत्तेफाक कहेंगे कि 2 मार्च को मकबूल साहब ने कतर की नागरिकता हासिल की और दो दिन पहले 28 फरवरी के जनसत्ता के एडिट पेज पर करीब-करीब तीन चौथाई हिस्से में तसलीमा नसरीन का आर्टिकल छपा। तसलीमा ने सलमान रुश्दी और हुसेन साहब के साथ उनका नाम जोड़े जाने पर गहरा क्षोभ व्यक्त किया है। बकौल तसलीमा,  ''दोनों रचनाकारों के प्रति असीम श्रद्धा रखते हुए मैं कह रही हूं कि इन दोनों पुरुषों के साथ कोष्टक में मेरा नाम रखना उचित नहीं है। धर्मयुक्त, विषमतायुक्त, समान अधिकारयुक्त समाज की रचना के लिए मैं जो संघर्ष कर रही हूं, वह अगर किसी को दिखाई नहीं देता तो वह चाहे जितना बड़ा शिल्पी क्यों न हो, मेरे आदर्श के करीब आने की उसमें कोई योग्यता नहीं है''
फिदा साहब से तसलीमा का मोहभंग का कारण तो देखें- ''हुसेन के सरस्वती की नंगी तस्वीर बनाने को लेकर भारत में विवाद हुआ तो मैं स्वाभाविक रूप से चित्रकार की स्वाधीनता के पक्ष में थी। मुसलमानों में नास्तिकों की तादाद बहुत कम है। मैंने मकबूल फिदा हुसेन के चित्रों को हर जगह से खोजकर कर देखने की कि हिंदू धर्म के अलावा किसी और धर्म, खासकर अपने धर्म इस्लाम को लेकर उन्होंने कोई व्यंग्य किया है या नहीं? लेकिन देखा कि बिल्कुल नहीं किया है बल्कि कैनवास पर अरबी में शब्दश: अल्लाह लिखते हैं। हिंदुत्व पर अविश्वास के चलते ही उन्होंने लक्ष्मी और सरस्वती को नंगा चित्रित किया। क्या वे मोहम्मद को नंगा कर सकते हैं? मुझे यकीन है, नहीं कर सकते।...
हुसेन भी उन्हीं धार्मिक लोगों की तरह हैं जो अपने धर्म में तो विश्वास करते हैं लेकिन दूसरे लोगों के उनके धर्म में विश्वास की निंदा करते हैं।....
हुसेन की देश वापसी के लिए सरकार पूरी कोशिश कर रही है, मुझे न तो भारत सरकार लौटने दे रही है न बांग्लादेश सरकार।''
एक बार फिर धवलकेश हुसेन साहब को नए आशियाने की मुबारकवाद और एक बात यह कि भारत को जाकिर हुसेन से कोई घृणा नहीं, मौलाना कलाम आजाद से कोई घृणा नहीं, विस्मिल्ला खान से कोई घृणा नहीं, अहमद-मोहम्मद हुसेन से कोई घृणा नहीं, गुलाम अली और मेंहदी हसन से नहीं, अब्दुल कलाम से नहीं... जायसी-रसखान से नहीं, फिर आपसे क्यों? आप आत्ममंथन करें जनाब।

Friday, February 19, 2010

सच, बदलाव को कोई नहीं रोक सकता

इस बार बात भिंड-मुरैना की। शहरातू शायद ही यकीन करें कि आज से 25 साल पहले जिन चंबल की घाटियों में फूलन देवी, लाखन सिंह और मलखान सिंह जैसे नामी डकैतों की बंदूकों की आवाजें सुनाई देती थीं, वहां आज डीजे बज रहा है लेकिन भैया हम तो देख-सुन आए और नाच आए। बिजली 10-15 दिन से नहीं है या महीनों से, इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता। शादी है तो डीजे बजेगा। वीडियो कैमरा होगा और बैंड आर्केस्ट्रा वाला ही होगा। भले ही पैसे सूद पर लिए गए हों। हां, ये सब तमाम ताम-झाम इस बात पर निर्भर करता कि किसकी कितनी हैसियत है, कितनी औकात है।
भिंड-मुरैना क्या, ग्वालियर तक ब्रज का अच्छा खासा प्रभाव है। रीति-रिवाज, रहन-सहन, बोली-भाषा... सब कुछ मथुरा आगरा से मेल खाती हुई। थोड़ा बहुत टोन में अंतर हो सकता है/ है। बड़ी मीठी ब्रज भाषा है साहब। सचमुच कृष्ण की माखन-मिश्री मिली हुई है। लोग आपको गाली भी दें तो लगेगा दुलार कर रहे हैं। यूं मोड़ी च... गाली है लेकिन इस क्षेत्र का रामभजन है (मोड़ी के मायने लड़की होता है, खासकर बेटी के अर्थ में)। अगर दो हमउम्र एक-दूसरे को इस रामभजन के साथ जमकर पुकाररते हैं तो समझ लीजिए कि दोनों के बीच खास याराना है।
खैर... जिस बारात में मैं शरीक हुआ, वह भी हम जैसे मध्यवर्ग की थी। चुनांचे, ऊपर गिनाए गए सारे ताम-झाम मौजूद थे। भाई साहब मोबाइल डीजे... और एक-एक ठर्रा डकार लेने के बाद जो डांस देखने को मिलता है उसकी आप केवल कल्पना कर सकते हैं। कौन किसको रौंद रहा है, कुछ पता नहीं। 10 मिनट पहले सूटबूट-टाई और एक-दूसरे से परफ्यूम मांग कर  (वहां की भाषा में स्प्रे) छिडक कर फोक्कस बनाया था और अब जैसे ईंट के भट्ठे से मजदूरों का दल निकला हो। इस बीच बड़े-बूढ़ों को लगा कि बारात दरवाजे पर पहुंचने के लिए लेट हो रही है। इस वक्त की 50 के ऊपर की पीढ़ी, जिसके  जेहन में चलो रे डोली उठाव... और जब तक न हों फेरे पूरे सात जैसे नदिया के पार टाइप के गीत गहरे तक समाए हैं, उन्हें कजरारे-कजरारे... नगाड़ा-नगाड़ा... जैसे आइटम सांग्स की धुनें भला क्यों सुहाएं? लौंडों पर लगे लाठियां ठूंसने... अपने रामभजन के साथ। थोड़ी देर में जिस ट्रैक्टर पर डीजे चल रहा है, उसके जेनरेटर में कुछ प्रॉब्लम आ गई। अब तो उस डीजे वाले की शामत समझिए। जैसे-तैसे बारात दरवाजे पर पहुंचती है। वहां के धमाल के बारे में कुछ पूछिए ही मत। धमाल क्यों बढ़ जाता है, इसकी वजह भी हम सब जानते हैं। तभी बंदूकधारी बारातियों की तड़ातड़ फायरिंग शामियाने के चीथड़े उड़ा रही है। टेंट वाला बेचारा रो रहा है लेकिन भिंड-मुरैना की बारात हो और कम से कम 50 राउंड फायरिंग न हो, सवाल ही नहीं उठता।
दरअसल, यह संस्कृति शहरों से गांव पहुंची संस्कृति है। इन बदलावों को केवल स्टेटस सिंबल मानकर खारिज नहीं किया जा सकता। पूरे मनोविज्ञान के पीछे अर्थ की महत्ता को नकारा नहीं जा सकता। हकीकत तो यह है कि आज गांवों में लखपती की छोडि़ए, दो-चार करोड़पती मिल जाएंगे। इस तरह के बदलाव अकारण नहीं हैं। बदलाव तो होंगे ही और उसे कोई नहीं रोक सकता।

Saturday, February 13, 2010

उस दिन मैं बहुत रोया

यकीन मानिए जिस रोज रुचिका गिरहोत्रा मामले के प्रमुख अभियुक्त एसपीएस राठौर के गाल पर उत्सव ने चाकू घुसाया, उस रोज मैं बहुत रोया। इतना कि अपने बाबा के मरे पर भी नहीं रोया था। फिर सोचा चलो छोड़ो- दिल तो बच्चा है जी। कभी-कभी ऐसा हो जाता है लेकिन चार दिन बाद जब श्रीराम सेना के अगुआ प्रमोद मुथालिक के मुंह पर कालिख पोती गई तो फिर नहीं रहा गया।
ऐसा नहीं है कि मुझे राठौर या मुतालिक से खास हमदर्दी है, इसलिए रोया। मैं इसलिए रोया कि इस यंगिस्तान में कब तक ऐसा चलता रहेगा? मैं रोया इसलिए कि हमारी न्यायव्यवस्था हमें रुला रही है और मैं रोया इसलिए कि क्यों हम जैसे युवा खूनी उत्सव मनाने को मजबूर होते हैं? क्या इस मुल्क में एक तय समयसीमा में कोई न्याय की उम्मीद कर सकता है? कायदे से राठौरों या मुतालिकों को दंडित करने का काम न्यायालय या पुलिस का है लेकिन उन पर हमें अब भरोसा नहीं रहा। अपनी न्यायव्यवस्था की असलियत तो देखिए। जिस राठौर या मुतालिक पर सरेआम मुकदमे दर्ज हैं, जिन पर अपराध के तमाम सबूत मौजूद हैं, उन्हें तो छुट्टा घूमने दिया जा रहा है और भावावेश में आपा खो चुका उत्सव सलाखों के पीछे है।
यहां उत्सव का बचाव करना भी अपना उद्देश्य नहीं है। जो भी कानून अपने हाथ में लेता है, जितना जल्दी हो सके उसे दंड मिलना चाहिए लेकिन इस जल्दी में बड़ी मछलियां क्यों लहरों के साथ अठखेलियां करती रहती हैं? यह सवाल बड़ा है। कोई माने या न माने, अपना दिल तो साफ-साफ कहता है कि इस मुल्क में अब युवा क्रांति को कोई नहीं रोक सकता। देरी जो भी हो, वह होकर रहेगी क्योंकि अब यह भी तय है कि इस कलियुग में कोई ईश्वरीय अवतार होने से रहा। देश और समाज को बचाना है तो युवाओं को ईश्वरीय अवतार लेना ही होगा। वह होगा, संभल जाओ दानवों!

Tuesday, February 9, 2010

भइया हमें तो फ्रॉम पसंद आए

शायद ध्यान भी नहीं आता, अगर कल अपने एक अजीज का मैसेज न आया होता। ...सूचना यह थी कि वेलेंटाइन डे नजदीक आ रहा है और तब तक ढेर सारे लोग विश करेंगे। पता नहीं उस वक्त मेरे पास टाइम हो न हो, इसलिए अभी से वेलेंटाइन डे की शुभकामना स्वीकार करो।
अच्छा है। आ रहा है वेलेंटाइन डे। मंदी की मार से आहत मार्केट पर कुछ मरहम लगेगा। आर्चिस के ग्रीटिंग वगैरह बिक जाएंगे... मैसेज कंपनियां तो बोलेंगी ही बल्ले-बल्ले। कुछ दिन पहले मैंने एरिक फ्रॉम को निपटाया है (माफ करें, पढ़कर),  लगा प्रेम के इस खास कारोबारी दिन पर फ्रॉम के बहाने प्रेम पर भी चर्चा कर ली जाए।
प्रेम क्या है? एक अनुभूति या कला? अगर यह एक अनुभूति है, जिसका होना कुछ संयोगों पर निर्भर है तो यह कुछ भाग्यशाली लोगों को ही नसीब होगा। अगर यह कला है तो इसके लिए कुछ ज्ञान और कोशिश की दरकार होगी। एरिक फ्रॉम की एक किताब है 'द आर्ट ऑफ लविंग'। उसका हिंदी अनुवाद 'प्रेम का वास्तविक अर्थ और सिद्धांत' बाजार में उपलब्ध है। किताब इसी तरह के सवालों पर जमकर बहस करती-कराती है। हो सकता है कुछ लोगों का किताब को फाडऩे का भी मन करे।  फ्रॉम के निष्कर्ष और प्रतिस्थापनाओं से कई जगह सहमत हुआ जा सकता है। मसलन, फ्रॉम कहते हैं कि प्रेम एक सामाजिक व्यवसाय है। उनका तर्क है जिस तरह से हम चीजों को खरीदते समय उनका आकर्षण, उनके रंग-रूप, उनके टिकाऊपन, उनसे आत्मसंतुष्टि वगैरह...वगैरह, ठीक उसी तरह से अपने प्रेम करने वाले लोग भी पूरी तरह एक-दूसरे को जांच परख लेते हैं। प्रेमी लोग इसका भी खास खयाल रखते हैं कि भविष्ट में कहीं तंगी-वंगी वाला माहौल तो नहीं होगा। प्रेमी प्रेमिका के बारे में सोचता है- किसी पार्टी में इसे लेकर जाऊंगा तो कोई नाम तो नहीं रखेगा, खिल्ली तो नहीं उड़ाएगा। प्रेमिका सोचती है कि अभी तो इसके पास बाइक है... दो साल बाद कार होगी कि नहीं। अगर इस तरह आशाएं-आकांक्षाएं पूरी होती दिखीं तो समझो प्यार पक्का... हंड्रेड परसेंट पक्का- कसमें-वादों के साथ। और हां, कहीं इन आशाओं, आकांक्षाओं को लेकर लोचा हुआ या दिखा तो कोई गारंटी नहीं। प्रेम जाए चूल्हे-भाड़ में।
बहरहाल, प्रेम के लिए ज्ञान जरूरी है। इसी मान्यता को लेकर आगे बढ़ते हुए एरिक फ्रॉम का सबसे ज्यादा टकराव फ्रायड के विचारों से होता है। फ्रॉम यह विचार करते चलते हैं कि फ्रायड के विचारों को किस सोशल डायनामिक्स के तहत स्वीकार्यता मिली। सबसे पहले फ्रॉम ने प्रेम के बारे में प्रचलित कुछ सामान्य मान्यताओं की पड़ताल की है।

मान्यता एक : प्रेम संयोग से हो जाता है। इसके लिए कुछ खास करने या सीखने की जरूरत नहीं होती।
देखा जाए तो इस सोच की कई वजह हैं। ज्यादातर लोग सोचते हैं कि 'कोई उनसे प्रेम करे' बजाय इसके कि 'वह प्रेम करें'। जाहिर है, उनका ध्यान खुद पर फोकस हो जाता है और वह इस बात की कोशिश शुरू कर देते हैं कि खुद को प्रेम किए जाने योग्य कैसे बनाया जाए। पुरुषों के संदर्भ में प्रेम के योग्य बनने के वही तरीके होते हैं, जो सफल बनने के। यह रास्ता कैसे मित्र बनाएं और सफल कैसे बनें जैसे विचारों और पुस्तकों से होकर जाता है लेकिन अगर कोई यह समझे कि फ्रॉम आत्ममुग्धता से बाहर निकलने को कह रहे हैं तो वह उसकी अपनी सोच होगी। फ्रॉम के मुताबिक जो खुद से प्यार कर सकता है, वही दूसरों से भी प्रेम कर सकता है।

मान्यता दो : प्रेम करना तो आसान है लेकिन समस्या यह है कि किसे प्रेम किया जाए?
किसे प्रेम किया जाए मतलब लक्ष्य। इस सोच में 'लक्ष्य' यानी 'किसे' की तुलना में 'काम' यानी 'प्रेम' सेकंडरी हो जाता है।

मान्यता तीन : आधुनिक मनुष्य की खुशी दुकानों में सजी चीजों को देखने और उन्हें खरीदने से मिलने वाले रोमांच में है। यही नजरिया वह अपने आस-पास के लोगों के प्रति भी अपनाता है। वह ऐसे स्त्री या पुरुष को पाना चाहता है, जो बिकाऊ गुणों के पैकेज हों। यहां पाना ही प्रमुख है, देना गौण है। फ्रॉम के चिंतन के मूल में सिर्फ स्त्री-पुरुष का प्रेम नहीं है, बल्कि उन्होंने प्रेम के सभी रूपों का विस्तार से विश्लेषण किया है। प्रेम के ये रूप हैं - सिम्बॉयटिक या समजैविक प्रेम मतलब मातृवत प्रेम, बंधुवत प्रेम, रागात्मक प्रेम, ईश्वरीय प्रेम और आत्म-प्रेम। इस सबके पीछे चिंतन यही है कि प्रेम करने की क्षमता का विकास कैसे हो।
फ्रायड के मुताबिक प्रेम सिर्फ यौन संवेगों की अभिव्यक्ति है। ये यौन संवेग शरीर में कुछ रासायनिक क्रियाओं और तनाव को जन्म देते हैं। इस तनाव या यौन इच्छा से मुक्ति के लिए मनुष्य यौन संबंध बनाता है लेकिन फ्रॉम पूछते हैं कि तनाव से मुक्ति के लिए यौन संबंध ही क्यों? फ्रॉम का कहना है कि प्रेम की जरूरत हमारे सामूहिक अस्तित्व से जुड़ी है। मनुष्य की अकेलेपन की भावना और एकात्म द्वारा उससे उबरने की तीव्र इच्छा ही प्रेम को जन्म देती है। इस तरह फ्रॉम सभी तरह के प्रेम के अस्तित्व की व्याख्या हमें दे देते हैं। उन्होंने मनोविज्ञान विषय की बढ़ती लोकप्रियता पर भी विचार किया है। उनके मुताबिक विषय की लोकप्रियता समाज में प्रेम की कमी होने की भी निशानी है, क्योंकि अब कोई किसी को प्रेम के माध्यम से समझना नहीं चाहता। उसके पास इतना धैर्य ही नहीं है, उसे सब कुछ इंस्टैंट चाहिए। मनोविज्ञान उन्हें अपने प्रेम-पात्र को समझने का शॉर्टकट लगता है, जबकि फ्रॉम का मानना है कि ज्ञान किसी को समझने का मात्र एक माध्यम है, एकमात्र नहीं। सबसे विश्वसनीय रास्ता प्रेम मार्ग ही है।

Thursday, April 23, 2009

पानी... हाय रे पानी

कल घर बात की तो पता चला गांव के दो लोगों के बीच झगड़ा हो गया है। झगड़े की वजह थी पानी। एक सरकारी हैंड-पंप है। खूब भीड़ होती है, खासकर शाम के वक्त। बच्चों में होड़ थी- पहले मैं भरूंगा, मैं भरूंगी। पहले बाल्टी-वाल्टी पटकी गईं, फिर गाली-गलौज और फिर मारपीट। बात बाप-दादों तक पहुंच गयी। फिर झगड़ा, और झगड़ा ऐसा कि लाठियां चलीं और पुलिस-थाना।
यह घटना है सतना के एक गांव की। इस झगड़े को बताने का मकसद सिर्फ इतना है कि पानी को लेकर भी अपने देस में पुलिस-कचेहरी होती है और होगी। क्योंकि 22 अप्रैल को पृथ्वी दिवस था, और उसी रोज यह वाकया सामने था लिहाजा मन में कुछ सवाल उठ रहे थे। सोचा कि विकासशील महान भारत के गांवों की कहानी ब्लॉग पर शेयर करनी चाहिए। नहर-नदी के पानी को रोककर अपने-अपने खेतों तक लाने और आगे के किसानों को पानी न मिलने पर झगड़े तो पहले भी होते रहे हैं लेकिन पीने के पानी को लेकर लाठियां चलेंगी, इसकी आशंका कम
यह इलाका बुंदेलखंड से सटा है। वही बुंदेलखंड, जो पिछले तीन-चार साल से भयंकर सूखे की मार झेल रहा है। यहां पानी की समस्या के लिए भी एक खास वजह है। यह क्षेत्र पूरी तरह से मानसून पर निर्भर था लेकिन जब मानसून का मिजाज बेवफा सनम जैसा हो गया तो किसानों ने वैकल्पिक सिंचाई के साधन के तौर पर ट्यूब वेल को अपनाया। जिसके पास भी दो-चार एकड़ जमीन है, ले आये बोरिंग मशीन, खुदवा दिया गड्ढा और डाल दिया सबमर्सिबल। किसानों का एकसूत्रीय कार्यक्रम चला- कुएं पाटो, ट्यूबवेल करावो। बिजली रहे, न रहे, ये उनकी बला। दो दशक पहले शुरू हुई यह ट्यूब-वेल संस्कृति ने ऐसा जाल फैलाया कि अब तो यहां के किसानों के लिए यह स्टेटस सिंबल बन गया है। एक किलोमीटर के एरिया में करीब दर्जन भर ट्यूब-वेल तो होंगे ही। इसका नतीजा ये हुआ कि वाटर लेबल दिनों-दिन गिरता गया और गिरता जा रहा है। आंकड़े बताते हैं कि हर साल करीब 10 फुट वाटर लेबल नीचे जा रहा है। नदी-तालाब कम हैं। जो हैं, पहले मई-जून में सूखते थे अब जनवरी फरवरी में सूख जा रहे हैं। क्षेत्र में कोई बड़ा बांध नहीं है। तालाब और कुएं वाटर-लेबल सही रखते थे लेकिन उन्हें समतल करने की मुहिम से पीने के पानी के लिए हाहाकार मच रहा है। कस्बों और शहरों में निजी बोर-वेल बंद करवा दिये गये हैं। नगर निगम पानी की सप्लाई करता है लेकिन कब, इसके लिए कोई तयशुदा वक्त नहीं है। लोग पानी के लिए रतजगा कर रहे हैं। गांवों में 12 से 20 रुपये प्रति लीटर दूध मिल रहा है। शहरों में 12 से 20 रुपये में मिनरल वाटर। गांवों में पानी-दूध मिले न मिले, पेप्सी-कोका कोला मिल जाएगा- वो भी चिल्ड। यह बात अलग है कि सिर-फुटौवल पानी को लेकर हो रहा
60-65 साल के इंसान की गिनती बूढ़ों में की जाती है। आजादी के 62 साल बाद यानी एक आजाद बूढ़ी पीढ़ी पानी के लिए पड़ोसी का सिर फोड़ रही है, इससे शर्म की बात और क्या हो सकती है। जी-8 और जी-20 सम्मेलनों में हमें ऊंचे ओहदे पर बिठाया जाता है। हम मन ही मन खुश भी हो रहे हैं लेकिन लाख टके का सवाल कि क्या पानी बगैर हम अमेरिका बन पाएंगे? चुनावी महापर्व चल रहा है। कोई पार्टी 3 रुपये में किलो भर चावल देने की बात कर रही है तो कोई दो रुपये में। पानी की बात कोई नहीं कर रहा। सुना है, आडवाणी जी ने कहा है कि वो सत्ता में आये तो पानी को मौलिक अधिकार में शामिल करेंगे। राम ही जानें वो क्या करेंगे लेकिन बुंदेलखंड के साथ देश के अन्य इलाकों में पानी को लेकर जो हाय-तौबा मची है, उसे देखते हुए राष्ट्रीय नीति की जरूरत आ पड़ी है। इसके लिए सरकारों के साथ गैर-सरकारी संगठनों और युवाओं को भी नये सिरे से सोचना होगा। नयी नीतियां बनानी होंगी वरना आने वाले समय में किसी और का पड़ोसी से झगड़ा हो जाए और पुलिस-थाना हो तो कोई अचरज की बात नही

Monday, March 30, 2009

टाटा का महीन जाल

बुद्धिनाथ मिश्र समकालीन कविता का बड़ा नाम है। उनकी एक कविता का मुखड़ा है, जाल फेंक रे मछेरे, जाने किस मछली में फंसने की चाह हो...। कविता बहुत पहले पढ़ी थी। करीब पांच साल पहले। तब मछली और जाल के बारे में कुछ समझ में नहीं आया और उस कविता को ऐसे भूले कि कभी ज़हन में आयी ही नहीं। अब, जबकि टाटा की बहुप्रतीक्षित और बहुचर्चित कार नैनो भारतीय बाज़ार में बिकने को तैयार है, वह कविता अनायास ही याद आ गयी और याद आ गये बुद्धिनाथ मिश्र ।23 को बड़े ताम-झाम के साथ नैनो को लॉन्च किया गया। इस मौके पर रतन टाटा ने लगभग रुआंसे सुर में कहा कि पांच साल पहले जो एक सपना मन में आया था कि एक आम हिन्दुस्तानी की अपनी कार हो, वह सपना आज साकार हो गया। टाटा ने यह भी कहा कि उन्होंने जो वादा किया था कि कार एक लाख की होगी, सो फिलहाल कीमत वही रहेगी क्योंकि वादा तो वादा होता है। इस लॉन्चिक आयोजन में दुनिया भर के तमाम वे बड़े चमकदार लोग थे, जो रतन टाटा की बिरादरी में आते हैं। नहीं थे तो वे आम लोग जिनके सपनों की यह लखटकिया कार बतायी जाती है। बड़ा दिन था साहब। एक लाख की कार, वो भी मंदी के इस दौर में। दिनभर मीडिया की नज़र उसी खबर पर थी। अब टाटा खांस रहे हैं, अब छींक रहे हैं, अब पानी पी रहे हैं, अब अपने खास लोगों से मिल रहे हैं, अभी थोड़ा वक्त है नैनो पर से घूंघट उठने का... वगैरह-वगैरह। पैकेज पहले से ही तैयार थे, धड़ाधड़ एयर होने लगे। बताया जाने लगा कि किस तरह से लाख मुसीबतों के बाद रतन टाटा ने आम आदमी के सपने को साकार किया है, उसे पहली बार चार पहियों की सवारी करने का मौका दिया है। कुल मिलाकर खबर ये थी और है कि रतन टाटा ने एक लाख लाख की कार नैनो को उतारकर आम आदमी पर अहसान किया है। लेकिन हमारे साथ दिक्कत है। हमारा मन है कि रतन टाटा के इस अहसान को अहसान मानने को तैयार ही नहीं। हमें तो लगता है कि मिश्र जी ने जैसे ऐसे ही वाकयों को ध्यान में रखकर मछली और जाल पर कविता लिखी हो। इतिहास गवाह है कि जब-जब किसी भी मुल्क का मध्यवर्ग खाने-पीने लायक हुआ है, रतन टाटा सरीखे चतुर-सुजान मछेरों (पूंजीपतियों) ने जाल फेंका है। इस बार का जाल इतना महीन और घना है कि मछली फिर फंसेगी, इसमें कोई दोराय नहीं। हमारी ये आदत हो चली है कि लालच दो और हम लालीपॉप खाने को राजी । पैसा पास में नहीं होगा तो रिश्तेदारों से उधार ले लेंगे। अब मामला कार का है, शानो-शौकत बढ़ाने का है तो इसके लिए तो हम कुछ भी करेंगे, किसी भी कीमत पर। पप्पू का एक ट्यूशन कम कर देंगे, थोड़ा रसोई में कटौती कर लेंगे और भी ऐसे ही दूसरे किफायती नुस्खे... बस कार दरवाज़े पर खड़ी हो जाय और पड़ोसी देखें। यहां गौर करने वाली बात ये भी है कि क्वेश्चन सेशन में किसी पत्रकार ने रतन टाटा से सवाल किया था कि एक लाख की कार बनाने के बाद भी क्या यह फायदा दिला पाएगी, उनका जवाब था- बिल्कुल। इस सवाल पर वहां मौजूद कुछ लोगों ने चुटकी भी ली थी लेकिन एक जो सच है, सामने आ ही गया।
(पुनश्च: शुरू में जाल फेंक रे मछेरे... कविता को मैंने बकौल दिनेश कुमार शुक्ल उल्लेख किया था, जो बड़ी भूल थी। ब्लॉग पढ़कर अविनाश जी ने याद दिलाया, कविता मिश्र जी की है। अविनाश जी को धन्यवाद और माफी के साथ पुनः प्रेषित )

Friday, February 27, 2009

पहले नहीं देखी इतनी निरीह संसद

चौथी-पाचवीं कक्षा में रहा होऊंगा।यानी उमर करीब १०-१२ के आस-पास। तब के अपनी दादी के किस्से मुझे अब भी याद हैं। उस दौर से लेकर आज तक की महत्वपूर्ण घटनाएं भी। यानी याददाश्त बहुत कमज़ोर नहीं है। यहाँ अपनी याददाश्त का बखान करने का मेरा कोई ख़ास प्रयोजन नहीं है, सिवाय इसके कि मुझे देश की राजनीति और उसके सूरते-हाल पर कुछ बात करनी है।
सच-सच कहूं तो वी पी सिंह के ज़माने से भारत के प्रधानमंत्री के बारे में थोड़ा-बहुत भान हुआ। इससे पहले दिमाग में बात आती थी कि प्रधानमंत्री कोई बहुत बड़ा आदमी होता होगा। सम्भव है, वह भारत में न रहता हो। वह वो जो चाह लेगा, वही देश में होगा। वो ऐसा होगा, वैसा होगा, वगैरह...वगैरह। यहाँ तक कि ये ख़याल भी आते थे कि दिल्ली भी अपने ही देश में होगी कि नहीं!! अब तो उस सोच पर मुझे ख़ुद हंसी आती है। खैर...
...तो जबसे मैं देश की राजनीति और संसद के बारे में जानता हूँ, मुझे इतनी निरीह संसद कभी नहीं दिखी, जितनी १४वीं । क्या प्रधानमंत्री, क्या राष्ट्रपति और क्या लोकसभा अध्यक्ष। सब के सब इतने निरीह और असहाय कि मेरे बचपन का वो हौव्वा अब रहा ही नहीं! कोई भी गुंडा-मवाली टाईप का सांसद इन संवैधानिक महापुरुषों! पर कुछ भी अनाप-शनाप बोलता रहे, कहीं कोई बंदिश नहीं! १४वीं लोकसभा का आख़िरी सत्र २६ फरवरी को संपन्न हो गया। उस आख़िरी रोज़ लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ दा ने बड़े बेजान शब्दों में सांसदों को धन्यवाद दिया कि वो शुक्रगुजार हैं, चार साल सबने उन्हें बोलने का मौका दिया। अरे कहाँ मौका दिया सोमनाथ दा? सबसे ज्यादा फजीहत तो आपकी ही कर राखी थी, इन चोट्टों ने। जिस तरह से बड़े संयुक्त परिवार में किसी बूढे को एक पुरानी चारपाई में डाल दिया जाता है, वह बुड्ढा छोटे बच्चों को डांटता-फटकारता है, कई बार अपना डंडा उठाता है, लबेधा भी मरता है, अंत में थक-हार कर चुप हो जाता है और बच्चे अपनी शैतानी में मस्त।अब आप ऐसे ही शैतानों का शुक्रिया अदा कर रहे हैं सोमनाथ दा। क्यों ख़ुद को और उस पद की गरिमा को कम कर रहे हैं?
यही हाल हमारे पी एम् का रहा। मजाल क्या कि एक भी महत्वपूर्ण फैसला अपनी शक्ति से ले लें, कि नहीं भाई, देश के प्रधानमंत्री ने देश हित में ताल ठोककर ये फैसला लिया है। ऐसे में बहुत-बहुत याद आती हैं इंदिरा गांधी। बहरहाल बहुमत की सरकार और गठबंधन की सरकार के पचडे में मैं नहीं पड़ने वाला।मुझे उस संवैधानिक पद के अधिकार कि असलियत से मतलब है। न्यूक्लियर डील मसले पर अमर सिंह और शिबू सोरेन जैसे दो कौडी के नेताओं ने मनमोहन को कैसे नचाया, सबने देखा है।
अब राष्ट्रपति महोदया की बात कर ली जाए। पूरे देश से करबद्ध क्षमा याचना के साथ और भारतीय लोकतंत्र में पूरी निष्ठा के साथ बड़ी विनम्रता के साथ मैं कहना चाहता हूँ कि किसी भी देश का राष्ट्राध्यक्ष इतना निरीह मैंने न देखा और न सुना। किसी को याद हो तो बता देगा, मैं अपनी याददाश्त दुरुस्त कर लूँगा। 26/11 जैसी घटना के बाद हमारे देश के राष्ट्रपति, जो तीनों सेनाओं का सर्वोच्च कमांडर होता है, की इतनी लम्बी चुप्पी मुझे बेचैन करती है।
नौजवान साथियो चिंताएं बहुत हैं, जिनमें सब का उल्लेख यहाँ नहीं किया जा सकता। इतना कहने की भी छटपटाहट इसलिए है कि अगली संसद के लिए चुनावी बिगुल बजने वाला है। इसलिए आगे हम क्या करें, इस पर भी विचार किया जाना चाहिए।