Wednesday, March 3, 2010

फिदा सरकार, हुसेन का इमोशनल अत्याचार

2 मार्च की हॉट खबर थी कि मकबूल फिदा हुसेन ने कतर की नागरिकता हासिल कर ली है। नागरिकता स्वीकार करने के बाद अपने पहले इंटरव्यू में हुसैन ने कहा,   'भारत मेरी मातृभूमि है। मैं अपनी मातृभूमि से घृणा नहीं कर सकता, लेकिन भारत ने मुझे खारिज कर दिया। ऐसे में मुझे भारत में क्यों रहना चाहिए?... जब संघ परिवार ने मेरे ऊपर हमला किया तो उस समय सभी चुप्पी साधे रहे। राजनीतिक नेतृत्व, कलाकारों या बुद्धिजीवियों में से किसी ने भी मेरे पक्ष में आवाज नहीं उठाई, लेकिन मैं इस सच्चाई को जानता हूं कि भारत की 90 प्रतिशत जनता मुझे प्यार करती है।... भारत की सरकारें मेरी हिफाजत नहीं कर सकीं। इसलिए इस तरह के देश में निवास करना मेरे लिए बहुत कठिन है। राजनेताओं की नजर सिर्फ वोट पर है।'
हुसेन ने कहा, 'कतर में मैं पूरी आजादी का आनंद ले रहा हूं। अब कतर ही मेरा स्थान है। यहां मेरी अभिव्यक्ति की आजादी पर किसी का अंकुश नहीं है। मैं यहां बहुत खुश हूं।'
करीब-करीब ठीक कहा है हुसेन साहब आपने। बहुत गंदी है यहां की पॉलिटिक्स । मुबारक हो आपको आपका नया ठिकाना, लेकिन एक गुजारिश है आपसे। आप भारतवासियों पर इमोशनल अत्याचार न करें। किसी की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को आघात लगता है तो हमें भी बड़ी छटपटाहट होती है, लेकिन अफसोस है कि आपकी अभिव्यक्ति हमेशा दोयम दर्जे की रही है। मकबूल साहब बानगी कबूल करें-
इसे अजीब इत्तेफाक कहेंगे कि 2 मार्च को मकबूल साहब ने कतर की नागरिकता हासिल की और दो दिन पहले 28 फरवरी के जनसत्ता के एडिट पेज पर करीब-करीब तीन चौथाई हिस्से में तसलीमा नसरीन का आर्टिकल छपा। तसलीमा ने सलमान रुश्दी और हुसेन साहब के साथ उनका नाम जोड़े जाने पर गहरा क्षोभ व्यक्त किया है। बकौल तसलीमा,  ''दोनों रचनाकारों के प्रति असीम श्रद्धा रखते हुए मैं कह रही हूं कि इन दोनों पुरुषों के साथ कोष्टक में मेरा नाम रखना उचित नहीं है। धर्मयुक्त, विषमतायुक्त, समान अधिकारयुक्त समाज की रचना के लिए मैं जो संघर्ष कर रही हूं, वह अगर किसी को दिखाई नहीं देता तो वह चाहे जितना बड़ा शिल्पी क्यों न हो, मेरे आदर्श के करीब आने की उसमें कोई योग्यता नहीं है''
फिदा साहब से तसलीमा का मोहभंग का कारण तो देखें- ''हुसेन के सरस्वती की नंगी तस्वीर बनाने को लेकर भारत में विवाद हुआ तो मैं स्वाभाविक रूप से चित्रकार की स्वाधीनता के पक्ष में थी। मुसलमानों में नास्तिकों की तादाद बहुत कम है। मैंने मकबूल फिदा हुसेन के चित्रों को हर जगह से खोजकर कर देखने की कि हिंदू धर्म के अलावा किसी और धर्म, खासकर अपने धर्म इस्लाम को लेकर उन्होंने कोई व्यंग्य किया है या नहीं? लेकिन देखा कि बिल्कुल नहीं किया है बल्कि कैनवास पर अरबी में शब्दश: अल्लाह लिखते हैं। हिंदुत्व पर अविश्वास के चलते ही उन्होंने लक्ष्मी और सरस्वती को नंगा चित्रित किया। क्या वे मोहम्मद को नंगा कर सकते हैं? मुझे यकीन है, नहीं कर सकते।...
हुसेन भी उन्हीं धार्मिक लोगों की तरह हैं जो अपने धर्म में तो विश्वास करते हैं लेकिन दूसरे लोगों के उनके धर्म में विश्वास की निंदा करते हैं।....
हुसेन की देश वापसी के लिए सरकार पूरी कोशिश कर रही है, मुझे न तो भारत सरकार लौटने दे रही है न बांग्लादेश सरकार।''
एक बार फिर धवलकेश हुसेन साहब को नए आशियाने की मुबारकवाद और एक बात यह कि भारत को जाकिर हुसेन से कोई घृणा नहीं, मौलाना कलाम आजाद से कोई घृणा नहीं, विस्मिल्ला खान से कोई घृणा नहीं, अहमद-मोहम्मद हुसेन से कोई घृणा नहीं, गुलाम अली और मेंहदी हसन से नहीं, अब्दुल कलाम से नहीं... जायसी-रसखान से नहीं, फिर आपसे क्यों? आप आत्ममंथन करें जनाब।

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