इस समय जिसे देखो पत्रकारिता पर लिखे-बोले जा रहा है। पानी पी-पी के पत्रकारिता को लोग गरिया रहे हैं। पत्रकारिता में अश्लीलता आ गयी है, पत्रकारिता अपनी राह से भटक गयी है, आदि-आदि। और इस सामूहिक प्रलाप में वो लोग शामिल हैं, जो किसी न किसी रूप में इस पेशे से जुड़े हैं। साहित्यकारों का तो पत्रकारिता से पुराना बैर रहा है। ये बात अलग है कि पत्रिकारिता के बगैर उनकी भी दाल-रोटी सही तरीके से नहीं चलती। माफ़ करें, हम इस सामूहिक प्रलाप में शामिल नहीं हैं। शामिल होना भी नहीं चाहते क्योंकि हम इस धारणा के प्राणी हैं कि न कुछ से कुछ बेहतर है। हमारे मुल्क में पत्रकारिता २०० साल की है (लगभग)। इन दो सौ सालों में पत्रकारिता ने कई दौर देखें है लेकिन हमें नए दौर की पत्रकारिता से मतलब है क्योंकि अतीतजीवी बनने में हमारे कोई रूचि नहीं है।
लोग कहते हैं, आज की पत्रकारिता ग्लैमरस हो गयी है। क्या बुराई है भाई ग्लैमरस होने में? क्या हमेशा बनमानुष ही बने रहें हम? लोग कहते हैं, हीरो-हीरोइनों की तस्वीरें ज्यादा छपती-दिखती हैं। अब बोलीवुड की खबरों में रामानंद सागर के सती-सावित्री वाले धारावाहिकों के फुटेज थोडी न दिखायेगा कोई। जिसे देखना हो देखो, नहीं तो ट्यून करलो दूरदर्शन को। रिमोट तो आपके हाथ में ही है न। बुश या मनमोहन के भाषण के समय किसी ने मल्लिका सहरावत या बिपाशा बशु को देखा हो बताये हमें। ज़माना पापुलर कल्चर का है भाई तो ये सब तो झेलना पड़ेगा। २४ घंटे आप उपडेट रहना चाहते हैं और हर वक़्त सीरिअस खबरों की तमन्ना रखते हैं? क्यों? शाहिद कपूर या राखी सावंत इंडियन नहीं हैं क्या?
देखा जाये तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को कोसने वाले लोग ज़्यादा हैं। और कोसने वाले वो लोग हैं, जिनके दो-चार जोड़े जूते-चप्पल घिस गए हैं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के दफ्तरों के चक्कर लगाते। कहते हैं, परेशान आदमी को गुस्सा ज्यादा आता है। बगैर न्यूज़ चैनल ट्यून किये जिनकी लीड खबर डिसाइड नहीं होती, वो भी मजाक उडाने में पीछे नहीं रहते। भाई हमें नहीं पसंद ये दोगलापन। मान लेते हैं समाजसेवा नहीं कर रही पत्रकारिता लेकिन मौजूदा दौर में पत्रकारिता ने अपना जो रोल अदा किया है या कर रही है, वो क्या कम है? किसी गांव के किसान की आवाज़ आज से १० साल पहले टीवी स्क्रीन पर दिखती थी क्या? आज किसान बाईट देता है, अपनी मांग सरकार के सामने रखता है। हाँ इतने में संतोष नहीं करना चाहिए, और अच्छा होना चाहिए लेकिन होगा साथ करने से ही न? इसलिए....
मत कहो आकाश में कुहरा घना है
ये किसी कई व्यक्तिगत आलोचना है।
Wednesday, January 14, 2009
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apne yahan ek kahawat hoti hai kuch is tarah...kanwa dekhe mood pirae, kanwa binj rahlo na jaae!
ReplyDeletelogon ka haal bhi aisa hi hai...ab toh bhai kanwa manane se raha, naye jamane mein kanwa hi style statement hai.