अव्वल तो होता इस ब्लॉग के बारे में पहले ही कुछ कह-कहा लिया जाता लेकिन हमें ध्यान आया एक पोस्ट के बाद। दरअसल पहली पोस्ट हमने टेस्टिंग के तौर पर छापी थी। खैर... । एक बात जो हमें कहनी है, वो ये कि हमने ब्लॉग किसी से पूछ कर शुरू नहीं किया। ब्लॉग से थोड़ा-बहुत परिचय था, इसलिए सोचा कुछ लिखते-पढ़ते हैं । दूसरी बात इस ब्लॉग के लिए फिलहाल हम ही उत्तरदायी हैं
ब्लॉग शुरू किया तो जोश-जोश में एक अज़ीज़ दोस्त को पता भी दे दिया। हमारे दोस्त को इस दुनिया में महारत हासिल है, हमें मालूम नहीं था। एक पोस्ट पहले से थी, उसे पढ़ा या नहीं, ये तो वो जानें लेकिन उनका कहना था कि कहानी अच्छी है। फ़िर सलाह दी कि हम अपनी भाषा को और सुधारें। हमने कहा ज़रूर कोशिश करेंगे। दोस्त ने अगली बात कही कि ब्लोगिंग में ३००-४०० से ज़्यादा शब्दों का इस्तेमाल न करें इस पर हमारा मन नहीं राजी हुआ और सोचा कि क्यों न ब्लॉग पर ही लोगों से राय जानें। हमारा सवाल है कि अभिव्यक्ति को शब्दों में बाँधा जा सकता है क्या? हमारा मनना है, अभिव्यक्ति एक शब्द में भी हो सकती है, १०० में भी, ३००-४०० में और १००० शब्दों में भी। इसके लिए हमने मोहल्ला (ब्लॉग) का पता दिया। उन्होंने कहा कि किसको इतनी फुर्सत है कि 'ग्लोब' का चक्कर लगाये? हमने कहा, हमें अपने मतलब की चीज़ जहाँ भी मिलती है, हम खोजते हैं। इस पर दोस्त का कहना था कि वो मीडिया कंसल्टेंट हैं, किसी की मार्केटिंग नहीं करते..... । .......अरे फिर कहीं ३००-४०० शब्द से अधिक न हो जाएँ, इसलिए बुनियादी सवाल के साथ हम लोगों की खुली प्रतिक्रिया चाहते हैं कि क्या सचमुच ब्लॉग में अभिव्यक्ति ४००-५०० शब्दों से अधिक नहीं होनी चाहिए!!!!? कोई प्रतिक्रिया दे या न दे, अविनाश जी कुछ न कुछ कहेंगे, हमें ऐसी आशा है। हम पर ब्लोगिंग के वायरस उन्होंने ही छिडके हैं।
Monday, January 12, 2009
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Ya Rab na wo samjhe hain, na samjhenge meri bat
ReplyDeleteDil aur de unko, aur mujhko de Zuban aur.
Is duniya me achha kahne walo ki kami nahi, achhi achhi bate to sabhi kr lete hain pr jo achha kr k dikhaye usi ka jeena, jeena hai, baqi sab to bharm hai, ankho ka dokha hai..
Main is Blog k liye Manish ji ko Mubarakbad deti hu.. Unki ye koshish kabile tarif hai.
badhi ho meri taraf se bhi...mai itni unchi-unchi batein toh nahi kar-paata kya karun vyvsay ka asar hai, control karna aur control mein rahna padta hi hai, par apne anubahv se aap ke mitra ki baat se sahmat hoon...pihcle teen saal se apne blog par maine bhi kuch aisi hi ghatnaiein dekhi hain...bhala internet par snacks ke mood mein aaya insan saari chaat hamare hi khomche par kyun khaega! jab tak ek dum phurshatiya na ho, ek-se do plate khilane ki kosis ki toh bhag jayega.
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