Wednesday, January 21, 2009

कसाब की चिट्ठी तीस्ता सीतलवाड़ के नाम


सुनीत निगम जी का २० साल का पत्रकारीय तजुर्बा है। इस दौरान सर ने बहुत कुछ लिखा-लिखाया है। वो हमारे बॉस हैं, इसलिए हम उन्हें सर कहते हैं, लेकिन अपना तजुर्बा है कि उनमें 'बासिज्म' नहीं है। आतंक पर लिखने-कहने कि एक सोच सर कि अपनी है, जिसे हम पाठकों के साथ साझा कर रहे हैं। प्रतिक्रियाओं के लिए पाठक पूरी तरह स्वतंत्र हैं।

मैं तो बुरी तरह फंस गया। न इधर का रहा, न उधर का । मैं अपने आकाओं के कहने पर नौ साथियों के साथ जिस मकसद से इंडिया आया था। वह मिशन तो पूरा कर लिया लेकीन फंस गया यहां के पुलिस वालों के चक्कर में। मेरे नौ साथी तो 'जन्नत' पहुंच गये और मुझे 'दोजख़' में मेहमानी करनी पड़ रही है। अब यहां मुझे कोई बचाने वाला भी नहीं है। इतने दिन की मेहमानी के दौरान मुझे पता चला है हिदुस्तान में मुसलमानों के हकों की लड़ाई लडऩे वाली एक महिला हैं, जिनका नाम तीस्ता सीतलवाड़ बताया जा रहा है। सुना है कि उनकी गिनती यहां के अल्पसंख्यकों में 'देवदूतों' की तरह होती है लेकिन जब से मुझ पर आफत आई है, तब से वह भी चुप हैं। क्या वे सिर्फ भारत के मुसलमानों की लड़ाई लड़ती हैं? मैं अगर आतंकवादी हूं, तो पहले मुसलमान भी हूं। क्या आतंकवादियों के मानवाधकार नहीं होते? मेरा पक्ष रखने वाला यहां-वहां कोई नहीं। मैं जिस देश का रहने वाला हूं, वहां की सरकार ने भी मुझे अपने यहां का 'नागरिक' मानने से इंकार कर दिया है। इसलिए अपने हकों' के लिए तीस्ता जैसी सामाजिक कार्यकर्ता से अर्ज करने के लिए यह खत लिखना पड़ रहा है। हे मोहतरमा, तुम कहां हो? 26 नवंबर को मैं तुम्हारे देश में समुद्र के रास्ते दाखिल हुआ हूं। मुझे मेरे आकाओं ने जो ट्रेनिंग दी थी, उसी के मुताबिक मिशन पूरा करने आया था। मैं बहुत ही गरीब घर का 'बच्चा' हूं। मेरे अब्बू पाकिस्तान में रेहड़ी लगाकर किसी तरह रोजी-रोटी का जुगाड़ करते हैं। मुंबई ऑपरेशन पूरा करने के एवज में मेरे परिवार वालों को डेढ़ लाख रुपये देने का लालच दिया गया था। पता नहीं, यह रकम परिवार वालों को दी गई या नहीं। मेरे मां-बाप को यह भी पता नहीं होगा कि मैं कहां और किस मुसीबत में फंसा हूं। इसलिए मेरी तरफ से कानूनी लड़ाई लडऩे वाला कोई नहीं है। सुना है दिल्ली वाले एन्काउंटर के बाद कुछ 'रहनुमा' हम लोगों के पक्ष में खड़े हुए थे लेकिन उनकी बोलती उसी के बाद बंद करा दी गई थी। इसलिए उनसे भी कोई उम्मीद नहीं है। अब मुझे आपका ही सहारा नजर आ रहा है। इसलिए आप से यह दरख्वास्त करनी पड़ रही है। आप तो मुसलमानों को मानवाधिकार दिलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक मुकदमे लडऩे पहुंच जाती हैं। जिस तरह आपने गुजरात दंगों में आहत हुए मुसलमानों के हक में लड़ाई लड़ी थी, वैसी ही मुझे आपसे उम्मीद है। अगर आपको खुलकर सामने आने में कोई दिक्कत है तो मुकदमे लडऩे वाली अपनी 'फौज' के किसी बंदे को मेरे लिए नियुक्त कर दीजिए। अगर जिंदगी सलामत रही तो यह एहसान मरते दम तक मानूगा वरना यहां के पुलिस वाले मुझसे वो सारे राज भी उगलवा रहे हैं, जो मेरे आकाओं ने बताने से मना किया था। लेकिन अपनी जान बचाने की खातिर पूरी कहानी उगलनी पड़ रही है। अच्छा होता कि मैं अपने जिन साथियों के साथ यहां आया था, उन्हीं के साथ अपने वतन के लिए 'शहीद' हो गया होता। कम से कम यह मुसीबत तो न झेलनी पड़ती। मैने आपके यह खत लिखने की गुस्ताखी की है। हो सके तो मेरी मदद करना वरना माफी चाहूंगा।
-आपके इंतजार में कसाब

1 comment:

  1. for so-called secular this time is good to correct their past.sunit ji is sayingh true.
    bhai ab atank ki vakalat kaun kar sakta hai!



    raghavdigital@gmail.com

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