अपने इंजीनीयर दोस्त आशीष के लिए जो शब्द और कर्म से बेइंतहा मोहब्बत करता है।
मैं तंग आ चुका हूँ
अपनी बस्ती से उठने वाली तरह-तरह की गंधों से
कभी आती है प्लास्टिक के जलने की गंध
कभी कपड़े और के दूध के जलने की गंध
तो कभी रोटी जलने की गंध!
लेकिन तब मैं सचमुच हैरान हो जाता हूँ
जब उठती है किसी कोने से आदमी के जलने की गंधऔर
गंध ऐसी कि लगता है
कि कय हो जायेगी
साँस फूलती है
दम घुटता है
बेचैनी होती है- बहुत ज्यादा
ऐसे में मुझे भयंकर डर लगता है
लगता है कि कहीं किसी रोज़ मैं भी जला न दिया जाऊं
या कि कहीं ख़ुद ही न आग लगा लूँ और धू-धू कर जलने लगूं
इन गंधों के बारे लोगों से बताता हूँ
लोग कहते हैं- कि मैं पागल हो गया हूँ
कि मेरे नाक में ही खराबी है
कि मुझे अपने दिमाग का इलाज़ कराना चाहिए
कि कुछ नहीं तो छोड़ दूँ इस बस्ती को ही
क्योंकि यह तो हमेशा से ऐसी रही है
इस बस्ती का यही दस्तूर है... .
Thursday, January 22, 2009
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dhanywaad! aur kya kahoon...mera koi basti cchodne ka irada nahin! adami ke jalne ki gandh bhar na rah jaye, isliye rotian-plastic-aur-doodh jalane ko.
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