चौथी-पाचवीं कक्षा में रहा होऊंगा।यानी उमर करीब १०-१२ के आस-पास। तब के अपनी दादी के किस्से मुझे अब भी याद हैं। उस दौर से लेकर आज तक की महत्वपूर्ण घटनाएं भी। यानी याददाश्त बहुत कमज़ोर नहीं है। यहाँ अपनी याददाश्त का बखान करने का मेरा कोई ख़ास प्रयोजन नहीं है, सिवाय इसके कि मुझे देश की राजनीति और उसके सूरते-हाल पर कुछ बात करनी है।
सच-सच कहूं तो वी पी सिंह के ज़माने से भारत के प्रधानमंत्री के बारे में थोड़ा-बहुत भान हुआ। इससे पहले दिमाग में बात आती थी कि प्रधानमंत्री कोई बहुत बड़ा आदमी होता होगा। सम्भव है, वह भारत में न रहता हो। वह वो जो चाह लेगा, वही देश में होगा। वो ऐसा होगा, वैसा होगा, वगैरह...वगैरह। यहाँ तक कि ये ख़याल भी आते थे कि दिल्ली भी अपने ही देश में होगी कि नहीं!! अब तो उस सोच पर मुझे ख़ुद हंसी आती है। खैर...
...तो जबसे मैं देश की राजनीति और संसद के बारे में जानता हूँ, मुझे इतनी निरीह संसद कभी नहीं दिखी, जितनी १४वीं । क्या प्रधानमंत्री, क्या राष्ट्रपति और क्या लोकसभा अध्यक्ष। सब के सब इतने निरीह और असहाय कि मेरे बचपन का वो हौव्वा अब रहा ही नहीं! कोई भी गुंडा-मवाली टाईप का सांसद इन संवैधानिक महापुरुषों! पर कुछ भी अनाप-शनाप बोलता रहे, कहीं कोई बंदिश नहीं! १४वीं लोकसभा का आख़िरी सत्र २६ फरवरी को संपन्न हो गया। उस आख़िरी रोज़ लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ दा ने बड़े बेजान शब्दों में सांसदों को धन्यवाद दिया कि वो शुक्रगुजार हैं, चार साल सबने उन्हें बोलने का मौका दिया। अरे कहाँ मौका दिया सोमनाथ दा? सबसे ज्यादा फजीहत तो आपकी ही कर राखी थी, इन चोट्टों ने। जिस तरह से बड़े संयुक्त परिवार में किसी बूढे को एक पुरानी चारपाई में डाल दिया जाता है, वह बुड्ढा छोटे बच्चों को डांटता-फटकारता है, कई बार अपना डंडा उठाता है, लबेधा भी मरता है, अंत में थक-हार कर चुप हो जाता है और बच्चे अपनी शैतानी में मस्त।अब आप ऐसे ही शैतानों का शुक्रिया अदा कर रहे हैं सोमनाथ दा। क्यों ख़ुद को और उस पद की गरिमा को कम कर रहे हैं?
यही हाल हमारे पी एम् का रहा। मजाल क्या कि एक भी महत्वपूर्ण फैसला अपनी शक्ति से ले लें, कि नहीं भाई, देश के प्रधानमंत्री ने देश हित में ताल ठोककर ये फैसला लिया है। ऐसे में बहुत-बहुत याद आती हैं इंदिरा गांधी। बहरहाल बहुमत की सरकार और गठबंधन की सरकार के पचडे में मैं नहीं पड़ने वाला।मुझे उस संवैधानिक पद के अधिकार कि असलियत से मतलब है। न्यूक्लियर डील मसले पर अमर सिंह और शिबू सोरेन जैसे दो कौडी के नेताओं ने मनमोहन को कैसे नचाया, सबने देखा है।
अब राष्ट्रपति महोदया की बात कर ली जाए। पूरे देश से करबद्ध क्षमा याचना के साथ और भारतीय लोकतंत्र में पूरी निष्ठा के साथ बड़ी विनम्रता के साथ मैं कहना चाहता हूँ कि किसी भी देश का राष्ट्राध्यक्ष इतना निरीह मैंने न देखा और न सुना। किसी को याद हो तो बता देगा, मैं अपनी याददाश्त दुरुस्त कर लूँगा। 26/11 जैसी घटना के बाद हमारे देश के राष्ट्रपति, जो तीनों सेनाओं का सर्वोच्च कमांडर होता है, की इतनी लम्बी चुप्पी मुझे बेचैन करती है।
नौजवान साथियो चिंताएं बहुत हैं, जिनमें सब का उल्लेख यहाँ नहीं किया जा सकता। इतना कहने की भी छटपटाहट इसलिए है कि अगली संसद के लिए चुनावी बिगुल बजने वाला है। इसलिए आगे हम क्या करें, इस पर भी विचार किया जाना चाहिए।
Friday, February 27, 2009
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ye saari beemari usi pratikriyawaad se janmi hai jo ab hame 26/11 aur kuch aur unjason ke sahare jagane ki kosis kar rahi hai. ham us bhedon ke jhund ki tarah ban ke rah gaye hai jo har baar ek charwaahe ke hulhulane tak apne hi gut mein soye pade rahne mein vishwas karte hain. Jab tak logon mein yeh soch nahi aayegi ki mujhse yeh karna hai kyun ki yeh jaroori hai hamare khud ke behtar bhawishya ke liye, hamre desh liye na ki kisi ko jawab dene ke liye, ya kisi sawal ke liye baat nahi banane waali...bas yun hi ham so kar jaagte aur phir jaag kar sote raheinge...
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