Tuesday, March 24, 2009

सयानी मायावती


आहिस्ता-आहिस्ता 15वीं लोकसभा के पर्व का परवान चढऩा शुरू हो गया है। राजनीतिक दलों में गठबंधन टूटने-जुडऩे का सिलसिला जारी है। सीटों के बंटवारे को लेकर खींचतान जारी है। गाली-गलौज भी जारी है, चोरी भी, सीनाजोरी भी। चुनाव आयोग का बेवश प्रलाप भी, पार्टियों की हेकड़ी भी। और जारी हैं वो सारे दांव-पेंच जो वर्षों से भारतीय राजनीति की आदत में शुमार हो गये हैं। इस बीच अबकी आम चुनावों से ऐन पहले जो एक तस्वीर बन रही है, उसमें तीसरा मोर्चा यानी थर्ड फ्रंट सबसे चमकदार लग रहा है। बड़ी पार्टियों में कांग्रेस और बीजेपी एकदम धुंधली नज़र आ रही हैं। भाजपा का कुनबा तो अप्रत्याशित रूप से सिमटा है। सन् '98 में 24 छोटे बड़े दलों से मिलकर बने राजग पर गाज-सी गिर गयी है। कोई भी पार्टी उससे हाथ मिलाने को तैयार ही नहीं हुई। पांच साल पहले अस्तित्व में आये संप्रग की हालत भी नाज़ुक है। वो तो कांग्रेस की डिप्लोमैसी है कि लालू और अमर जैसे बीन बजाने को बेवश हैं।
थर्ड फ्रंट की बात करें तो ये 'भानुमती के कुनबे' से अलग कुछ भी नहीं। इसमें जितने भी दल शामिल हैं उनमें सबकी हालत बिपाशा के उस गाने की तरह है, 'आज इसके पीछे, कल उसके पीछे... जाने किस पर हो जायें फ़िदा। ' और सब साथ भी हुए तो इस गरज से कि हो न हो, शायद कुर्सी मिल जाए। तमाम चीज़ों के बावजूद एक बात जो उभरकर सामने आयी, वो ये कि थर्ड फ्रंट में मायावती का कद औरों के मुकाबले कहीं ज्य़ादा बड़ा है। लोगों को याद होगा कि 16 मार्च के रोज़ दोपहर में मायावती ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की और साफ तौर पर ऐलान किया कि वो किसी भी पार्टी के साथ मिलकर चुनाव नहीं लड़ेंगी। उसी रोज़ शाम को मायावती ने थर्ड फ्रंट के नेताओं को दावत दी। उस 'राजनीतिक प्रीतिभोज' में प्रकाश करात, सीताराम येचुरी, चंद्रबाबू नायडू और देवगौंड़ा समेत उन तमाम बड़े नेताओं ने रसगुल्ले उड़ाए, जो पीएम की आस लगाए बैठे हैं। दोपहर की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद शाम को मायावती के दरवाज़े थर्ड फ्रंट के दमदार नेताओं का दुमदार होना उन सबकी बेचारगी नहीं तो और क्या? इन राजनीतिक घटनाक्रमों के बाद यह कयास लगाना कि थर्ड फ्रंट की ओर से मायावती अगर ख़ुद को पीएम प्रोजेक्ट करतीं और सब हंसी-ख़ुद राजी हो जाते तो कोई गलत नहीं। अब सवाल है कि आखिरकार मायावती का इतना बड़ा कद हुआ कैसे? जवाब बेहद आसान है। शुरू से ही राजनैतिक विश्लेषक मानते रहे हैं कि 'दिल्ली का रास्ता' यूपी से होकर जाता है। वही यूपी, जहां बीएसपी का एकछत्र राज है और उसकी मुखिया हैं मायावती। इस चुनाव में कयास लगाए जा रहे हैं कि यूपी की 80 सीटों में से 40 सीटें मायावती की होंगी। कम से कम मायावती तो यही मानकर चल रही हैं। एक बारगी ये मान लें कि अकेले यूपी में 40 सीटें मायावती के पाले में नहीं जाने वालीं तो इधर-उधर से मिलाकर इस आंकड़े तक तो पहुंच ही जायेंगी। अब 35-40 सीटों का भी चुनावी गणित बैठाया जाए मौजूदा दौर में खिचड़ी सरकारों के लिए किंगमेकर के तौर पर ख़ुद मायावती और दूसरे लोग देख रहे हैं तो उसमें ग़लत कुछ भी नहीं। माया की इस माया ने उनका कद तो बढ़ाया ही है।
अब एक बात मायावती की इस कथित कामयाबी पर। बीएसपी के संस्थापक कांशीराम ने पार्टी को बहुजन की पार्टी कहा था। बहुजन की पार्टी मतलब, दलित-पिछड़ों की पार्टी। बहुत अशिष्ट शब्दों का प्रयोग किया जाय तो अछूतों की पार्टी। ख़ुद कांशीराम और मायावती का यही मानना था और आम जनता का भी, जो खासतौर से इस पार्टी के साथ जुड़े रहे हैं। लंबे समय तक तो बसपा का यही नारा हुआ करता था, तिलक-तराजू और तलवार, इनके मारो जूते चार। अबकी यूपी विधानसभा के चुनावों में जब मायावती की पार्टी को दो-तिहाई बहुमत मिला था तो कई दलित विचारक इसे इस समुदाय की ऐतिहासिक कामयाबी बता रहे थे। उनका मानना था कि असली तौर पर अब दलित जागरूक हुआ है और वह विकास की मुख्यधारा में जुड़ेगा। लेकिन समझ में नहीं आता कि लाख-लाख दलित भाइयों की यह इकलौती बहन क्या करने जा रही है। अकेले यूपी में मायावती ने 16 ब्राह्मणों को टिकट दी है। ठाकुर हैं सो अलग। जिस चुनाव क्षेत्र में जिस जाति का बर्चस्व, उसी जाति का कैंडिडेट। बहुजन पार्टी अब सर्वजन पार्टी हो गई है। दरअसल मायावती को देश की राजनीति के मिजाज़ के बारे में देर से पता चला है। कह सकते हैं कि भोली मायावती अब सयानी हो गई हैं।

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