Monday, March 30, 2009

टाटा का महीन जाल

बुद्धिनाथ मिश्र समकालीन कविता का बड़ा नाम है। उनकी एक कविता का मुखड़ा है, जाल फेंक रे मछेरे, जाने किस मछली में फंसने की चाह हो...। कविता बहुत पहले पढ़ी थी। करीब पांच साल पहले। तब मछली और जाल के बारे में कुछ समझ में नहीं आया और उस कविता को ऐसे भूले कि कभी ज़हन में आयी ही नहीं। अब, जबकि टाटा की बहुप्रतीक्षित और बहुचर्चित कार नैनो भारतीय बाज़ार में बिकने को तैयार है, वह कविता अनायास ही याद आ गयी और याद आ गये बुद्धिनाथ मिश्र ।23 को बड़े ताम-झाम के साथ नैनो को लॉन्च किया गया। इस मौके पर रतन टाटा ने लगभग रुआंसे सुर में कहा कि पांच साल पहले जो एक सपना मन में आया था कि एक आम हिन्दुस्तानी की अपनी कार हो, वह सपना आज साकार हो गया। टाटा ने यह भी कहा कि उन्होंने जो वादा किया था कि कार एक लाख की होगी, सो फिलहाल कीमत वही रहेगी क्योंकि वादा तो वादा होता है। इस लॉन्चिक आयोजन में दुनिया भर के तमाम वे बड़े चमकदार लोग थे, जो रतन टाटा की बिरादरी में आते हैं। नहीं थे तो वे आम लोग जिनके सपनों की यह लखटकिया कार बतायी जाती है। बड़ा दिन था साहब। एक लाख की कार, वो भी मंदी के इस दौर में। दिनभर मीडिया की नज़र उसी खबर पर थी। अब टाटा खांस रहे हैं, अब छींक रहे हैं, अब पानी पी रहे हैं, अब अपने खास लोगों से मिल रहे हैं, अभी थोड़ा वक्त है नैनो पर से घूंघट उठने का... वगैरह-वगैरह। पैकेज पहले से ही तैयार थे, धड़ाधड़ एयर होने लगे। बताया जाने लगा कि किस तरह से लाख मुसीबतों के बाद रतन टाटा ने आम आदमी के सपने को साकार किया है, उसे पहली बार चार पहियों की सवारी करने का मौका दिया है। कुल मिलाकर खबर ये थी और है कि रतन टाटा ने एक लाख लाख की कार नैनो को उतारकर आम आदमी पर अहसान किया है। लेकिन हमारे साथ दिक्कत है। हमारा मन है कि रतन टाटा के इस अहसान को अहसान मानने को तैयार ही नहीं। हमें तो लगता है कि मिश्र जी ने जैसे ऐसे ही वाकयों को ध्यान में रखकर मछली और जाल पर कविता लिखी हो। इतिहास गवाह है कि जब-जब किसी भी मुल्क का मध्यवर्ग खाने-पीने लायक हुआ है, रतन टाटा सरीखे चतुर-सुजान मछेरों (पूंजीपतियों) ने जाल फेंका है। इस बार का जाल इतना महीन और घना है कि मछली फिर फंसेगी, इसमें कोई दोराय नहीं। हमारी ये आदत हो चली है कि लालच दो और हम लालीपॉप खाने को राजी । पैसा पास में नहीं होगा तो रिश्तेदारों से उधार ले लेंगे। अब मामला कार का है, शानो-शौकत बढ़ाने का है तो इसके लिए तो हम कुछ भी करेंगे, किसी भी कीमत पर। पप्पू का एक ट्यूशन कम कर देंगे, थोड़ा रसोई में कटौती कर लेंगे और भी ऐसे ही दूसरे किफायती नुस्खे... बस कार दरवाज़े पर खड़ी हो जाय और पड़ोसी देखें। यहां गौर करने वाली बात ये भी है कि क्वेश्चन सेशन में किसी पत्रकार ने रतन टाटा से सवाल किया था कि एक लाख की कार बनाने के बाद भी क्या यह फायदा दिला पाएगी, उनका जवाब था- बिल्कुल। इस सवाल पर वहां मौजूद कुछ लोगों ने चुटकी भी ली थी लेकिन एक जो सच है, सामने आ ही गया।
(पुनश्च: शुरू में जाल फेंक रे मछेरे... कविता को मैंने बकौल दिनेश कुमार शुक्ल उल्लेख किया था, जो बड़ी भूल थी। ब्लॉग पढ़कर अविनाश जी ने याद दिलाया, कविता मिश्र जी की है। अविनाश जी को धन्यवाद और माफी के साथ पुनः प्रेषित )

No comments:

Post a Comment