कल घर बात की तो पता चला गांव के दो लोगों के बीच झगड़ा हो गया है। झगड़े की वजह थी पानी। एक सरकारी हैंड-पंप है। खूब भीड़ होती है, खासकर शाम के वक्त। बच्चों में होड़ थी- पहले मैं भरूंगा, मैं भरूंगी। पहले बाल्टी-वाल्टी पटकी गईं, फिर गाली-गलौज और फिर मारपीट। बात बाप-दादों तक पहुंच गयी। फिर झगड़ा, और झगड़ा ऐसा कि लाठियां चलीं और पुलिस-थाना।
यह घटना है सतना के एक गांव की। इस झगड़े को बताने का मकसद सिर्फ इतना है कि पानी को लेकर भी अपने देस में पुलिस-कचेहरी होती है और होगी। क्योंकि 22 अप्रैल को पृथ्वी दिवस था, और उसी रोज यह वाकया सामने था लिहाजा मन में कुछ सवाल उठ रहे थे। सोचा कि विकासशील महान भारत के गांवों की कहानी ब्लॉग पर शेयर करनी चाहिए। नहर-नदी के पानी को रोककर अपने-अपने खेतों तक लाने और आगे के किसानों को पानी न मिलने पर झगड़े तो पहले भी होते रहे हैं लेकिन पीने के पानी को लेकर लाठियां चलेंगी, इसकी आशंका कम
यह इलाका बुंदेलखंड से सटा है। वही बुंदेलखंड, जो पिछले तीन-चार साल से भयंकर सूखे की मार झेल रहा है। यहां पानी की समस्या के लिए भी एक खास वजह है। यह क्षेत्र पूरी तरह से मानसून पर निर्भर था लेकिन जब मानसून का मिजाज बेवफा सनम जैसा हो गया तो किसानों ने वैकल्पिक सिंचाई के साधन के तौर पर ट्यूब वेल को अपनाया। जिसके पास भी दो-चार एकड़ जमीन है, ले आये बोरिंग मशीन, खुदवा दिया गड्ढा और डाल दिया सबमर्सिबल। किसानों का एकसूत्रीय कार्यक्रम चला- कुएं पाटो, ट्यूबवेल करावो। बिजली रहे, न रहे, ये उनकी बला। दो दशक पहले शुरू हुई यह ट्यूब-वेल संस्कृति ने ऐसा जाल फैलाया कि अब तो यहां के किसानों के लिए यह स्टेटस सिंबल बन गया है। एक किलोमीटर के एरिया में करीब दर्जन भर ट्यूब-वेल तो होंगे ही। इसका नतीजा ये हुआ कि वाटर लेबल दिनों-दिन गिरता गया और गिरता जा रहा है। आंकड़े बताते हैं कि हर साल करीब 10 फुट वाटर लेबल नीचे जा रहा है। नदी-तालाब कम हैं। जो हैं, पहले मई-जून में सूखते थे अब जनवरी फरवरी में सूख जा रहे हैं। क्षेत्र में कोई बड़ा बांध नहीं है। तालाब और कुएं वाटर-लेबल सही रखते थे लेकिन उन्हें समतल करने की मुहिम से पीने के पानी के लिए हाहाकार मच रहा है। कस्बों और शहरों में निजी बोर-वेल बंद करवा दिये गये हैं। नगर निगम पानी की सप्लाई करता है लेकिन कब, इसके लिए कोई तयशुदा वक्त नहीं है। लोग पानी के लिए रतजगा कर रहे हैं। गांवों में 12 से 20 रुपये प्रति लीटर दूध मिल रहा है। शहरों में 12 से 20 रुपये में मिनरल वाटर। गांवों में पानी-दूध मिले न मिले, पेप्सी-कोका कोला मिल जाएगा- वो भी चिल्ड। यह बात अलग है कि सिर-फुटौवल पानी को लेकर हो रहा
60-65 साल के इंसान की गिनती बूढ़ों में की जाती है। आजादी के 62 साल बाद यानी एक आजाद बूढ़ी पीढ़ी पानी के लिए पड़ोसी का सिर फोड़ रही है, इससे शर्म की बात और क्या हो सकती है। जी-8 और जी-20 सम्मेलनों में हमें ऊंचे ओहदे पर बिठाया जाता है। हम मन ही मन खुश भी हो रहे हैं लेकिन लाख टके का सवाल कि क्या पानी बगैर हम अमेरिका बन पाएंगे? चुनावी महापर्व चल रहा है। कोई पार्टी 3 रुपये में किलो भर चावल देने की बात कर रही है तो कोई दो रुपये में। पानी की बात कोई नहीं कर रहा। सुना है, आडवाणी जी ने कहा है कि वो सत्ता में आये तो पानी को मौलिक अधिकार में शामिल करेंगे। राम ही जानें वो क्या करेंगे लेकिन बुंदेलखंड के साथ देश के अन्य इलाकों में पानी को लेकर जो हाय-तौबा मची है, उसे देखते हुए राष्ट्रीय नीति की जरूरत आ पड़ी है। इसके लिए सरकारों के साथ गैर-सरकारी संगठनों और युवाओं को भी नये सिरे से सोचना होगा। नयी नीतियां बनानी होंगी वरना आने वाले समय में किसी और का पड़ोसी से झगड़ा हो जाए और पुलिस-थाना हो तो कोई अचरज की बात नही
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