Tuesday, February 9, 2010

भइया हमें तो फ्रॉम पसंद आए

शायद ध्यान भी नहीं आता, अगर कल अपने एक अजीज का मैसेज न आया होता। ...सूचना यह थी कि वेलेंटाइन डे नजदीक आ रहा है और तब तक ढेर सारे लोग विश करेंगे। पता नहीं उस वक्त मेरे पास टाइम हो न हो, इसलिए अभी से वेलेंटाइन डे की शुभकामना स्वीकार करो।
अच्छा है। आ रहा है वेलेंटाइन डे। मंदी की मार से आहत मार्केट पर कुछ मरहम लगेगा। आर्चिस के ग्रीटिंग वगैरह बिक जाएंगे... मैसेज कंपनियां तो बोलेंगी ही बल्ले-बल्ले। कुछ दिन पहले मैंने एरिक फ्रॉम को निपटाया है (माफ करें, पढ़कर),  लगा प्रेम के इस खास कारोबारी दिन पर फ्रॉम के बहाने प्रेम पर भी चर्चा कर ली जाए।
प्रेम क्या है? एक अनुभूति या कला? अगर यह एक अनुभूति है, जिसका होना कुछ संयोगों पर निर्भर है तो यह कुछ भाग्यशाली लोगों को ही नसीब होगा। अगर यह कला है तो इसके लिए कुछ ज्ञान और कोशिश की दरकार होगी। एरिक फ्रॉम की एक किताब है 'द आर्ट ऑफ लविंग'। उसका हिंदी अनुवाद 'प्रेम का वास्तविक अर्थ और सिद्धांत' बाजार में उपलब्ध है। किताब इसी तरह के सवालों पर जमकर बहस करती-कराती है। हो सकता है कुछ लोगों का किताब को फाडऩे का भी मन करे।  फ्रॉम के निष्कर्ष और प्रतिस्थापनाओं से कई जगह सहमत हुआ जा सकता है। मसलन, फ्रॉम कहते हैं कि प्रेम एक सामाजिक व्यवसाय है। उनका तर्क है जिस तरह से हम चीजों को खरीदते समय उनका आकर्षण, उनके रंग-रूप, उनके टिकाऊपन, उनसे आत्मसंतुष्टि वगैरह...वगैरह, ठीक उसी तरह से अपने प्रेम करने वाले लोग भी पूरी तरह एक-दूसरे को जांच परख लेते हैं। प्रेमी लोग इसका भी खास खयाल रखते हैं कि भविष्ट में कहीं तंगी-वंगी वाला माहौल तो नहीं होगा। प्रेमी प्रेमिका के बारे में सोचता है- किसी पार्टी में इसे लेकर जाऊंगा तो कोई नाम तो नहीं रखेगा, खिल्ली तो नहीं उड़ाएगा। प्रेमिका सोचती है कि अभी तो इसके पास बाइक है... दो साल बाद कार होगी कि नहीं। अगर इस तरह आशाएं-आकांक्षाएं पूरी होती दिखीं तो समझो प्यार पक्का... हंड्रेड परसेंट पक्का- कसमें-वादों के साथ। और हां, कहीं इन आशाओं, आकांक्षाओं को लेकर लोचा हुआ या दिखा तो कोई गारंटी नहीं। प्रेम जाए चूल्हे-भाड़ में।
बहरहाल, प्रेम के लिए ज्ञान जरूरी है। इसी मान्यता को लेकर आगे बढ़ते हुए एरिक फ्रॉम का सबसे ज्यादा टकराव फ्रायड के विचारों से होता है। फ्रॉम यह विचार करते चलते हैं कि फ्रायड के विचारों को किस सोशल डायनामिक्स के तहत स्वीकार्यता मिली। सबसे पहले फ्रॉम ने प्रेम के बारे में प्रचलित कुछ सामान्य मान्यताओं की पड़ताल की है।

मान्यता एक : प्रेम संयोग से हो जाता है। इसके लिए कुछ खास करने या सीखने की जरूरत नहीं होती।
देखा जाए तो इस सोच की कई वजह हैं। ज्यादातर लोग सोचते हैं कि 'कोई उनसे प्रेम करे' बजाय इसके कि 'वह प्रेम करें'। जाहिर है, उनका ध्यान खुद पर फोकस हो जाता है और वह इस बात की कोशिश शुरू कर देते हैं कि खुद को प्रेम किए जाने योग्य कैसे बनाया जाए। पुरुषों के संदर्भ में प्रेम के योग्य बनने के वही तरीके होते हैं, जो सफल बनने के। यह रास्ता कैसे मित्र बनाएं और सफल कैसे बनें जैसे विचारों और पुस्तकों से होकर जाता है लेकिन अगर कोई यह समझे कि फ्रॉम आत्ममुग्धता से बाहर निकलने को कह रहे हैं तो वह उसकी अपनी सोच होगी। फ्रॉम के मुताबिक जो खुद से प्यार कर सकता है, वही दूसरों से भी प्रेम कर सकता है।

मान्यता दो : प्रेम करना तो आसान है लेकिन समस्या यह है कि किसे प्रेम किया जाए?
किसे प्रेम किया जाए मतलब लक्ष्य। इस सोच में 'लक्ष्य' यानी 'किसे' की तुलना में 'काम' यानी 'प्रेम' सेकंडरी हो जाता है।

मान्यता तीन : आधुनिक मनुष्य की खुशी दुकानों में सजी चीजों को देखने और उन्हें खरीदने से मिलने वाले रोमांच में है। यही नजरिया वह अपने आस-पास के लोगों के प्रति भी अपनाता है। वह ऐसे स्त्री या पुरुष को पाना चाहता है, जो बिकाऊ गुणों के पैकेज हों। यहां पाना ही प्रमुख है, देना गौण है। फ्रॉम के चिंतन के मूल में सिर्फ स्त्री-पुरुष का प्रेम नहीं है, बल्कि उन्होंने प्रेम के सभी रूपों का विस्तार से विश्लेषण किया है। प्रेम के ये रूप हैं - सिम्बॉयटिक या समजैविक प्रेम मतलब मातृवत प्रेम, बंधुवत प्रेम, रागात्मक प्रेम, ईश्वरीय प्रेम और आत्म-प्रेम। इस सबके पीछे चिंतन यही है कि प्रेम करने की क्षमता का विकास कैसे हो।
फ्रायड के मुताबिक प्रेम सिर्फ यौन संवेगों की अभिव्यक्ति है। ये यौन संवेग शरीर में कुछ रासायनिक क्रियाओं और तनाव को जन्म देते हैं। इस तनाव या यौन इच्छा से मुक्ति के लिए मनुष्य यौन संबंध बनाता है लेकिन फ्रॉम पूछते हैं कि तनाव से मुक्ति के लिए यौन संबंध ही क्यों? फ्रॉम का कहना है कि प्रेम की जरूरत हमारे सामूहिक अस्तित्व से जुड़ी है। मनुष्य की अकेलेपन की भावना और एकात्म द्वारा उससे उबरने की तीव्र इच्छा ही प्रेम को जन्म देती है। इस तरह फ्रॉम सभी तरह के प्रेम के अस्तित्व की व्याख्या हमें दे देते हैं। उन्होंने मनोविज्ञान विषय की बढ़ती लोकप्रियता पर भी विचार किया है। उनके मुताबिक विषय की लोकप्रियता समाज में प्रेम की कमी होने की भी निशानी है, क्योंकि अब कोई किसी को प्रेम के माध्यम से समझना नहीं चाहता। उसके पास इतना धैर्य ही नहीं है, उसे सब कुछ इंस्टैंट चाहिए। मनोविज्ञान उन्हें अपने प्रेम-पात्र को समझने का शॉर्टकट लगता है, जबकि फ्रॉम का मानना है कि ज्ञान किसी को समझने का मात्र एक माध्यम है, एकमात्र नहीं। सबसे विश्वसनीय रास्ता प्रेम मार्ग ही है।

1 comment:

  1. मैंने गौर किया है कि फ्रॉम कि ये किताब मेरे जैसे सारे उन लोगों को पसंद आई जिन्हें रोमांटिक लव का कोई एक्सपेरिएंस नहीं है...प्रेम के बारे में हम सब में एक अधूरी से धारणा है, जिसे इस किताब से खूब हवा मिलती है :-)

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