Sunday, January 31, 2010
सतना के प्रोफसर साहब के नाम एक खत
कल सुनील भइया से बात हुई तो उन्होंने बताया कि कोई एक प्रोफेसर साहब कह रहे थे, कैसा पत्रकार है, इस तरह की घटिया सोच रखता है। बहस 26 जनवरी को लेकर है। दरअसल, हुआ यूं कि 26 की सुबह से ही हैपी रिपब्लिक डे के भावुक मैसेज मेरे सेल फोन पर दनदनाने लगे थे। पता नहीं क्या सूझा कि मैंने भी दो लाइन टाइप कर भाई लोगों को जवाब भेजा। वही मैसेज सुनील भइया को भी भेज दिया था। मैंने मैसेज जो टाइप किया था, वह था- 'चौराहे पर जोर-जोर से चीख रहा था 60 साल का बूढ़ा गणतंत्र- मेरी रीढ़ की हड्डी टेढ़ी हो गई है, देश के युवाओ मुझे सहारा दो।'
मैं उन प्रोफसर साहब से विनम्र क्षमा याचना के साथ कहना चाहूंगा कि भारतीय गणतंत्र में मेरी पूरी आस्था है लेकिन कुछ बातें हैं कि जी नहीं मानता। दरअसल, मैं जब दिल्ली की चकाचौंध देखता हूं तो अपने सतना समेत देश के 'सतनाओं' की याद आती है जहां आज भी लोग स्वतंत्रता और गणतंत्र के मायने तलाश रहे हैं। बस्तर और अबुझमाड़ के वनवासियों के बारे में तो कुछ पूछिए ही नहीं। पहली-दूसरी जमात की बात छोड़ दें, आठवीं-दसवीं कक्षा के हमारे छोटे भाई लोग 15 अगस्त और 26 जनवरी को पूरे जोश के साथ स्कूल की तरफ निकल पड़ते हैं। तिथि-त्योहारों या शादी-ब्याह के लिए जो कपड़े रखे होते हैं, दो दिन पहले से प्रेस कराके पूरी तैयारी रखते हैं। उनसे जब पूछा जाता है कि किसलिए जा रहे तो उनका जवाब होता है- झंडा फहराने। क्यों, पता नहीं। उन्हें कभी हमारे गुरुजनों ने बताया ही नहीं कि क्या है 15 अगस्त और क्या है 26 जनवरी। सनद रहे कई यशस्वी गुरुजनों को भी नहीं मालूम होता कि 26 जनवरी का क्या महत्व है, 15 अगस्त के बारे में थोड़ा-बहुत जानते हैं।
बात केवल इतनी सी नहीं है जनाब। देशभर में हम गणतंत्र दिवस मनाने की तैयारी में जुटे थे और रुचिका मामले का मुख्य अभियुक्त एसपीएस राठौर मूंछों में ताव देकर चाव से घूम रहा था। 26 जनवरी से पहले महीनों सुर्खियों में रहे सुकना जमीन घोटाले के अभियुक्त ले. जनरल अवधेश प्रकाश को अंतत: कोर्ट मार्शल की सजा हो ही गई। 26 से चार दिन पहले 'मुंबई के मुख्यमंत्री' का सार्वजनिक बयान था कि जो लोग 15 साल से मुंबई में रह रहे हैं, अब उन्हें ही टैक्सी परमिट दिया जाएगा, बाकी को नहीं और हमारे इनबॉक्स में भाई लोग लिख रहे थे- 28 राज्य... इतने जिले... इतनी भाषाएं... इतनी जातियां और देश अखंड है, इसलिए हैपी रिपब्लिक डे। काहे का हैपी रिपब्लिक डे भाई? अभी देश की विसंगतियों के बारे में बहुत कुछ लिख या कह सकता हूं लेकिन नहीं। मैं प्रोफेसर साहब को बताना चाहता हूं कि मेरी भावनाएं क्या हैं। इन स्थितियों के बीच अगर 60 का गणतंत्र खुद को बूढ़ा महसूस करे और देश के युवाओं का आह्वान करे, मेरी नजर में कोई बुरा नहीं कर रहा वह। आप क्या सोचते हैं... जरूर बताइगा।
नोट : मैंने जानबूझकर मुंबई का मुख्यमंत्री कहा क्योंकि मुंबई में बैठे सियासतदानों को मुंबई के अलावा महाराष्ट्र से मतलब नहीं, भले ही विदर्भ में किसान आत्महत्या करें या नासिक व अकोला के किसान अंगूर, संतरा या कपास को लेकर खून के आंसू रोयें.
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I agree with you. Highlighting something which is rampant does not demean the spirit towards the country or for anything.
ReplyDeleteWe are the commited lot and would remain. Moreever will do whatever it takes to stir the thought process in others.
Way to go!!!!!!!!