Saturday, March 20, 2010

अबकी हंसी आई

भारतीय समाज की परंपरा रही है कि जब प्यास लगती है तो कुआं खोदने की सूझती है। पानी निकले, न निकले अपनी बला से। ऐसा ही कुछ रहा है अपनी सरकारों के साथ। बात ये है कि कल के रोज यानी गुरुवार, 19 तारीख को देश की केंद्रीय  कैबिनेट ने इस बात की मंजूरी दी है कि अब हवाई जहाजों को हाइजैक करने वाले/वालों को सीधे फांसी पर लटाकाया जाएगा। इसके लिए संसद में कानून लाया जाएगा। बात बहुत सीधी सी है कि यह कानून बन भी जाएगा। आखिर नेक विचार तो है ही। केंद्र सरकार में प्रमुख विपक्षी दल भाजपा ने भी इस तरह के कानून का स्वागत किया है। पार्टी प्रवक्ता राजीव प्रताप रूड़ी कह रहे थे कि भाजपा लंबे समय से इस तरह के कानून की मांग करती रही है और अब अगर सरकार इस पर मुहर लगाने जा रही है तो उनकी पार्टी इसका समर्थन करेगी। यह बात अलग है कि सरकार में रहते हुए भाजपा को कभी इस तरह के कानून की जरूरत नहीं पड़ी।
इस खबर को सुनते मैं जमकर हंसा। मेरे हंसने की वजह बहुत साफ है। मैं हंसा इसलिए कि जिन अपराधों के लिए अपने देश में पहले से ही फांसी का प्रावधान है, उसमें अब तक कितनों को फांसी हुई है? भारतीय संसद हमले के दोषी अफजल गुरु को कोर्ट कब का फांसी की सजा सुना चुका है और उसे आज तक फांसी नहीं हुई। मुंबई हमलों का गुनहगार अजमल कसाब की कहानी भी कुछ इसी तरह की है। कभी वह खुले तौर पर गुनाह कबूल करता है और फांसी की मांग करता है तो दाढ़ी-मूंछ मुड़ाकर अपने को नाबालिग बताता है। इस बहुरूपिए का हमारी सरकार क्या करेगी, अभी तक कुछ भी तय नहीं हो सका है। मुमकिन है कोर्ट उसे भी फांसी की सजा सुनाए लेकिन क्या सरकार भी उसे फांसी दे पाएगी? यह सवाल तब तक बना रहेगा जब तक कसाब हमारा सरकारी मेहमान बना रहेगा। सैकड़ों नजीरें हैं इस बाबत। एक बात और। डेविड कोलमेन हेडली नाम का प्राणी मुंबई हमलों का सूत्रधार रहा है। हमारी तथाकथित विश्वविख्यात खुफियां एजेंसियां उसके कारनामों का पता लगाने में नाकाम रही हैं। भला हो उन कमांडोज का जिन्होंने कसाब को जिंदा पकड़ लिया और भला हो अमेरिका का कि उसकी चुस्त-दुरुस्त खुफिया तंत्र ने हेडली को धर दबोचा वरना हमारा सुरक्षा तंत्र हमलावरों का सुराग लगा पाता, यह कहने की हिम्मत नहीं पड़ रही। अब भारत सोच रहा है कि हेडली को उसके हवाले कर दिया जाए लेकिन अमेरिका कहां सौंपने वाला! बगैर कुछ करे-धरे हम अपराधियों को पकडऩा चाहते हैं। याद रहे मुंबई हमलों के साल भर बाद तो हेडली का नाम सामने आया है। इसके बाद भी हमारी सुरक्षा एजेंसियां हेडली के एक फोटो तक का जुगाड़ नहीं कर सकीं कि मीडिया में उसे सार्वजनिक किया जा सके कि हो न हो कही अपने देश के ही किसी गली-मोहल्ले में घूमता हुआ वह मिले तो लोग पुलिस को खबर कर सकें। चार दिन पहले तक अखबारों में हेडली के स्क्रैच ही छपते आए हैं।
अब आप ही बताएं कि सुरक्षा के इतने 'पुख्ता'! हालातों के बीच अगर हवाई जहाज के हाईजैकरों को फांसी की सजा का कानून बनेगा तो उस पर हंसी नहीं आएगी? क्या यह एक सरकारी खानापूर्ति नहीं है?

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