Monday, March 22, 2010

अगर मैं संपादक होता तो...

यकीन मानिए अगर किसी अखबार का मैं संपादक होता तो सुधीश पचौरी का लिखा हरगिज नहीं छपने देता। खुदा न खास्ता मेरी जानकारी के बगैर कहीं छप भी जाता तो उनका पेमेंट नहीं होने देता। मुमकिन है मेरी इस घोषणा के साथ पचौरी जी के कुछ प्रशंसक तैश में आकर मुझे भला-बुरा कहें लेकिन अब मैं भी अपनी जिद पर आ गया हूं।
ऐसा नहीं है कि पचौरी जी के साथ मेरी कोई निजी दुश्मनी है। मैंने दो साल उनकी क्लास अटेंड की है। पढ़े-लिखे अच्छे इंसान और प्रोफेसर हैं वो। दिल्ली विश्वविद्यालय की सेंट्रल रिफरेंस लाइब्रेरी में हिंदी का शायद ही कोई प्रोफेसर जाता हो लेकिन पचौरी जी वहां अक्सर दिख जाते थे। अब भी दिखते होंगे लेकिन अब मैं वहां नहीं दिखता। बड़े पढ़ाकू और लिक्खाड़ हैं। हिंदी साहित्य में उत्तरआधुनिक विचारधारा (हालांकि कई विद्वान उत्तरआधुनिकता को कोई विचारधारा नहीं मानते) का खूंटा गाड़कर उसको थामे रहने का श्रेय पचौरी जी को तो है ही।
यहां लोग सवाल कर सकते हैं कि सर्वगुण संपन्न एक अच्छे पढ़ाकू और लिक्खाड़ प्रोफेसर के साथ ऐसा दुराग्रह क्यों? वजह बहुत साफ है। पिछले तकरीबन छह साल से मैं दिल्ली में हूं। हर अखबार और बहुद हद तक पत्रिकाओं को देखता-पढ़ता रहा हूं और करीब-करीब हर जगह सुधीश पचौरी की मौजूदगी पाई है। उनकी इस मौजूदगी को देखते हुए उनकी तुलना ब्रह्म से की जा सकती है। ब्रह्म जो व्यापक विरज अज...। यत्र-तत्र-सर्वत्र...। यूँ, किसी पत्रिका में कभी उनका परिचय पढ़ा था, रोजना एक हजार से अधिक शब्द लिखने वाले हिंदी के प्राध्यापक...। सचमुच बहुत लिखते हैं अपने पचौरी जी लेकिन सवाल है कि पचौरी जी जो लिखते हैं, किसके कितने पल्ले पड़ता है? दो बार... चार बार... छह बार पढ़ लीजिए किसी आर्टिकल को, कुछ समझ में ही नहीं आता कि आखिर कहना चाहते हैं जनाब। कई बार लगा शायद अपनी समझ कम है, इसलिए उनका लिखा समझ में नहीं आता लेकिन और जो लगनशील और चेतनापुरुष लोग हैं, उनसे जब पूछा कि आज फलां अखबार में पचौरी जी का फलां आर्टिकल छपा है, कुछ समझ में आया तो उन लोगों ने भी असमर्थता जाहिर की। कोई बहुत समझदार हो तो कल यानी रविवार, 21 मार्च के हिंदुस्तान के एडिट पेज पर सुधीश पचौरी का आर्टिकल छपा है, पढ़ के बता दे उसका सार।
तीन साल पहले मैंने रामदरश मिश्र का इंटरव्यू किया था। पत्र-पत्रिकाओं के सिलसिले में बात की तो उनका कहना था कि जब लोग केवल लिखने के लिए लिखते हैं भला कौन पढ़ेगा और क्या समझेगा। इस प्रसंग में उन्होंने बाकायदा सुधीश पचौरी का नाम लिया था। मिश्र जी ने यह भी कहा था पत्र-पत्रिकाओं में एक भरा-पूरा रैकेट काम कर रहा है। किसका लिखा छापना है, किसको कितनी पेमेंट करनी है... सब कुछ तय होता है। ऐसे में किसी आम पाठक को किसी का लिखा समझ में नहीं आता तो उसकी बला।
किसी भी अखबार का संपादकीय पेज उसकी आत्मा माना जाता है। उसमें छपने वाले लेख और विचार एक वर्ग (कम से कम पढ़े-लिखे वर्ग) की चेतना को जगाने, समाज और व्यवस्था के प्रति उसका नजरिया बदलने का काम करते हैं, कुछ नया करने की प्रेरणा देते हैं। लेकिन सुधीश पचौरी टाइप के लेखक, जो केवल लिखने के लिए लिखते हैं, मुझे निराश करते हैं। इन सठियाए लेखकों से मुझे कोफ्त सी होने लगी है।

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