Sunday, August 15, 2010

ऑनर किलिंग पर 'मुंबइया आक्रोश'

मुद्दा तो है... बल्कि कहें कि यह गंभीर मुद्दा है। मुद्दा न होता तो भारतीय संसद में इसकी गूंज न सुनाई देती। अब इस पर लगाम लगाने के लिए सरकार कानून बनाने के बारे में सोच रही है। यह बात अलग है कि खाप पंचायतें और इस तरह के सामाजिक संगठन इसे जायज मानते हैं और इस पर किसी भी तरह के नए कानून के खिलाफ हैं।

ऑनर किंलिंग समाज के लिए ऐसा कलंक बनता जा रहा है कि इस पर चिंता स्वाभाविक है। शायद इसीलिए इज्जत के नाम पर प्यार करने वालों के कत्ल का मामला मीडिया और राजनीतिक बहसों के बाद अब फिल्मों तक पहुंच गया है। अब तक हंसी-ठिठोली वाली फिल्में बनाने के लिए मशहूर प्रियदर्शन ने इस ज्वलंत मुद्दे पर आक्रोश फिल्म बना डाली है। राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता प्रियदर्शन की आक्रोश अंतरजातीय पे्रम पर आधारित है। बिहार की पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म में ऑनर किलिंग के इर्द-गिर्द एक पे्रम कहानी बुनी गई है। अजय देवगन स्टारर इस फिल्म के प्रोमो रिलीज हो चुके हैं और यह फिल्म एक अक्तूबर को सिनेमाघरों में प्रदर्शित होगी।

फिल्म के प्रोमो के शुरू में ही बताया जाता है कि 1947 में ऑनर किलिंग के नाम पर 1114 हत्याएं हुई थीं और इस वर्ष यानी 2010 में अब तक 3235 हत्याएं हो चुकी हैं। फिल्म के प्रोमो में सवाल किया जाता है कि क्या हमें आजादी मिल गई? भारतीय समाज में प्रतिष्ठा किसी भी दूसरी वस्तु या इनसान से बड़ी है। इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है प्रतिष्ठा के नाम पर होने वाली हत्याएं। अगर प्रेम विवाह या अंतरजातीय विवाह की आखिरी परिणति हत्या या समाज निकाला है तो फिल्म में किया गया सवाल निश्चय ही बड़ा सवाल है और मुमकिन है कि सवाल खड़ा करने वालाई भी जुल्म का शिकार बने।

दरअसल, भारतीय समाज की पहचान सहनशील और शांतिप्रिय के तौर पर है। हर जुल्म और अपमान को हंसकर सह लेना हमारी खासियत रही है। ऐसा नहीं है कि खुद पर या किसी और पर जुल्म होते देख हममें से किसी को गुस्सा या खीझ नहीं होती। सबको होती है, मगर कभी आदतन तो कभी सामाजिक भय के कारण हम चुप्पी साध लेते हैं। बिरले लोग होते हैं, जो प्रतिकार करने का साहस जुटा पाते हैं या अपना गुस्सा आक्रोश में बदल पाते हैं।

गौरतलब है कि इस आक्रोश से पहले सन 1980 में भी इसी नाम से एक फिल्म आई थी। गोविंद निहिलानी की उस फिल्म में ताजा ताजा बस यही समझ में आता है कि आक्रोश की अपनी असल आवाज उसके सन्नाटे में दबी होती है, मगर अक्सर इस चुप्पी के पीछे एक आक्रोश दबा होता है और वह इतना खामोश रहता है कि उसका होना न होना बनकर समाप्त हो जाता है। आदिवासियों पर होने वाले अत्याचार पर बनी उस आक्रोश में एक अजीब सन्नाटा है। पूरी फिल्म में लहानिया भीखू (ओम पुरी) कुछ नहीं बोलता, लेकिन उसके हावभाव उसके आक्रोश को खुद कह जाते हैं। लहानिया भीखू अपनी पत्नी की हत्या का आरोपी होता है। हालांकि, भीखू और उसके वकील को पता होता है कि दबंग जमीदारों ने उसकी पत्नी का बलात्कार उसे मार दिया है, मगर कोर्ट को तो सबूत चाहिए। आपबीती सुनाने खुद भीखू की बहन आती है, मगर वहीं कुल्हाड़ी से वार करके भीखू उसे मार देता है। इस तरह डर और अशुरक्षा की भावना के चलते भीखू के सारे आक्रोश महज एक दुर्घटना बनकर समाप्त हो जाते हैं। ऑनर किलिंग जैसे गंभीर मुद्दे पर बनी प्रियदर्शन की आक्रोश 1980 वाली आक्रोश की तरह दुर्घटना नहीं होगी, ऐसा ट्रेलर कहा जा सकता है। कौन है गुनहगार? अक्षय खन्ना के इस सवाल पर चेहरे पर झुर्रियां पड़ीं एक बूढ़े की तमतमाती आवाज कि तुम हो गुनहगार... तुमने सब किया है, हमें आश्वस्त करती है कि यह आक्रोश पूरे शिद्दत के साथ युवा वर्ग को झकझोरने का काम करेगी। यूं, अजय देवगन और अक्षय खन्ना के साथ बिपाशा बसु, राइमा सेन, अमिता पाठक और परेश रावल जैसे कलाकार हैं तो मनोरंजन की गुंजाइश तो है ही।

No comments:

Post a Comment