Thursday, July 22, 2010

पीपली लाइव, अमीर खान और हिंदी सिनेमा


फिल्म पीपली लाइव का एक दृश्य
भाई आमिर खान के भेजे की दाद देनी होगी। बंदा जहां भी खोदता है, पानी निकलने की पक्की गारंटी होती है या यूं कह लीजिए कि खुदाई ही वहां करता है, जहां पानी होने की हंड्रेड परसेंट संभावना हो। पीपली लाइव को ही लीजिए न। इस फिल्म की रिलीजिंग डेट तो 13 अगस्त है, मगर इसके गाने अभी से बच्चे-बच्चे की जुबान पर हैं। कोई हैरत की बात नहीं, अगर यह फिल्म थ्री-इडियट्स की कामयाबी को भी पीछे छोड़ दे। मौका भुना लेने की कला कोई आमिर खान से सीखे।
ऐसा नहीं है कि पीपली लाइव कोई नई चीज है। गरीबी, महंगाई और कर्ज के तले दम तोड़ते किसान तो रोजाना अखबारों की सुर्खियां बनते हैं। संपादकीय पृष्ठों पर तमाम चिंतापरक आलेख छपते हैं। पीपली लाइव की कहानी भी कर्ज के बोझ से आत्महत्या करते किसान, मौतों पर सरकारी दया जिसे साफ-साफ शब्दों में कहें तो मुआवजा और फिर मुआवजों पर भी होने वाली राजनीति को पर्दे पर चित्रित किया गया है। कम से कम ट्रेलर देखने पर तो ऐसा ही लगता है, मगर यह फिल्म बिकेगी तो सिर्फ एक बिला पर और वो है- सखि सइयां तो खूबइ कमात हैं, महंगाई डाइन खाय जात है...। इस ठेठ बुंदेली लोकगीत के आगे रंगरंगीला परजातंतर... जैसा व्यवस्था की धज्जियां उड़ाने वाला गीत भी फीका पड़ जा रहा है। बेशक, महंगाई आज की तारीख में सबसे हॉट मुद्दा है। दिखावे के तौर पर ही सही, सरकारें चिंतित हैं। ऐसे माहौल में आमिर ठान बैठा- अब कैश नहीं किया तो कब? गीतकार को छह लाख पकड़ा दिए और अब मनमाना दुहते रहो....।
बहरहाल, ऐसा नहीं है कि आमिर खान को केवल मौकों को कैश करने आदत है। वे प्रयोगधर्मी रहे हैं। लीक से हटकर कुछ नया परोसने की उनकी आदत है। साल में एक-दो फिल्में ही सही, मगर होती हैं खास। आमिर खान की इसी खासियत ने हिंदी सिनेमा का हुलिया बदलकर रख दिया है। लगान और उसके बाद आईं आमिर खान की सभी फिल्मों ने हिंदी फिल्मकारों को सोचने को मजबूर किया और यही वजह है कि आज हिंदी सिनेमा बदला-बदला नजर आ रहा है। फिल्मों की थीम सहित गीत-संगीत सब में बदलाव महसूस किया जा सकता है। बीती सदी के अंतिम दशक के दम तोड़ते भारतीय सिनेमा को जैसे फिर से पर लग गए हैं। कोई कल्पना कर सकता था कि कबुतरी बोले कबूतर से मुझे छेड़ न छत के ऊपर से... और छत पे सोया था बहनोई, मैं तन्ने समझ कर सो गई से निकलकर महंगाई डाइन खाय जात है और बहती हवा सा था वो... उड़ती पतंग सा था वो... जैसे गीतों तक भारतीय सिनेमा पहुंचेगा? फार्मूला फिल्मों की चौहद्दी से निकलकर हिंदी सिनेमा कभी खुशी कभी गम, बागवान, बंटी और बबली, लागा चुनरी में दाग, तारे जमीं पर, वेलकम टु सज्जनपुर, हल्ला बोल, गुलाल, स्लमडॉग मिलनेयर, पा, राजनीति और पीपली लाइव तक पहुंचा है तो इस बदलाव में आमिर का अच्छा-खासा हक है। यह बात अलग है कि इस रंगरंगीले परजातंतर में फिल्म दर फिल्म आमिर, अमीर भी होते गए।
(टाइटल में आमिर खान को जानबूझकर अमीर खान लिखने की गुस्ताखी के लिए पाठक माफ करें...)

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