Tuesday, September 7, 2010

सुरिजभान काकू आ रहा हूं आपसे मिलने

बीते दिनों उत्तराखंड के लोककवि और जनांदोलनों से जुड़े गिरीश तिवाड़ी उर्फ गिरदा की याद में आयोजित सभा में मैं भी शरीक हुआ। उत्तराखंड बनने से पहले और बाद के दिनों में गिरदा की सक्रिय भागीदारी रही है, चाहे वह चिपको आंदोलन हो, चाहे वह नदी बचाओ आंदोलन हो या फिर उत्तराखंड निर्माण आंदोलन। गिरदा के जीवन-फलक को समझने के बाद मुझे अहसास हुआ कि किसी लोकल शख्श की क्या-क्या तमन्नाएं होती हैं, जीवनसंघर्ष में किस तरह से वह सामाजिक उत्थान के सपने देखता है।
एकाध सामाजिक संगठनों को छोड़कर जीते जी गिरदा के योगदान को किसी ने सलाम नहीं किया। अब तमाम तथाकथित बड़े साहित्यकार, लेखक मसि-कागद खर्च कर रहे हैं।
दरअसल, वाचिक परंपरा वाले इस मुल्क में लोककवियों और लोक कलाकारों की जीते जी कोई पूछ-परख नहीं होती, जबकि इनका आलोक तथाकथित किसी भी भद्र कवि-कलाकार से कम नहीं होता। दूर ग्रामीण अंचलों में ये गुमनामी की जिंदगी जी रहे होते हैं। बानगी के तौर पर अपने सुरिजभान काकू को लीजिए। सुरिजभान काकू का मूल नाम है सूर्यभान सिंह। जैसा कि बोलियों के साथ होता है, सूर्यभान का देशज बन गया सुरिजभान। जिस तरह से शहरों में हर चालीस पार शख्स को लोग अंकल कहने लगते हैं, उसी तरह गांवों में बुजुर्ग लोगों को लोगबाग काका कहते हैं, चाहे वह किसी जाति-धर्म का हो। काका से काकू भी वैसे ही बना, जैसे चाचा से चाचू या मामा से मामू। 
बहरहाल, सुरिजभान काकू पढ़े बिल्कुल नहीं हैं, मगर लढ़े बहुत हैं। हालांकि अब अपना दस्तखत (उनकी बोली में दसकत) हिंदी और अंगरेजी दोनों में कर लेते हैं। शायद कमल, मटक, खटमल.... (पहली-दूसरी जमा में पढऩे वाले बच्चों की तरह) पढ़ लेते हैं क्योंकि बहुत दिनों से उनकी दिली तमन्ना थी- 'लाला मैं एतना पढ़ैं चाहत हौं कि रमायन पढ़ लेवं' (बेटे मैं इतना पढऩा चाहता हूं कि रामायण पढ़ सकूं)। रामायण यानी तुलसी की रामचरित मानस...।
सतना क्षेत्र में जो बोली बोली जाती है, वह विशुद्ध बघेली नहीं बोली जाती, उसमें बघेली और बुंदेली का घालमेल है और यही बोली है अपने सुरिजभान काकू की। इंदिरा गांधी के समय की इमरजेंसी से लेकर हाल-फिलहाल में केंद्र की मनमोहन और राज्य की शिवराज सरकार के कामकाज पर जो दोहे-कुंडलिया रचते हैं, मजाल है कि स्थापित कवि उन गहराइयों तक पहुंचें !! सरकारी कामकाज के झोल की बात हो, सरकारी उपलब्धियों की बात हो, लालफीताशाही हो, पंचायत के पंच-सरपंचों के चाल-चलन और कामकाज की बात हो, सब एक सांस में सुना देते हैं। क्या दोहे गढ़े थे सरकार की नरेगा योजना और शिक्षाकर्मी योजना पर!! मेरा साल में एकाध बार ही गांव जाना होता है और कहीं अगर सुरिजभान काकू से मुलाकात हो गई तो पूरे साल भर के राजनीतिक-सामाजिक घटनाक्रम की जानकारी उनके दोहों-कुंडलियों के जरिए मिल जाती है। अपने काकू को रागों की भी गहरी समझ है। पारंपरिक सोहर-बिआह से लेकर कजरी, दादरा और टप्पा तक और अनूप जलोटा के भजनों से लेकर मुंबइया धुनों की थिरकन उनके लोकगीतों के अंग हैं। सच तो यह है कि सुरिजभान काकू क्या हैं, इस शब्दों मात्र में कहा ही नहीं जा सकता। अपुन को लगता है उन्हें जानने के लिए एक बार उनसे मिलना मांगता है। आप उनसे मिलिए, उनकी जानकारी का कोई विषय बताइए, पांच मिनट उन्हें समय दीजिए और वहीं खड़े-खड़े उस घटना-परिघटना या संबंधित विषय पर दोहा-गीत सुन लीजिए। अब तो काकू के घर भी ट्रैक्टर आ गया है, वरना आज से चार-पांच साल पहले जब अपनी बैलगाड़ी में होते थे तो उनकी स्वरचित फाग और बिरहा सुनते ही बनते थे। चौका-बासन, चना-चबेना, भाजी-रोटी, खेत-खलिहान सब कुछ आपको सुरिजभान काकू की कविता में मिलेगा। 
...मैं अब यहां रुकना चाहता हूं क्योंकि अपने काकू से संबंधित जो भी स्मृतियां हैं, उन्हें याद करते वक्त भावुक हो जाता हूं। बहरहाल, काकू नवंबर में आ रहा हूं, आपसे मिलूंगा जरूर। पंचायत में क्या-क्य हुआ या हो रहा है, सब कुछ मुझे जानकारी चाहिए।
(यहां एक विनम्र निवेदन करना चाहता हूं कि इस तरह की प्रतिभाएं ग्रामीण अंचलों में बहुतायत हैं, उन्हें सहेजने की जरूरत है)

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