Sunday, September 12, 2010

वेल डन दिग्गी


जमाना हो गया मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के मुखारबिंद से शुभ बातें सुने। हाल-फिलहाल उन्होंने पते की बात कही है। दिग्विजय सिंह ने कहा है कि मानव संसाधन विकास मंत्री को उच्च शिक्षा में सुधार करने की कोशिशों के बजाय प्राथमिक स्तर की शिक्षा में सुधार की तरफ ध्यान देना चाहिए। गौरतलब है कि कपिल सिब्बल पर इन दिनों उच्च शिक्षा में कायापलट का भूत सवार है। कभी वे कहते हैं कि देश में विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय बनाए जाएंगे तो कभी कहते हैं कि आईआईटी में भी डॉक्टरी की तकनीकी शिक्षा दी जाएगी। कपिल सिब्बल का तर्क है कि चूंकि, अपने मुल्क की पचास फीसदी से अधिक आबादी युवा है और इनमें से अधिकांश युवा उच्च शिक्षा में प्रवेश नहीं कर पाते, इसलिए और ज्यादा विश्वविद्यालय खोले जाने की जरूरत है। सिब्बल साहब का तो यहां तक कहना है कि विदेशी विश्वविद्यालयों को भी अपने यहां फ्रेंचाइज़ी खोलने दिया जाएगा और ऐसा करने से हार्वर्ड, कैंब्रिज और ऑक्सफोर्ड जैसे तथाकथित दुनिया के नामी विश्वविद्यालयों की पढ़ाई घर बैठे होगी यानी भारत में। इसके लिए सिब्बल ने सदन में बकायदा अधिनियम भी पारित करवा लिया है। 

इसके उलट कांग्रेस के ही तथाकथित वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह प्राथमिक शिक्षा में सुधार की बात कह रहे हैं। दिग्गी राजा की बात सौ फीसदी सही है कि प्राथमिक शिक्षा में सुधार के बगैर उच्च शिक्षा में गुणवत्ता की कल्पना बेमानी है। दुनिया जानती है और अपने देश के मानव संसाधन विकास मंत्रालय की रिपोर्ट बताती है कि दूरदराज के प्राइमरी स्कूलों के 40 फीसदी बच्चे माध्यमिक स्तर तक नहीं पहुंच पाते और इसी तरह 50 फीसदी छात्र माध्यमिक स्तर से कॉलेज नहीं पहुंच पाते। इसकी बड़ी वजह पढऩे-लिखने के बावजूद रोजगार की समस्या है तो आंशिक वजह आर्थिक है। कई चाहकर भी पढ़ नहीं सकते क्योंकि उन्हें बाप-दादों के साथ काम में हाथ बंटाना होता है। ऐसे में हमें दिग्विजय सिंह की बातों में दम दिखता है, मगर उनका यह बयान वास्तविक चिंता कम, सियासी ज्यादा लगता है। आखिर ये वही दिग्विजय ही हैं, जिन्होंने अपने 10 साल के मुख्यमंत्रित्वकाल में प्राथमिक शिक्षा का सबसे अधिक कवाड़ा किया। ठेके पर मास्टर रखे। अपने पहले कार्यकाल में दिग्गी राजा ने शिक्षा कर्मी की जमकर नियुक्ति की थी और इन्हीं यशस्वी शिक्षकों और उनके नाते-रिश्तेदारों के दम पर दोबारा मुख्यमंत्री बने थे। फिर इन शिक्षाकर्मियों की हालत भिक्षाकर्मियों जैसी हो गई और तीसरी बार राघोगढ़ के इस राजकुमार को सत्ता से रुखसत होना पड़ा था। यहां बता दूं कि शिक्षाकर्मियों को नियुक्ति के समय 50 हजार से लेकर एक लाख तक की घूस देनी पड़ी थी और इनके परमानेंट होने के कोई चांस नहीं थे। पूरे प्रदेश से आए दिन भोपाल में धरना-प्रदर्शन करने जाते थे भाई लोग यानी कुल मिलाकर सड़कछाप हो गए थे। यहां एक दिलचस्प तथ्य है कि दिग्गी राजा के समय 500 रुपये प्रति माह में गुरुजीÓयों की भर्ती हुई थी। इन्हें गांव और वार्ड के स्तर पर बच्चों को पढ़ाना होता था। बाद में शैक्षिक प्रोग्रेस रिपोर्ट सरपंच को देनी होती थी। एक वाकया सुनकर तो आप लोग माथा पीट लेंगे कि कोटे से बनी एक महिला सरपंच ने पंचायत की शैक्षिक प्रोग्रेस रिपोर्ट विकास अधिकारी को भेजी और रिपोर्ट के नीचे सील के साथ सरपंच साहिबा का अंगूठा लगा हुआ था। यहां बता दूं कि प्रदेश में इस तरह का यह इकलौता मामला नहीं था, यह तो मात्र बानगी है। 
बहरहाल, सियासी ही सही, दिग्विजय सिंह के विचारों को तरजीह दी जानी चाहिए। भगवा आतंकवाद... हिंदू आतंकवाद... मुस्लिम तुष्टीकरण और धर्मनिरपेक्षता के आडंबर से हटकर पहली बार उन्होंने अपने पढ़े-लिखे होने का प्रमाण जो दिया है।

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