Thursday, April 14, 2011

अन्ना के बहाने

सोचा था कि लिखने-पढ़ने का कोई फ़ायदा नहीं है, 'मगर दिल है कि मानता नहीं.' भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन लोकपाल विधेयक की मांग को लेकर अन्ना हजारे के आंदोलन के बाद कुछ लिखने को मज़बूर हूँ.
दरअसल, बहुत पहले इसी ब्लॉग पर एक पोस्ट की थी-  उस दिन मैं बहुत रोया. पोस्ट हरियाणा के चर्चित रुचिका गिहरोत्रा मामले को लेकर थी, उस मामले में कोई उत्सव नाम के युवक ने डीजीपी एसपीएस राठोर के गाल पर छुरा घोंप दिया था. मैंने लिखा था कि इस देश में युवा क्रांति को कोई नहीं रोक सकता. तब सात समंदर पार रह रहे मेरे बहुत करीबी दोस्त आशीष ने कमेन्ट किया था कि आप जज्बाती हो गए हैं और मैं मन मसोसकर चुप रह गया था. तब मुझे लगा था कि वह भी एक किस्म का भ्रष्टाचार है, जिसमें एक दबंग किस्म का पुलिस अधिकारी अपने धन-बल के दम पर दम भर रहा है और एक युवा उसे बर्दाश्त नहीं कर पा रहा.
बहरहाल, मैं मुद्दे पर लौटता हूँ. अन्ना हजारे ने जंतर-मंतर पर भ्रष्टाचार के खिलाफ़ अनशन किया तो उनके सपोर्ट में उतरे लोगों में आधे से ज़्यादा युवा थे और युवा ऐसे नहीं जो निठल्ले या आवारा किस्म के रहे हों. उनमें ज़्यादातर उच्च शिक्षा प्राप्त थे. इतना ही नहीं, जब मिस्र में हुस्ने मुबारक़ के खिलाफ़ वहां जन क्रांति हुई, तो मैंने फेसबुक पर नोट्स लिखा कि भारत में मिस्र क्यों नहीं हो सकता? मगर मेरे दोस्त को तब भी हैरानी हुई. अब अन्ना का आंदोलन सबके सामने है. यहाँ सवाल किया जा सकता है कि हासिल क्या हुआ? मगर ये काफ़ी नहीं कि देश के कोने-कोने में इस आंदोलन को अप्रत्याशित जन-समर्थन मिला और उसमें भी युवकों की बड़ी फौज़ थी.
भ्रष्टाचार के खिलाफ़ अन्ना के आंदोलन को लेकर तमाम तरह के तर्क-कुतर्क हैं और आए दिन वो सामने भी आ रहे हैं. जो लोग इसे वाहियात बता रहे हैं, उनमें अधिकाँश राजनेता हैं. नाम देखिए- दिग्विजय सिंह, कपिल सिब्बल, सलमान ख़ुर्शीद, एच डी कुमारस्वामी वगैरह-वगैरह... दिग्विजय ने तो चुनौती भी दे डाली कि अन्ना चुनाव जीतकर दिखाएँ और इनके पास आंदोलन करने के लिए धन कहाँ से आता है? अब इस चोट्टे दिग्विजय को कौन बताए कि 73 साल का ये जवान एक झोला लेकर चलता है और जहाँ भी अनशन में में बैठता है, दस-पांच रूपए से ही उसका झोला भर जाता है. उसे आदत ही नहीं है शिक्षाकर्मियों की भर्ती में करोड़ों डकार लेने की. समझ में नहीं आता कि इस तरह के हाईकमान के चमचों से देश की राजनीति अपना दामन कब छुड़ा पाएगी?
लिखने-कहने को बहुत सारी बातें हैं, मगर सिर्फ़ इतना ही कि जिन आरामतलबियों को अब भी कोई शक है, वो 15 अगस्त तक का इंतज़ार करें. एक बात और की इस विधेयक के पास हो जाने से इस देश से भ्रष्टाचार ख़त्म हो जाएगा, संभव नहीं है. इसके लिए सबको अपने गिरेबान में झांकना होगा.

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