Saturday, January 17, 2009

बालिग रामदास


राघवेन्द्र के लिए ....

हर रोज़ डबडबा आती हैं रामदास की आँखें
कमरे की दीवार पर टंगी बाप की फोटो देखकर
जो दो साल पहले ही मारा गया नंदीग्राम में।
बुल्डोज़र से उठने वाली धूल और गर्द धुंधला बना देती हैं- तस्वीर को- बड़ी सावधानी से निहारता है
पहचानने की कोशिश करता है
तभी दिखाई देती हैं कई तस्वीरें उसे
अलग-अलग एंगल से
बायीं ओर से मार्क्स-एंजेल्स-माओ-लेनिन
तो दायीं ओर से गांधी-लोहिया-जेपी, लेकिन
कपडे से साफ़ करने के बाद स्पष्ट छवि दिखाई देती है उसे
जो एक हकीकत है।
रामदास की आँखें भर आती हैं
झुंझलाता है, चिल्लाता है,
देता है भद्दी-भद्दी गलियाँ
'सब के सब हैं बेईमान-गद्दार-धोखेबाज़-विश्वासघाती
सच तो है कि ये मेरे पिता थे जो अब नहीं रहे।'
फिर ठिठका '...नहीं उन सबकी क्या गलती?'
इस बीच पहुँचने लगे सफेदपोश- कई-
करने लगे पेशकश मुआवजे की
शायद इसलिए कि रामदास हो गया है बालिग़
यानी 'अठारह साल' का।

1 comment:

  1. अच्छी कविता है !
    सार्थक एवं संवेदात्मक !

    मेरी शुभकामनाएं !

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