Sunday, April 12, 2009

आडवाणी से बातचीत

पिछली 11 की रात की बात है। दिल्ली विश्वविद्यालय के जुबली हॉल में दिलकश आवाज के मालिक पंकज उधास का लाइव प्रोग्राम था। करीब चार घंटे तक संगीत सुनने-गुनगुनाने के बाद ढाई के आस-पास कमरे पहुंचे तो मुलाकात हो गई भाजपा के सर्वेसर्वा लालकृष्ण आडवाणी से। जाने कब से उनसे बात करने को मन छटपटा रहा था। मिल गए सो शुरू हो गया सवाल-जवाब का सिलसिला।
आडवाणी जी, बड़े खुश दिख रहे हैं, खास वजह?
मैं तो हमेशा खुश रहता हूं। और इस बार तो मेरा प्रधानमंत्री बनना लगभग तय है। देश की जनता यही चाहती है।
आपको नहीं लगता कि जीत को लेकर कुछ ज्यादा ही आश्वस्त हैं?
उसकी वजह है। पिछली बार कांग्रेस ने लेफ्ट पार्टियों के सहयोग से सरकार जरूर बना ली लेकिन कर कुछ नहीं पाई। इस बार लेफ्ट पार्टियों ने किनारा कर लिया है और लालू-मुलायम भी बिदके-बिदके हैं इसलिए प्रबल संभावना है कि सरकार हम ही बनाएंगे।
11 साल बाद आपकी पार्टी में राम की वापसी हुई है। अचानक कैसे याद आ गए राम?
देखिए, हम सोच रहे थे कि आतंकवाद और सुरक्षा के मुद्दे पर चुनाव लड़ेंगे लेकिन पिछले नवंबर में हुए चुनाव-परिणामों को देखकर हमें लगा कि इन मुद्दों पर जनता की कोई रुचि नहीं है। इसके अलावा मैंने कई बार सेकुलर बनने की कोशिश की। पाकिस्तान में जाकर जिन्ना को असली धर्म-निरपेक्ष कहा। कई बार अपने देश में अनेक सभाओं में मुस्लिम भाइयों को समझाने की कोशिश की लेकिन हम पर मुस्लिम समुदाय विश्वास कर ही नहीं रहा। क्या करें हमारी मजबूरी है क्योंकि राम के बिना हमारा सफर आगे बढ़ता ही नहीं। वैसे भी पूरा देश जानता है कि रथ-यात्रा के जरिये मैंने ही भाजपा को इस मुकाम पर खड़ा किया है।
यानी, हिंदुत्व मुद्दे पर ही आप चुनाव लडऩा चाहते हैं?
देखिये, आप भी जानते हैं कि इस बार मेरा लास्ट चांस है। हमारा और व्यक्तिगत तौर मेरा एक ही मुद्दा है कि किसी तरह मैं प्रधानमंत्री बन जाऊं।
आडवाणी जी, उमा भारती आपको प्रधानमंत्री बनना देखना चाहती हैं। आपसे मिली भी हैं। भाजपा उनकी वापसी पर विचार कर रही है क्या?
उमा की वापसी होने या न होने से हमारी पार्टी पर कोई प्रभाव पडऩे वाला नहीं है। विधानसभा चुनावों में जो अपनी सीट नहीं बचा पाया वो हमारे लिए क्या करेगा। इसलिए उनको लेकर हम बहुत गंभीर नहीं हैं। हां, उनकी छटपटाहट देखकर लगता है कि देर-सबेर पार्टी में लेना पड़ेगा।
आपका एनडीए एकदम बिखर गया है। क्या वजह है, लोगों ने आप पर विश्वास नहीं किया?
देखिए ये सब मौकापरस्त लोग और दल हैं। इनका अपने राज्यों के अलावा अन्य राज्यों में कोई वजूद नहीं है। इनके बारे में न आप कुछ कह सकते और न मैं। इस बात का भला क्या जवाब हो सकता है कि रामविलास पासवान सरीखे लोग, जो हर सरकार का साथ सिर्फ इसलिए देते हैं कि उन्हें मंत्री पद मिल जाए। 11 साल से हमारे साथ खड़ी बीजेडी जैसी पार्टी भी कंधमाल मुद्दे पर हमसे अलग हो गई। तब उसे क्यों होश नहीं था, जब राज्य में सरकार थी। और आपसे मैं कहे देता हूं कि चुनाव बाद ऐसे लोग फिर से हमारा समर्थन करें तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
नीतीश कुमार भी लगातार आपके (भाजपा) खिलाफ कुछ न कुछ बोलते रहते हैं। चुनाव बाद कहीं वो भी तो आपको दगा नहीं दे जायेंगे?
(मुस्कुराते हुए...) यही तो है हमारी राजनीति। हम चाहते हैं कि बिहार में नीतीश जी के साथ हम अधिक-अधिक सीटें प्राप्त करें। (फिर गंभीर मुद्रा में...) वैसे नीतीश जी क्या सोचते हैं, मैं कुछ नहीं कह सकता। हो सकता है कि केंद्रीय राजनीति में आने का विचार कर रहे हों। लेकिन मुझे लगता है कि उनकी भी कुछ राजनीतिक मजबूरियां हैं, जिससे वे इस तरह के बयान देते रहते हैं। वैसे चुनाव बाद वो शांत हो जाएंगे, इसका मुझे विश्वास है क्योंकि बिहार में उन्हें भी सरकार तो चलाना ही है न!
वरुण गांधी के भड़काऊ भाषण पर आप कुछ सफाई देना चाहेंगे?
(उत्तेजित स्वर में...) सफाई क्या देना है? पहली बात तो उस सीडी की सत्यता की जांच होनी चाहिए। दूसरी बात, क्या केवल वरुण ने इस तरह का भाषण दिया है। आप तो सुन ही रहे होंगे। इन दिनों तो हर कोई उनसे एक कदम आगे बढऩे की कोशिश में है। वैसे भी वरुण ने पार्टी की विचारधारा से इतर कुछ भी नहीं कहा है।
आडवाणी जी, सुना है कि पार्टी के भीतर ही कुछ लोग आपको पसंद नहीं करते?
कुछ लोग क्यों, ज्यादातर लोग पसंद नहीं करते मुझे। लेकिन यही तो मेरा कमाल है। आप ही बताइये, आज की तारीख कौन से लोग हैं भाजपा में, जिनका जनाधार हो। दिल्ली में बक-बक करने से क्या होता है। एक चुनाव जीतकर या जितवाकर दिखाए कोई। ये पार्टी की भी मजबूरी है कि अटल जी के बाद उसके पास कोई विकल्प नहीं है।
यानी आप नरेंद्र मोदी और शिवराज सिंह जैसे लोगों को भी ललकार रहे हैं?
माफ करिये, मोदी जी के बारे में मेरी ऐसी धारणा नहीं है। इसीलिए गुजरात की एक रैली में मैं कह भी चुका हूं कि मेरे इस मुकाम तक पहुँचने में मोदी जी का बड़ा हाथ है। रही बात शिवराज जी की तो उनका भी जनाधार मध्यप्रदेश तक ही है।
(नोट: सनद रहे कि इन दिनों हमारे ऑर्कुट पर आडवाणी जी की हंसती-मुस्कुराती तस्वीर हमसे वोट के लिए अपील कर रही है। आडवाणी जी बिन बुलाए मेहमान की तरह हमारी प्राइवेट लाइफ में दखल दे रहे हैं। उनसे बातचीत का यह सिलसिला नितान्त काल्पनिक है और काफी लंबा है। फिलहाल इतना ही...)

1 comment:

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