Friday, August 28, 2009

संघ को बच्चा समझ लिए हो का जी!!!

कहना चाहिए कि बीजेपी मुश्किलों के दौर से गुजऱ रही है। लोकसभा चुनावों में हार के सदमे से पार्टी उबर भी नहीं पाई थी कि पूर्व विदेश मंत्री जसवंत सिंह की जिन्ना पर लिखी कि़ताब को लेकर भूचाल आ गया। हरज़ाने के तौर पर जसवंत सिंह की छुट्टी तो हो गई लेकिन अंदरखाने उठा तूफ़ान और तेज़ हो गया। अरुण शौरी ने ताल ठोक दी तो पहले से खार खाए बैठे यशवंत सिन्हा को भी बोलने को मौक़ा मिल गया। और तो और भुवनचंद्र खंडूरी जैसे नेता मूछों पर ताव देकर केद्रीय नेतृत्व को चुनौती देने लगे। हालात कुछ ऐसे बने कि जसवंत सिंह की कि़ताब पीछे छूट गई और सब के सब आडवाणी-राजनाथ और अरुण जेटली पर टूट पड़े।
सच में बीजेपी की हालत त्रिशंकु जैसी है। आडवाणी-राजनाथ और अरुण जेटली, कौन करे या कर रहा है, पार्टी को कमांड, किसी के समझ में नहीं आ रहा। सच पूछिए तो राजनाथ जी तो कभी लगे ही नहीं कि वो पार्टी अध्यक्ष हैं। इन आम चुनावों में हार के बाद आडवाणी जी भी 'पिटा मोहराÓ साबित हुए। रही बात अरुण जेटली की तो सब जानते हैं कि जो व्यक्ति आज तक चुनाव न लड़ा हो, केवल राज्यसभा सदस्य के तौर पर पार्टी में रौब जमाता हो, उसे यशवंत सिन्हा सरीखे नेता भला घास क्यों डालें? जब कोई माई बाप नहीं दिखा तो जाहिर तौर पर आरएसएस का दरवाज़ा खटखटाने के अलावा किसी के पास कोई और चारा नहीं था।
अब आएं असल मुद्दे पर। देश में सूखे से उपजे अकाल के बीच मीडिया में ख़बरों का ऐसा अकाल पड़ा कि इस भागवत पुराण की अलाप के आगे कहीं और मन ही नहीं रमा। जाने कैसे हम ख़बरनबीसों ने नैतिकता का लबादा ओढ़ लिया कि चार दिन पहले तक स्वाइन फ्लू को 'अब तक की सबसे महामारी! घोषित करने की जि़द भी पीछे छूट गई और भाजपा का अंतर्कलह बिकाऊ ख़बर बन गई। ...तो उम्मीद के मुताबिक हम सब के सब बीजेपी-संघ के रिश्तों की दुहाई देने लगे और पार्टी के पतन पर चिंतन-मनन करने लगे (हालांकि, बीजेपी ख़ुद कूल-कूल शिमला में चिंतन कर चुकी है और हासिल कुछ नहीं हुआ)। स्वनामधन्य (अ)दूरदर्शी राजनीतिक विश्लेषकों ने खुले तौर पर ऐलान कर दिया कि बहत जल्द संघ बीजेपी को भंग करके अपनी नई पार्टी खड़ी करेगा। शुक्रवार को संघ प्रमुख मोहन भागवत की चौपाल लगी। कुछ दिन के लिए और मसाला मिल जाए सो सुबह से ही सौ के करीब (बहुतेरे तो चाय नाश्ते के बग़ैर ही) पत्रकार पहुंच गए। थोड़ी देर में मोहन भागवत की प्रेस कॉन्फे्रस... थोड़ी देर में मोहन भागवत की प्रेस कॉन्फे्रस... फ्लैश चलाते-चालाते चार बज गए। भागवत पहुंचे तो लगे सब कुरेदने। बीजेपी से जुड़े सवालों के सिवाय कुछ पूछा नहीं गया। डेढ़ घंटे में जो बात निकल कर आई वह सबने देख-सुन लिया। हम सब हाथ मलते रह गए। क्या हुआ!! भागवत ने बीजेपी के बारे में तो कुछ कहा ही नहीं, सिवाय इसके कि बीजेपी का मौज़ूदा संकट पार्टी का अंदरूनी मामला है और संघ उसमें दखलंदाज़ी नहीं करेगा।

हम सब जानते हैं कि संघ और बीजेपी में बाप-बेटे का रिश्ता है। बीजेपी में जो बवंडर उठा है, उसको लेकर बीजेपी से ज्य़ादा संघ को चिंता है। दिन भर के कांव-कांव के बाद रात में बीजेपी के नेताओं को तो नींद आ जाती है लेकिन संघ के नेताओं को नहीं। दरअसल, संघ नहीं चाहता कि खुले चौराहे जिस तरह से बीजेपी में नाटक हो रहा है, वह रामलीला में बदले। संघ को पता है कि बीजेपी उसी की औलाद है और जैसे-तैसे उसे रास्ते पर लाना है। उसे यह भी पता है कि संसद में आज भी बीजेपी सेकंड लार्जेस्ट पार्टी है और यह भी कि 1975 से पहले एकछत्र राज करने वाली कांग्रेस की इमरजेंसी के बाद ख़ासी फज़ीहत हुई थी और बाद में रिकवरी भी कर ली थी। अब हम आडवाणी या राजनाथ को पार्टी से चलता किए जाने सोच की लिए भागवत के पास गए थे यह ग़लती हमारी है। असल में हमने संघ को बच्चा समझ लिया था।

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