Tuesday, October 20, 2009

ठोकर, दर्द और टीस

मुझे लगती ही रही हैं ठोकरें- हमेशा-
जब भी लगी हैं ठोकरें
तत्काल कभी कोई दर्द का अहसास नहीं हुआ
या यूं कह लीजिए कि उस पर ग़ौर ही नहीं किया
हफ्ते... दसेक दिन... महीनों... वर्षों बाद
अहसास होता है दर्द
तब दर्द नहीं, बल्कि टीस उठती है
तब मैं जानने की कोशिश करता हूं
क्यों और कैसे हो रही है टीस
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दरअसल, दर्द होता है ठोकर के लगने के वक्त भी
लेकिन महसूस ही नहीं करता जीवन की आपाधापी में
या करता भी हूं तो इग्नोर कर देता हूं
यह सोचकर कि क्या फ़र्क पड़ता है इन ठोकरों का!
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बहुत कठिन है टीसों को सहना-सचमुच-
असह्यï दर्द होने पर लगता है
कि काश! संभलकर चलते
कि ठोकरों से बचते
कि उसी वक्त हो जाता दर्द का अहसास
और करा लेते इलाज़।
हां, ठोकरों से बचना तो नामुमकिन है
ज़िंदगी है तो ठोकरें लगेंगी ही
फिर वो ज़िंदगी भी क्या ज़िंदगी, जिसमें ठोकरें न हों!


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