Friday, February 19, 2010

सच, बदलाव को कोई नहीं रोक सकता

इस बार बात भिंड-मुरैना की। शहरातू शायद ही यकीन करें कि आज से 25 साल पहले जिन चंबल की घाटियों में फूलन देवी, लाखन सिंह और मलखान सिंह जैसे नामी डकैतों की बंदूकों की आवाजें सुनाई देती थीं, वहां आज डीजे बज रहा है लेकिन भैया हम तो देख-सुन आए और नाच आए। बिजली 10-15 दिन से नहीं है या महीनों से, इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता। शादी है तो डीजे बजेगा। वीडियो कैमरा होगा और बैंड आर्केस्ट्रा वाला ही होगा। भले ही पैसे सूद पर लिए गए हों। हां, ये सब तमाम ताम-झाम इस बात पर निर्भर करता कि किसकी कितनी हैसियत है, कितनी औकात है।
भिंड-मुरैना क्या, ग्वालियर तक ब्रज का अच्छा खासा प्रभाव है। रीति-रिवाज, रहन-सहन, बोली-भाषा... सब कुछ मथुरा आगरा से मेल खाती हुई। थोड़ा बहुत टोन में अंतर हो सकता है/ है। बड़ी मीठी ब्रज भाषा है साहब। सचमुच कृष्ण की माखन-मिश्री मिली हुई है। लोग आपको गाली भी दें तो लगेगा दुलार कर रहे हैं। यूं मोड़ी च... गाली है लेकिन इस क्षेत्र का रामभजन है (मोड़ी के मायने लड़की होता है, खासकर बेटी के अर्थ में)। अगर दो हमउम्र एक-दूसरे को इस रामभजन के साथ जमकर पुकाररते हैं तो समझ लीजिए कि दोनों के बीच खास याराना है।
खैर... जिस बारात में मैं शरीक हुआ, वह भी हम जैसे मध्यवर्ग की थी। चुनांचे, ऊपर गिनाए गए सारे ताम-झाम मौजूद थे। भाई साहब मोबाइल डीजे... और एक-एक ठर्रा डकार लेने के बाद जो डांस देखने को मिलता है उसकी आप केवल कल्पना कर सकते हैं। कौन किसको रौंद रहा है, कुछ पता नहीं। 10 मिनट पहले सूटबूट-टाई और एक-दूसरे से परफ्यूम मांग कर  (वहां की भाषा में स्प्रे) छिडक कर फोक्कस बनाया था और अब जैसे ईंट के भट्ठे से मजदूरों का दल निकला हो। इस बीच बड़े-बूढ़ों को लगा कि बारात दरवाजे पर पहुंचने के लिए लेट हो रही है। इस वक्त की 50 के ऊपर की पीढ़ी, जिसके  जेहन में चलो रे डोली उठाव... और जब तक न हों फेरे पूरे सात जैसे नदिया के पार टाइप के गीत गहरे तक समाए हैं, उन्हें कजरारे-कजरारे... नगाड़ा-नगाड़ा... जैसे आइटम सांग्स की धुनें भला क्यों सुहाएं? लौंडों पर लगे लाठियां ठूंसने... अपने रामभजन के साथ। थोड़ी देर में जिस ट्रैक्टर पर डीजे चल रहा है, उसके जेनरेटर में कुछ प्रॉब्लम आ गई। अब तो उस डीजे वाले की शामत समझिए। जैसे-तैसे बारात दरवाजे पर पहुंचती है। वहां के धमाल के बारे में कुछ पूछिए ही मत। धमाल क्यों बढ़ जाता है, इसकी वजह भी हम सब जानते हैं। तभी बंदूकधारी बारातियों की तड़ातड़ फायरिंग शामियाने के चीथड़े उड़ा रही है। टेंट वाला बेचारा रो रहा है लेकिन भिंड-मुरैना की बारात हो और कम से कम 50 राउंड फायरिंग न हो, सवाल ही नहीं उठता।
दरअसल, यह संस्कृति शहरों से गांव पहुंची संस्कृति है। इन बदलावों को केवल स्टेटस सिंबल मानकर खारिज नहीं किया जा सकता। पूरे मनोविज्ञान के पीछे अर्थ की महत्ता को नकारा नहीं जा सकता। हकीकत तो यह है कि आज गांवों में लखपती की छोडि़ए, दो-चार करोड़पती मिल जाएंगे। इस तरह के बदलाव अकारण नहीं हैं। बदलाव तो होंगे ही और उसे कोई नहीं रोक सकता।

1 comment:

  1. हाहाहा...भाई साहब मैं कल्पना कर सकता हूँ...ऐसे ही किसी सांस्कृतिक दृश्य ने यकायक किसी के मुंह से "मेरा भारत महान" निकलवा दिया होगा जिसको बाद में भारत सरकार ने बिन-औकात के होते चवन्नी के सिक्कों की तरह फैला दिया...जो भी हो, ऐसा वास्तविक विवरण पढ़ का आनंद आया.

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