...तो अब करीब-करीब तय हो गया है कि विदेशी विश्वविद्यालय भी हमारे देश में अपने कैंपस खोल सकेंगे। केन्द्रीय कैबिनेट ने इससे संबंधित विधेयक को मजूरी दे दी है और अगर यह बिल संसद से भी मंज़ूर हो जाता है तो फिर बल्ले-बल्ले। हार्वर्ड, येल, कैंब्रिज और ऑक्सफोर्ड की डिग्री अपने देश में। विद्वतजन इसे उच्च शिक्षा की कायापलट के तौर पर देख रहे हैं। हमारे मानवसंसाधन विकास मंत्री और नामी वकील कपिल सिब्बल साहब का तर्क है कि उच्च शिक्षा में गुणवत्ता की कमी है। इसे देखते हुए हमारे युवा विदेशों की ओर रुख कर रहे हैं। इसलिए क्यों न विदेशी विश्वविद्यालयों की पढ़ाई अपने देश में हो? अच्छा विचार है सिब्बल साहब... बिल्कुल होनी चाहिए लेकिन हमारी समझ में नहीं आता कि देश में ही अच्छे विश्वविद्यालय क्यों नहीं खोले जाते? उच्च शिक्षा के बाबत यहां राष्ट्रीय ज्ञान आयोग की रिपोर्ट गौर करने लायक है। रिपोर्ट में आयोग ने कहा था कि देश में करीब सात फीसदी युवा ही उच्च शिक्षा तक पहुंच पाते हैं। 2015 तक इसे बढ़ाकर कम से कम 15 फीसदी किया जाना चाहिए। इसी तरह अभी विश्वविद्यालयों की तादाद 500 के करीब और इन्हें भी बढ़ाकर 1500 किया जाना चाहिए। इन तथ्यों से सरकार को कोई मतलब नहीं और सीधा फार्मूला तय किया गया कि उच्च शिक्षा के कायाकल्प के लिए विदेशी विश्वविद्यालयों को देश में उनके अपने कैंपस खोलने दिए जाएं।बात सिर्फ 500 विश्वविद्यालयों की नहीं है। इन 500 विश्वविद्यालयों में ढंग के विश्वविद्यालय उंगली में गिने जा सकते हैं। गोरखपुर विश्वविद्यालय, पटना विश्वविद्यालय और खुद मैंने जहां से बीए पास किया है, अवधेशप्रताप सिंह विश्वविद्यालय रीवा... लंबी फेहरिस्त है जनाब। यहां क्या-क्या और कैसे-कैसे होता है, कौन नहीं जानता। एनरोल कोई होता है, परीक्षा कोई और देता है और डिग्री किसी और के नाम अलाट होती है। यह पहेली समझ से बाहर है कि इस तरह की सुविधाओं को दूर करने के प्रयास क्यों नहीं किए जाते? क्या विदेशी विश्वविद्यालययों के देश में कैंपस खोलकर उच्च शिक्षा की दिशा में सुधार संभव है? यह बात तो सोलह आने सच है कि जब कोई विदेशी संस्थान यहां अपनी दुकान खोलेगा तो उसे ग्राहकों की कमी नहीं होगी। खाए-पिए-अघाए का बड़ा वर्ग है अपने मुल्क में। फीस-ऊस की उन्हें कोई चिंता नहीं होगी। लेकिन यहां चिंता तो इस बात की है इन विदेशी दुकानों के दुकानदार कौन होंगे? ये तो तय है कि हार्वर्ड या ऑक्सफोर्ड अपने कैंपस यहां खोलेंगे तो मास्टरी करने वहां से कोई नहीं आने वाला। तब तो यही होगा कि यहां जो अच्छे मास्टर हैं, उनका उपयोग होगा। उपयोग बेहद आसान होगा क्योंकि वे लोग इन्हें दो-चार गुनी सैलरी दे सकते हैं। तब होगा ये कि हमारे अपने संस्थानों में जो दो-चार अच्छे लोग हैं, वे सब भाग जाएंगे उन्हीं संस्थानों में। एक बात और, इन विदेशी मेहमानों को खुली छूट होगी कि वे अपनी फीस अपने तरीके से तय करेंगे। जाहिर है, जब सात समंदर पार करके यहां कोई आएगा तो चैरिटी खोलने तो आएगा नहीं। उन लोगों की फीस भी अच्छी-खासी होगी और उस फीस को अच्छे-खासे लोग ही दे पाएंगे। ऐसे में जिस भारतीय युवा को उच्च शिक्षा देने की बात कही जा रही है, वह एक सरकारी भ्रम के सिवाय और कुछ नहीं है।
कॉलेज को फिसिकल इन्फ्रास्ट्रकचर बढाने भर से कुछ खास नहीं होने वाला...व्यक्तिगत नजरिये में बदलाव की सख्त जरूरत है...लोगों को ये समझने की जरूरत है की कॉलेज डिग्री की दुकान नहीं है...वहां तभी जाएँ जब सम्बंधित ज्ञान जी लालसा हो...केवल डिग्री बढ़ने से उनको कुछ नहीं मिलने वाला ना देश को...और ये तभी होगा जब रास्ट्रीय प्रतिष्पर्धाओं में चयन का तरीका योग्यता होगी ना की एलिमीनेसन ऑफ़ कैनडीडेट्स
ReplyDelete