जिस एक व्यक्ति के सम्मोहन पर देश की जनता ने भाजपा का प्रधानमंत्री बनाया, उसे अब देश की जनता और खुद भाजपा चुका हुआ मान चुकी है। समझने वाले समझ जाएंगे कि मैं बात अटल बिहारी वाजपेयी की कर रहा हूं। अटल के बाद पार्टी में दो नंबर, और कभी-कभी तो एक नंबर की हैसियत रखने वाले लालकृष्ण आडवाणी भी लगभग चुक गए हैं। वेंकैया पार्टी-अध्यक्षी से ज्यादा कुछ कर नहीं सकते, मुरलीमनोहर जोशी को उनके घरवाले ही नहीं पसंद करते (याद रहे पिछली बार इलाहाबाद से लोकसभा का चुनाव हार गए थे) तो राजनाथ की ठकुरइसी उनके आड़े आती है। अरुण जेटली सिर्फ बोल सकते हैं, न तो चुनाव लड़ सकते और न ही जीत सकते (याद रखें, वे राज्यसभा के लिए चुने जाते हैं)। जसवंत तो बिचारे शहीद ही हो गए। बचा कौन? ...अच्छा सुषमा स्वराज। सुषमा जी की भी अब वह सुषमा नहीं रही। तो क्या कहें भाजपा में सब चुके हुए नेता हैं? अफसोस, मगर कहना ही पड़ेगा। भाजपा में कोई 'वीर पुरुष' दिखता नहीं है जो इस पार्टी की डगमगाती नैया को पार लगाए। ताव-ताव में इस वक्त कोई वरुण गांधी का नाम ले सकता है, मगर उनमें पांचवीं पास बच्चे जैसा बचकाना दिमाग है, इसका एहसास खुद वरुण को भी होगा । वैसे भाजपा की यह नैया डूबेगी नहीं, सिर्फ डगमगाती रहेगी। संघ परिवार अपनी इस दत्तक पार्टी को हरगिज़ डूबने नहीं देगा।दरअसल, यह सब बातें दिमाग में इसलिए आईं कि बीती तेरह तारीख को पटना में भाजपा कार्यकारिणी की बैठक और फिर रैली हुई तो वहां नरेंद्र मोदी ही छाए रहे और बिहार में भाजपा के बड़े नेता सुशील मोदी हाशिये पर दिखे। और तो और, प्रदेश अध्यक्ष सीपी. ठाकुर की भी खास पूछ-परख नहीं हुई जिन्होंने आगामी बिहार चुनावों को देखते हुए इतना बड़ा तामझाम खड़ा किया था।
...तो क्या मान लें कि आज की तारीख में भाजपा का भाग्य विधाता नरेंद्र मोदी हैं? कोई माने या न माने, लेकिन भाजपा से अनुराग रखने वाली देश की 90 फीसदी आबादी नरेंद्र मोदी को सर्वाधिक पसंद करती है। बाकी दस परसेंट में बाकी लोग आते हैं। ग्रामीण इलाकों में केवल 'भाजपा' के नाम पर वोट देने वाले खालिस भाजपाइयों का मंतव्य बता रहा हूं। समझ लीजिए कि छोटे-मोटे एक व्यक्तिगत सर्वे के आधार पर ये बातें कह रहा हूं। यहां सवाल उठता है कि वाजपेयी और आडवाणी के बाद नरेंद्र मोदी इतने हिट कैसे हो गए? एक बहुत आसान-सी और आम धारणा है- गोधरा कांड की वजह से। मगर मुझे लगता है यह पूरा सच नहीं है। गोधरा के अलावा भी मोदी ने 'कुछ' किया है। इस 'कुछ' में कुछ उनका पारदर्शी शासन है, कुछ गुजरात की आर्थिक उन्नति है, कुछ इन्फ्रास्ट्रक्चर का डेवलपमेंट है और बहुत कुछ है कट्टर हिंदुत्व। मोदी का हिंदुत्व आडवाणी के हिंदुत्व की तरह कभी नहीं रहा। सब जानते हैं कि पार्टी में लौहपुरुष का तमगा पाए आडवाणी ने खुद की उदार छवि दिखाने का अनेक बार पाखंड किया है। यह पाखंड नरेंद्र मोदी के पास नहीं है। यही उनके हिट होने को कारणों में से एक है। जनमत और अपने विवेक के आधार पर यह कहने में मुझे कतई परहेज़ नहीं कि मोदी अगर राष्ट्रीय राजनीति में आते हैं तो ज्यादा कुछ नहीं तो अगले चुनाव में वह पार्टी को नो प्रॉफिट, नो लॉस पर रख सकते हैं, मगर एक सच यह भी है कि राष्ट्रीय राजनीति में मोदी को आना ही नहीं है। वजह बहुत साफ है। मोदी खुद कोई रिस्क नहीं लेना चाहेंगे। राजनीति में ग्रह-नक्षत्र बड़ी तेजी से बदलते हैं। मोदी को पता है कि अपनी ब्रांड इमेज के अनुरूप आम चुनावों में सीट नहीं ला पाए तो कहीं के नहीं रह जाएंगे- न घर के न घाट के। इसलिए फिलहाल, भाजपा के बारे में यही कहा जा सकता है कि वह तो गई काम से... राहुल गांधी ने कांग्रेस को बहुत बढ़त दे दी है। यहां किसी के भी मन में यह बात आ सकती है कि यह बंदा मोदी का गुणगान क्यों कर रहा है? इसलिए साफ कर दूं कि मोदी से अपनी कोई रिश्तेदारी नहीं है और न ही भाजपा से कोई खास लगाव। लगाव है तो इस हद तक कि लोकतांत्रिक सराकारों की सत्ता में एक ही दल या पार्टी जब लंबे समय तक काबिज रहती है तो शासन निरंकुश हो जाता है। किसी राष्ट्र या राज्य के लिए यह स्थिति शुभ नहीं है। यहां यह न भूलें कि ब्रिटेन में सत्ता परिवर्तन हुआ है और वहां के इतिहास में पहली बार गठबंधन सरकार बनी है तो कहीं न कहीं आम जनता की मजबूरी रही होगी। (नोट : करीब महीने भर से इस ब्लॉग पर पोस्टिंग को लेकर प्रॉब्लम थी... कुछ विचारों को पोस्ट करने की कोशिश की थी, मगर पता नहीं किन टेकनिकल वजहों से संभव नहीं हुआ...)
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