Saturday, September 18, 2010

सठिया गए हैं शिवराज सिंह

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह को सुर्खियों में बने रहने का रोग लग गया है। हफ्ते-दस दिन में  कुछ न कुछ ऐसा उगल बैठते हैं, जिससे राष्ट्रीय स्तर पर छा जाते हैं और फिर जब अच्छी-खासी छीछा-लेदर हो जाती है तो फिर या तो माफी मांगते हैं या फिर कहते हैं कि मेरे बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है। फिलहाल, कॉमनवेल्थ खेलों को लेकर अपनी भड़ास निकाली है शिवराज ने। उन्होंने कॉमनवेल्थ से जुड़ी मशाल क्वीन बैटन का बहिष्कार किया है और न केवल मशाल का बहिष्कार किया, उन्होंने तो यहां तक कहा कि मेरा तो मन कर रहा था कि इसकी राज्य में एन्ट्री ही न होने दूं। चुनाव हारे मणिशंकर ऐय्यर को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया गया तो इन खेलों के संबंध में उनकी भड़ास तो समझ में आती है, मगर शिवराज किन वजहों से इसका विरोध कर रहे हैं, समझ में नहीं आता। दरअसल, पहली बार पांच साल में तीन मुख्यमंत्री (भाजपा के) देख चुके मध्यप्रदेश में शिवराज दोबारा मुख्यमंत्री बने तो उन्हें लगा कि सारा किया-धरा उनका है, इसीलिए जनता ने दोबारा सत्ता की चाबी सौंपी है, सो जो भी मन में आएगा, बोलते रहेंगे। यहां शिवराज भूल जाते हैं कि किन्हीं वजहों से जनता अगर उन्हें सत्ता सौंपती है तो इसका मतलब यह कतई नहीं कि वे तानाशाह हो जाएंगे, जैसा कि आजकल उनका रवैया है। अब यहां थोड़ी चर्चा उन वजहों की भी, जिसके बूते वे दोबारा मुख्यमंत्री बने। असल में पहले कार्यकाल के बाद जनता में शिवराज की छवि विकास पुरुष की बन गई। कुछ संयोग ने भी उनका साथ दिया। हुआ यूं कि 10 साल के दिग्विजय सिंह के लूटराज के बाद जब भाजपा की सरकार बनी तो उसी वक्त केंद्र सरकार की राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना की गई। गांव-गांव सड़कें बनीं, तालाब बने और थोक के भाव वृक्षारोपण का काम हुआ। इस कथित विकास में स्थानीय मजदूरों को रोजगार मिला और गांवों की सूरत कुछ-कुछ बदली नजर आने लगी। यह बात अलग है कि नरेगा-मनरेगा में सरपंच-सेकेट्रियों ने इतना घर भर लिया है कि उनकी दो पीढ़ी आलीशान तरीके से न सही तो सामान्य तरीके से बैठे-बैठे खा सकती है। इस विकास कार्य में जिन मजदूरों को काम मिला, वे शिवराज को विकास पुरुष तो कहने ही लगे, अच्छे-अच्छे पढ़े-लिखे और छुटभैये नेता लोगों ने भी उनकी जमकर तारीफ की और इसका असर यह हुआ कि शिवराज के नेतृत्व में दोबारा भाजपा ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया। सच्चाई तो यह है कि शिवराज की विकास पुरुष वाली छवि का आकलन करना हो तो राज्य के किसी भी जिले चले जाएं, वही सब देखने को मिलेगा जो 20 साल पहले था। अलबत्ता, जर्जर पुल, सरकारी इमारतें, बिजली-पानी की किल्लत और सड़ांध मारती गंदी बस्तियों में जरूर इजाफा हुआ है।
फिर से मौजूदा प्रसंग में लौटें तो कॉमनवेल्थ खेलों को लेकर शिवराज की बयानबाजी शर्मनाक है। एक राज्य के मुखिया होने के नाते उनसे इस तरह की उम्मीद नहीं थी, मगर कोई सठिया जाए तो उसके लिए कोई कर भी क्या सकता है? कॉमनवेल्थ खेलों से जुड़ी अनियमितताओं की आलोचना हो सकती है और होनी चाहिए, मगर अब जबकि 15 दिन बाकी रह गए हैं, शिवराज इस बालसुलभ हठ से क्या जाहिर करना चाहते हैं, यह वे जानें या उनके सलाहकार। ये खेल देश की प्रतिष्ठा से जुड़े हैं और जैस-तैसे निपट जाएं, अब हर कोई यही चाहता है। हां, अगर शिवराज का कोई व्यक्तिगत आग्रह-दुराग्रह (जो कि एक सार्वजनिक फिगर के संदर्भ में मान्य नहीं है) है तो उनकी यह सोच उन्हें मुबारक हो। वैसे शिवराज को एक बात नहीं भूलनी चाहिए कि खेल मंत्री एमएस गिल साहब बहुत पहले कह चुके हैं कि इस तरह के आयोजन बेटी के ब्याह की तरह होते हैं, जो बगैर तैयारी के भी ऐन वक्त पर निबटा लिए जाते हैं।

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