नवरात्र लगते ही शुरू हुईं रामलीलाएं तमाम
मित्र का बारंबार आग्रह
हम भी पहुंचे देखने
खूब भीड़भाड़, चहल-पहल
हर आयु-वर्ग के लोग पहुंचे थे-आज-
तीसरा दिन था-
मंचन था राम वनवास।
पहला दृश्य:
पत्नी सीता को समझा रहे थे प्रभु श्रीराम-
बोले- 'सीते! तुम मत कष्ट सहो...
तुम मत जाओ मेरे साथ' प्रत्युत्तर-
'मैंने तो पहले ही कर लिया है निर्णय
नहीं जाऊंगी आपके साथ वन को
आप ठहरे मर्यादापुरुषोत्तम, आज्ञाकारी
निभाओ वचन पिता का
मैं क्यों कर जाऊं...
मेरे वश की नहीं यह तपस्या
जंगल भी कोई रहने की जगह है?'
दर्शक हतप्रभ, संयोजक परेशान
आखिर हो क्या रहा है ये
सीता को समझाया गया-
'तुम्हारे वन गये बगैर कैसे होगा तुम्हारा हरण
और कैसे होगा राम-रावण युद्ध, रावण मरण
यह नाटक बंद करो और फौरन जाओ वन राम के साथ।'
जैसे-तैसे तैयार हुईं सीता
अब लक्ष्मण की न-नुकुर
आखिरकार समझा लिया गया उन्हें भी- तर्कों के सहारे।
निकल पड़े वन को तीनों
माताएं रो-रो कर हैरान तीनों
कैकेई को भी पहली बार रोते देखा इस रामलीला में।
दूसरा दृश्य:
गंगा तट पर बैठा था केवट निराश
आज मंदा था धंधा
देखते ही लपका-
'आओ जी, दो मिनट में पहुंचा देता हूं उस पार'
और शीघ्र ही तीनों पहुंचे गंगा पार
केवट से व्यथा सुनाई राम ने
मगर अड़ गया वह भी-
'माफ करो प्रभु
मेरे भी हैं बाल-बच्चे
सबका भरना पड़ता है पेट मुझे ही
साग-सब्जी भी ले जाना है शाम को
...फिर क्यों मूर्ख बनाते हो हम जैसों को
पढ़े-लिखे नहीं, इसलिए?
सब जानता हूं मैं
राजकुमार हो अयोध्या के
सदियों की कमाई रखी है खजाने में
मेरी मजदूरी के लिए इतनी मजबूरी!
फिर कोई खैरात तो नहीं मांगता...
जैसे भी हो, आप ही निकालो रास्ता'
...और अंत में देनी पड़ी अंगूठी सीता की ही
(दर्शकों की गालियां केवट को)
इस बार निषाद भी नहीं पहुंचा आवभगत करने राम की
दिन थे खेती-किसानी के।
किसी तरह रहने लगे चित्रकूट में
राम-लक्ष्मण-सीता पर्णकुटी में।
दृश्य तीन :
कुटिया पर पहुंची सूर्पणखा
विवाह का प्रस्ताव और राम-लक्ष्मण की समझाइश
बात यहां तक पहुंची कि काट ली जाय नाक इसकी
क्रोधित लक्ष्मण तैयार, मगर....
तभी आ धमाका लंकेश यानी रावण
बिना पोशाक के ही मंच पर
अब बंद होना चाहिए प्रतिशोध का यह अत्याचार...'
पूरे पंडाल में सन्नाटा, दर्शकों में खामोशी
और संयोजक तो पसीना-पसीना
कोसने लगा रावण को-
'क्यो आ धमके तुम मंच पर समय से पहले?'
रावण के इरादे भी थे खतरनाक
अड़ गया संयोजक से ही-
'सब तुम्हीं लोग कराते हो पैसे की खातिर-
कब तक... आखिर कब तक कटती रहेगी सूपर्णखा की नाक
और होता रहेगा सीता का हरण?'
मंच का माहौल था गरम
दर्शक उठ-उठकर लगे थे जाने
मित्र का बारंबार आग्रह
हम भी पहुंचे देखने
खूब भीड़भाड़, चहल-पहल
हर आयु-वर्ग के लोग पहुंचे थे-आज-
तीसरा दिन था-
मंचन था राम वनवास।
पहला दृश्य:
पत्नी सीता को समझा रहे थे प्रभु श्रीराम-
बोले- 'सीते! तुम मत कष्ट सहो...
तुम मत जाओ मेरे साथ' प्रत्युत्तर-
'मैंने तो पहले ही कर लिया है निर्णय
नहीं जाऊंगी आपके साथ वन को
आप ठहरे मर्यादापुरुषोत्तम, आज्ञाकारी
निभाओ वचन पिता का
मैं क्यों कर जाऊं...
मेरे वश की नहीं यह तपस्या
जंगल भी कोई रहने की जगह है?'
दर्शक हतप्रभ, संयोजक परेशान
आखिर हो क्या रहा है ये
सीता को समझाया गया-
'तुम्हारे वन गये बगैर कैसे होगा तुम्हारा हरण
और कैसे होगा राम-रावण युद्ध, रावण मरण
यह नाटक बंद करो और फौरन जाओ वन राम के साथ।'
जैसे-तैसे तैयार हुईं सीता
अब लक्ष्मण की न-नुकुर
आखिरकार समझा लिया गया उन्हें भी- तर्कों के सहारे।
निकल पड़े वन को तीनों
माताएं रो-रो कर हैरान तीनों
कैकेई को भी पहली बार रोते देखा इस रामलीला में।
दूसरा दृश्य:
गंगा तट पर बैठा था केवट निराश
आज मंदा था धंधा
देखते ही लपका-
'आओ जी, दो मिनट में पहुंचा देता हूं उस पार'
और शीघ्र ही तीनों पहुंचे गंगा पार
केवट से व्यथा सुनाई राम ने
मगर अड़ गया वह भी-
'माफ करो प्रभु
मेरे भी हैं बाल-बच्चे
सबका भरना पड़ता है पेट मुझे ही
साग-सब्जी भी ले जाना है शाम को
...फिर क्यों मूर्ख बनाते हो हम जैसों को
पढ़े-लिखे नहीं, इसलिए?
सब जानता हूं मैं
राजकुमार हो अयोध्या के
सदियों की कमाई रखी है खजाने में
मेरी मजदूरी के लिए इतनी मजबूरी!
फिर कोई खैरात तो नहीं मांगता...
जैसे भी हो, आप ही निकालो रास्ता'
...और अंत में देनी पड़ी अंगूठी सीता की ही
(दर्शकों की गालियां केवट को)
इस बार निषाद भी नहीं पहुंचा आवभगत करने राम की
दिन थे खेती-किसानी के।
किसी तरह रहने लगे चित्रकूट में
राम-लक्ष्मण-सीता पर्णकुटी में।
दृश्य तीन :
कुटिया पर पहुंची सूर्पणखा
विवाह का प्रस्ताव और राम-लक्ष्मण की समझाइश
बात यहां तक पहुंची कि काट ली जाय नाक इसकी
क्रोधित लक्ष्मण तैयार, मगर....
तभी आ धमाका लंकेश यानी रावण
बिना पोशाक के ही मंच पर
लक्ष्मण को लगाई ललकार
'बंद कर यह अनर्थ मूर्ख बालक
मैंने तय कर लिया है
न तुम काटो सूर्पणखा की नाक
न मैं करूंगा सीता का हरणअब बंद होना चाहिए प्रतिशोध का यह अत्याचार...'
पूरे पंडाल में सन्नाटा, दर्शकों में खामोशी
और संयोजक तो पसीना-पसीना
कोसने लगा रावण को-
'क्यो आ धमके तुम मंच पर समय से पहले?'
रावण के इरादे भी थे खतरनाक
अड़ गया संयोजक से ही-
'सब तुम्हीं लोग कराते हो पैसे की खातिर-
कब तक... आखिर कब तक कटती रहेगी सूपर्णखा की नाक
और होता रहेगा सीता का हरण?'
मंच का माहौल था गरम
दर्शक उठ-उठकर लगे थे जाने
उधर बढ़ती ही जा रही थी रावण संयोजक की बहस
तभी राम ने किया बीच-बचाव
दर्शकों को संबोधित करके बोले
'भद्र जनो! हमें माफ करें
हमारा भी ध्येय नहीं है खून-खराबा
रावण भाई चेत गए हैं
हम लक्ष्मण को भी समझा लेंगे
...तब तक दो-चार लोग ही बचे थे दर्शक दीर्घा में
सब लौट रहे थे घर को
गाली देते राम-रावण को
हम भी लौट आए कुछ सोचते हुए।
ऐसा हो सकता है। तथाकथित धर्मनिरपेक्ष 'इंडियाÓ में कुछ भी हो सकता है। जहां धर्म और धार्मिकता में फर्क नहीं समझा जाता।
ReplyDeleteधर्म और धार्मिकता में फर्क क्या है सर???
ReplyDeleteबहुत अच्छा लगा पढ़ कर..बहुत दिनों बाद अच्छा व्यंग पढ़ने को मिला.
ReplyDeleteधन्यवाद..
वैसे पिछले प्रश्न का उत्तर दूँ तो मै सहमत हूँ सुभाष जी से...सामायिक रूप से धर्म और धार्मिकता में वही फर्क है है जो विवेकानंद और नित्यानंद में है...एक संस्कार और सत्कर्म सिखाता है दूसरा उन्माद और आतंक..एक सब भिन्नताओं के बाद भी सबको गले लगाना सिखाता है और दूसरा मानवता को छिन्नित करना सिखाता है|