Thursday, July 22, 2010

पीपली लाइव, अमीर खान और हिंदी सिनेमा


फिल्म पीपली लाइव का एक दृश्य
भाई आमिर खान के भेजे की दाद देनी होगी। बंदा जहां भी खोदता है, पानी निकलने की पक्की गारंटी होती है या यूं कह लीजिए कि खुदाई ही वहां करता है, जहां पानी होने की हंड्रेड परसेंट संभावना हो। पीपली लाइव को ही लीजिए न। इस फिल्म की रिलीजिंग डेट तो 13 अगस्त है, मगर इसके गाने अभी से बच्चे-बच्चे की जुबान पर हैं। कोई हैरत की बात नहीं, अगर यह फिल्म थ्री-इडियट्स की कामयाबी को भी पीछे छोड़ दे। मौका भुना लेने की कला कोई आमिर खान से सीखे।
ऐसा नहीं है कि पीपली लाइव कोई नई चीज है। गरीबी, महंगाई और कर्ज के तले दम तोड़ते किसान तो रोजाना अखबारों की सुर्खियां बनते हैं। संपादकीय पृष्ठों पर तमाम चिंतापरक आलेख छपते हैं। पीपली लाइव की कहानी भी कर्ज के बोझ से आत्महत्या करते किसान, मौतों पर सरकारी दया जिसे साफ-साफ शब्दों में कहें तो मुआवजा और फिर मुआवजों पर भी होने वाली राजनीति को पर्दे पर चित्रित किया गया है। कम से कम ट्रेलर देखने पर तो ऐसा ही लगता है, मगर यह फिल्म बिकेगी तो सिर्फ एक बिला पर और वो है- सखि सइयां तो खूबइ कमात हैं, महंगाई डाइन खाय जात है...। इस ठेठ बुंदेली लोकगीत के आगे रंगरंगीला परजातंतर... जैसा व्यवस्था की धज्जियां उड़ाने वाला गीत भी फीका पड़ जा रहा है। बेशक, महंगाई आज की तारीख में सबसे हॉट मुद्दा है। दिखावे के तौर पर ही सही, सरकारें चिंतित हैं। ऐसे माहौल में आमिर ठान बैठा- अब कैश नहीं किया तो कब? गीतकार को छह लाख पकड़ा दिए और अब मनमाना दुहते रहो....।
बहरहाल, ऐसा नहीं है कि आमिर खान को केवल मौकों को कैश करने आदत है। वे प्रयोगधर्मी रहे हैं। लीक से हटकर कुछ नया परोसने की उनकी आदत है। साल में एक-दो फिल्में ही सही, मगर होती हैं खास। आमिर खान की इसी खासियत ने हिंदी सिनेमा का हुलिया बदलकर रख दिया है। लगान और उसके बाद आईं आमिर खान की सभी फिल्मों ने हिंदी फिल्मकारों को सोचने को मजबूर किया और यही वजह है कि आज हिंदी सिनेमा बदला-बदला नजर आ रहा है। फिल्मों की थीम सहित गीत-संगीत सब में बदलाव महसूस किया जा सकता है। बीती सदी के अंतिम दशक के दम तोड़ते भारतीय सिनेमा को जैसे फिर से पर लग गए हैं। कोई कल्पना कर सकता था कि कबुतरी बोले कबूतर से मुझे छेड़ न छत के ऊपर से... और छत पे सोया था बहनोई, मैं तन्ने समझ कर सो गई से निकलकर महंगाई डाइन खाय जात है और बहती हवा सा था वो... उड़ती पतंग सा था वो... जैसे गीतों तक भारतीय सिनेमा पहुंचेगा? फार्मूला फिल्मों की चौहद्दी से निकलकर हिंदी सिनेमा कभी खुशी कभी गम, बागवान, बंटी और बबली, लागा चुनरी में दाग, तारे जमीं पर, वेलकम टु सज्जनपुर, हल्ला बोल, गुलाल, स्लमडॉग मिलनेयर, पा, राजनीति और पीपली लाइव तक पहुंचा है तो इस बदलाव में आमिर का अच्छा-खासा हक है। यह बात अलग है कि इस रंगरंगीले परजातंतर में फिल्म दर फिल्म आमिर, अमीर भी होते गए।
(टाइटल में आमिर खान को जानबूझकर अमीर खान लिखने की गुस्ताखी के लिए पाठक माफ करें...)

Friday, June 18, 2010

भाजपा तो गई काम से...

जिस एक व्यक्ति के सम्मोहन पर देश की जनता ने भाजपा का प्रधानमंत्री बनाया, उसे अब देश की जनता और खुद भाजपा चुका हुआ मान चुकी है। समझने वाले समझ जाएंगे कि मैं बात अटल बिहारी वाजपेयी की कर रहा हूं। अटल के बाद पार्टी में दो नंबर, और कभी-कभी तो एक नंबर की हैसियत रखने वाले लालकृष्ण आडवाणी भी लगभग चुक गए हैं। वेंकैया पार्टी-अध्यक्षी से ज्यादा कुछ कर नहीं सकते, मुरलीमनोहर जोशी को उनके घरवाले ही नहीं पसंद करते (याद रहे पिछली बार इलाहाबाद से लोकसभा का चुनाव हार गए थे) तो राजनाथ की ठकुरइसी उनके आड़े आती है। अरुण जेटली सिर्फ बोल सकते हैं, न तो चुनाव लड़ सकते और न ही जीत सकते (याद रखें, वे राज्यसभा के लिए चुने जाते हैं)। जसवंत तो बिचारे शहीद ही हो गए। बचा कौन? ...अच्छा सुषमा स्वराज। सुषमा जी की भी अब वह सुषमा नहीं रही। तो क्या कहें भाजपा में सब चुके हुए नेता हैं? अफसोस, मगर कहना ही पड़ेगा। भाजपा में कोई 'वीर पुरुष' दिखता नहीं है जो इस पार्टी की डगमगाती नैया को पार लगाए। ताव-ताव में इस वक्त कोई वरुण गांधी का नाम ले सकता है, मगर उनमें पांचवीं पास बच्चे जैसा बचकाना दिमाग है, इसका एहसास खुद वरुण को भी होगा । वैसे भाजपा की यह नैया डूबेगी नहीं, सिर्फ डगमगाती रहेगी। संघ परिवार अपनी इस दत्तक पार्टी को हरगिज़ डूबने नहीं देगा।
दरअसल, यह सब बातें दिमाग में इसलिए आईं कि बीती तेरह तारीख को पटना में भाजपा कार्यकारिणी की बैठक और फिर रैली हुई तो वहां नरेंद्र मोदी ही छाए रहे और बिहार में भाजपा के बड़े नेता सुशील मोदी हाशिये पर दिखे। और तो और, प्रदेश अध्यक्ष सीपी. ठाकुर की भी खास पूछ-परख नहीं हुई जिन्होंने आगामी बिहार चुनावों को देखते हुए इतना बड़ा तामझाम खड़ा किया था।
...तो क्या मान लें कि आज की तारीख में भाजपा का भाग्य विधाता नरेंद्र मोदी हैं? कोई माने या न माने, लेकिन भाजपा से अनुराग रखने वाली देश की 90 फीसदी आबादी नरेंद्र मोदी को सर्वाधिक पसंद करती है। बाकी दस परसेंट में बाकी लोग आते हैं। ग्रामीण इलाकों में केवल 'भाजपा' के नाम पर वोट देने वाले खालिस भाजपाइयों का मंतव्य बता रहा हूं। समझ लीजिए कि छोटे-मोटे एक व्यक्तिगत सर्वे के आधार पर ये बातें कह रहा हूं। यहां सवाल उठता है कि वाजपेयी और आडवाणी के बाद नरेंद्र मोदी इतने हिट कैसे हो गए? एक बहुत आसान-सी और आम धारणा है- गोधरा कांड की वजह से। मगर मुझे लगता है यह पूरा सच नहीं है। गोधरा के अलावा भी मोदी ने 'कुछ' किया है। इस 'कुछ' में कुछ उनका पारदर्शी शासन है, कुछ गुजरात की आर्थिक उन्नति है, कुछ इन्फ्रास्ट्रक्चर का डेवलपमेंट है और बहुत कुछ है कट्टर हिंदुत्व। मोदी का हिंदुत्व आडवाणी के हिंदुत्व की तरह कभी नहीं रहा। सब जानते हैं कि पार्टी में लौहपुरुष का तमगा पाए आडवाणी ने खुद की उदार छवि दिखाने का अनेक बार पाखंड किया है। यह पाखंड नरेंद्र मोदी के पास नहीं है। यही उनके हिट होने को कारणों में से एक है। जनमत और अपने विवेक के आधार पर यह कहने में मुझे कतई परहेज़ नहीं कि मोदी अगर राष्ट्रीय राजनीति में आते हैं तो ज्यादा कुछ नहीं तो अगले चुनाव में वह पार्टी को नो प्रॉफिट, नो लॉस पर रख सकते हैं, मगर एक सच यह भी है कि राष्ट्रीय राजनीति में मोदी को आना ही नहीं है। वजह बहुत साफ है। मोदी खुद कोई रिस्क नहीं लेना चाहेंगे। राजनीति में ग्रह-नक्षत्र बड़ी तेजी से बदलते हैं। मोदी को पता है कि अपनी ब्रांड इमेज के अनुरूप आम चुनावों में सीट नहीं ला पाए तो कहीं के नहीं रह जाएंगे- न घर के न घाट के। इसलिए फिलहाल, भाजपा के बारे में यही कहा जा सकता है कि वह तो गई काम से... राहुल गांधी ने कांग्रेस को बहुत बढ़त दे दी है। यहां किसी के भी मन में यह बात आ सकती है कि यह बंदा मोदी का गुणगान क्यों कर रहा है? इसलिए साफ कर दूं कि मोदी से अपनी कोई रिश्तेदारी नहीं है और न ही भाजपा से कोई खास लगाव। लगाव है तो इस हद तक कि लोकतांत्रिक सराकारों की सत्ता में एक ही दल या पार्टी जब लंबे समय तक काबिज रहती है तो शासन निरंकुश हो जाता है। किसी राष्ट्र या राज्य के लिए यह स्थिति शुभ नहीं है। यहां यह न भूलें कि ब्रिटेन में सत्ता परिवर्तन हुआ है और वहां के इतिहास में पहली बार गठबंधन सरकार बनी है तो कहीं न कहीं आम जनता की मजबूरी रही होगी।
(नोट : करीब महीने भर से इस ब्लॉग पर पोस्टिंग को लेकर प्रॉब्लम थी... कुछ विचारों को पोस्ट करने की कोशिश की थी, मगर पता नहीं किन टेकनिकल वजहों से संभव नहीं हुआ...)

Friday, March 26, 2010

मुझे माफ करना सचिन...

कल की शाम चेन्नई और बंबई के बीच आईपीएल के बीसमबीस मैच मेरे लिए अहम था। चेन्नई ने पहले खेलते हुए 180 रन ठोंक डाले थे। बंबई को नौ के रेट से रन बनाने थे। टी-20 में नौ का रन रेट कोई हौवा नहीं है, लेकिन सब जानते हैं कि बंबई की टीम में सचिन और जयसूर्या को छोड़कर कोई भी ऐसा बल्लेबाज नहीं है जिसकी अंतरराष्ट्रीय क्या, राष्ट्रीय ख्याति भी हो। तिस पर जयसूर्या अनफिट। ऐसे में केवल सचिन के भरोसे एक दोस्त से एक-एक बीयर की शर्त लगा बैठा। यूं, एक बीयर की कीमत बहुत ज्यादा नहीं होती। चालीस रुपल्ली में आ जाती है और यही भाव तो किलो भर परवल या शिमला मिर्च का भी है। लेकिन शर्त में पैसे से ज्यादा कीमत तो अपने कॉन्फीडेंस की होती है।
ओपनिंग करने आए सचिन और शिखर धवन। पहले ओवर में बने केवल पांच रन। अब मैं मन ही मन सचिन को कोसने लगा था। हालांकि दूसरे ओवर के बाद शिखर धवन चौका-छक्का उड़ाए जा रहे थे और रन रेट दस के आस-पास था। में जब शिखर धवन आउट हुए तो बंबई आधा सफर तय कर चुकी थी। फस्र्ट डाउन आए सौरभ तिवारी दो रन बनाकर ही चलते बने। फिर आर सतीश तीन रन पर पवेलियन जा बैठे। इस बीच सचिन भी टुक-टुक करने लगे। अब मेरा थूक सूखने लगा था क्योंकि रन रेट फिर नौ के ऊपर पहुंच गया था। पोलार्ड आए और कुछ पैर जमाया तो जान में जान आई। इस बीच परेरा या थरेरा नाम का कोई बॉलर आया और उसकी जो पिटाई सचिन ने की तो लगा कि अब ज्यादा दिक्कत नहीं होगी। दिक्कत हुई भी नहीं। बाद में दो और विकेट जरूर गिरे लेकिन छह गेंद रहते ही बंबई मजे से मैच जीत चुकी थी लेकिन सचिन को मन ही मन गरियाने की आत्मग्लानि बनी रही। वह भी तब, जब प्रेजेंटेशन सेरमनी में सचिन ने कहा मैं जान-बूझकर बड़े स्ट्रोक नहीं खेल रहा था। मुझे मालूम था कि बड़ा स्कोर है और एक छोर पर मेरा टिका रहना जरूरी था। सचिन ने यह भी कहा मैं तो चाहता था कि मैच फिनिश करके आऊं, लेकिन दुर्भाग्यवश बीसेक रन रहते आउट हो गया। तब जिस तरह मैं मन ही मन सचिन को कोस रहा था, मैंने मन ही मन कहा, सचिन मुझे माफ करना। मुझे क्या मालूम था कि तुम मैच फिनिश करने के इरादे से मैदान पर आए थे। याद रखिए दोस्तो सचिन के प्रति मेरी यह दीवानगी इसलिए नहीं है कि वे बहुत अच्छा खेलते हैं। कल 71 रन की पारी खेलने वाले सचिन से ज्यादा मेरी दीवानगी उस सचिन पर है जो सचिन हर्सा भोगले से सुरेश रैना की तारीफ कर रहा था। अपने ज्यादा दूसरी की प्रतिभा को सलाम करने वाला सचिन। एक खालिस हिंदुस्तानी सचिन।

Monday, March 22, 2010

अगर मैं संपादक होता तो...

यकीन मानिए अगर किसी अखबार का मैं संपादक होता तो सुधीश पचौरी का लिखा हरगिज नहीं छपने देता। खुदा न खास्ता मेरी जानकारी के बगैर कहीं छप भी जाता तो उनका पेमेंट नहीं होने देता। मुमकिन है मेरी इस घोषणा के साथ पचौरी जी के कुछ प्रशंसक तैश में आकर मुझे भला-बुरा कहें लेकिन अब मैं भी अपनी जिद पर आ गया हूं।
ऐसा नहीं है कि पचौरी जी के साथ मेरी कोई निजी दुश्मनी है। मैंने दो साल उनकी क्लास अटेंड की है। पढ़े-लिखे अच्छे इंसान और प्रोफेसर हैं वो। दिल्ली विश्वविद्यालय की सेंट्रल रिफरेंस लाइब्रेरी में हिंदी का शायद ही कोई प्रोफेसर जाता हो लेकिन पचौरी जी वहां अक्सर दिख जाते थे। अब भी दिखते होंगे लेकिन अब मैं वहां नहीं दिखता। बड़े पढ़ाकू और लिक्खाड़ हैं। हिंदी साहित्य में उत्तरआधुनिक विचारधारा (हालांकि कई विद्वान उत्तरआधुनिकता को कोई विचारधारा नहीं मानते) का खूंटा गाड़कर उसको थामे रहने का श्रेय पचौरी जी को तो है ही।
यहां लोग सवाल कर सकते हैं कि सर्वगुण संपन्न एक अच्छे पढ़ाकू और लिक्खाड़ प्रोफेसर के साथ ऐसा दुराग्रह क्यों? वजह बहुत साफ है। पिछले तकरीबन छह साल से मैं दिल्ली में हूं। हर अखबार और बहुद हद तक पत्रिकाओं को देखता-पढ़ता रहा हूं और करीब-करीब हर जगह सुधीश पचौरी की मौजूदगी पाई है। उनकी इस मौजूदगी को देखते हुए उनकी तुलना ब्रह्म से की जा सकती है। ब्रह्म जो व्यापक विरज अज...। यत्र-तत्र-सर्वत्र...। यूँ, किसी पत्रिका में कभी उनका परिचय पढ़ा था, रोजना एक हजार से अधिक शब्द लिखने वाले हिंदी के प्राध्यापक...। सचमुच बहुत लिखते हैं अपने पचौरी जी लेकिन सवाल है कि पचौरी जी जो लिखते हैं, किसके कितने पल्ले पड़ता है? दो बार... चार बार... छह बार पढ़ लीजिए किसी आर्टिकल को, कुछ समझ में ही नहीं आता कि आखिर कहना चाहते हैं जनाब। कई बार लगा शायद अपनी समझ कम है, इसलिए उनका लिखा समझ में नहीं आता लेकिन और जो लगनशील और चेतनापुरुष लोग हैं, उनसे जब पूछा कि आज फलां अखबार में पचौरी जी का फलां आर्टिकल छपा है, कुछ समझ में आया तो उन लोगों ने भी असमर्थता जाहिर की। कोई बहुत समझदार हो तो कल यानी रविवार, 21 मार्च के हिंदुस्तान के एडिट पेज पर सुधीश पचौरी का आर्टिकल छपा है, पढ़ के बता दे उसका सार।
तीन साल पहले मैंने रामदरश मिश्र का इंटरव्यू किया था। पत्र-पत्रिकाओं के सिलसिले में बात की तो उनका कहना था कि जब लोग केवल लिखने के लिए लिखते हैं भला कौन पढ़ेगा और क्या समझेगा। इस प्रसंग में उन्होंने बाकायदा सुधीश पचौरी का नाम लिया था। मिश्र जी ने यह भी कहा था पत्र-पत्रिकाओं में एक भरा-पूरा रैकेट काम कर रहा है। किसका लिखा छापना है, किसको कितनी पेमेंट करनी है... सब कुछ तय होता है। ऐसे में किसी आम पाठक को किसी का लिखा समझ में नहीं आता तो उसकी बला।
किसी भी अखबार का संपादकीय पेज उसकी आत्मा माना जाता है। उसमें छपने वाले लेख और विचार एक वर्ग (कम से कम पढ़े-लिखे वर्ग) की चेतना को जगाने, समाज और व्यवस्था के प्रति उसका नजरिया बदलने का काम करते हैं, कुछ नया करने की प्रेरणा देते हैं। लेकिन सुधीश पचौरी टाइप के लेखक, जो केवल लिखने के लिए लिखते हैं, मुझे निराश करते हैं। इन सठियाए लेखकों से मुझे कोफ्त सी होने लगी है।

Saturday, March 20, 2010

अबकी हंसी आई

भारतीय समाज की परंपरा रही है कि जब प्यास लगती है तो कुआं खोदने की सूझती है। पानी निकले, न निकले अपनी बला से। ऐसा ही कुछ रहा है अपनी सरकारों के साथ। बात ये है कि कल के रोज यानी गुरुवार, 19 तारीख को देश की केंद्रीय  कैबिनेट ने इस बात की मंजूरी दी है कि अब हवाई जहाजों को हाइजैक करने वाले/वालों को सीधे फांसी पर लटाकाया जाएगा। इसके लिए संसद में कानून लाया जाएगा। बात बहुत सीधी सी है कि यह कानून बन भी जाएगा। आखिर नेक विचार तो है ही। केंद्र सरकार में प्रमुख विपक्षी दल भाजपा ने भी इस तरह के कानून का स्वागत किया है। पार्टी प्रवक्ता राजीव प्रताप रूड़ी कह रहे थे कि भाजपा लंबे समय से इस तरह के कानून की मांग करती रही है और अब अगर सरकार इस पर मुहर लगाने जा रही है तो उनकी पार्टी इसका समर्थन करेगी। यह बात अलग है कि सरकार में रहते हुए भाजपा को कभी इस तरह के कानून की जरूरत नहीं पड़ी।
इस खबर को सुनते मैं जमकर हंसा। मेरे हंसने की वजह बहुत साफ है। मैं हंसा इसलिए कि जिन अपराधों के लिए अपने देश में पहले से ही फांसी का प्रावधान है, उसमें अब तक कितनों को फांसी हुई है? भारतीय संसद हमले के दोषी अफजल गुरु को कोर्ट कब का फांसी की सजा सुना चुका है और उसे आज तक फांसी नहीं हुई। मुंबई हमलों का गुनहगार अजमल कसाब की कहानी भी कुछ इसी तरह की है। कभी वह खुले तौर पर गुनाह कबूल करता है और फांसी की मांग करता है तो दाढ़ी-मूंछ मुड़ाकर अपने को नाबालिग बताता है। इस बहुरूपिए का हमारी सरकार क्या करेगी, अभी तक कुछ भी तय नहीं हो सका है। मुमकिन है कोर्ट उसे भी फांसी की सजा सुनाए लेकिन क्या सरकार भी उसे फांसी दे पाएगी? यह सवाल तब तक बना रहेगा जब तक कसाब हमारा सरकारी मेहमान बना रहेगा। सैकड़ों नजीरें हैं इस बाबत। एक बात और। डेविड कोलमेन हेडली नाम का प्राणी मुंबई हमलों का सूत्रधार रहा है। हमारी तथाकथित विश्वविख्यात खुफियां एजेंसियां उसके कारनामों का पता लगाने में नाकाम रही हैं। भला हो उन कमांडोज का जिन्होंने कसाब को जिंदा पकड़ लिया और भला हो अमेरिका का कि उसकी चुस्त-दुरुस्त खुफिया तंत्र ने हेडली को धर दबोचा वरना हमारा सुरक्षा तंत्र हमलावरों का सुराग लगा पाता, यह कहने की हिम्मत नहीं पड़ रही। अब भारत सोच रहा है कि हेडली को उसके हवाले कर दिया जाए लेकिन अमेरिका कहां सौंपने वाला! बगैर कुछ करे-धरे हम अपराधियों को पकडऩा चाहते हैं। याद रहे मुंबई हमलों के साल भर बाद तो हेडली का नाम सामने आया है। इसके बाद भी हमारी सुरक्षा एजेंसियां हेडली के एक फोटो तक का जुगाड़ नहीं कर सकीं कि मीडिया में उसे सार्वजनिक किया जा सके कि हो न हो कही अपने देश के ही किसी गली-मोहल्ले में घूमता हुआ वह मिले तो लोग पुलिस को खबर कर सकें। चार दिन पहले तक अखबारों में हेडली के स्क्रैच ही छपते आए हैं।
अब आप ही बताएं कि सुरक्षा के इतने 'पुख्ता'! हालातों के बीच अगर हवाई जहाज के हाईजैकरों को फांसी की सजा का कानून बनेगा तो उस पर हंसी नहीं आएगी? क्या यह एक सरकारी खानापूर्ति नहीं है?

Thursday, March 18, 2010

देश में बिलायती पढ़ाई, दिल मांगे मोर...

...तो अब करीब-करीब तय हो गया है कि विदेशी विश्वविद्यालय भी हमारे देश में अपने कैंपस खोल सकेंगे। केन्द्रीय कैबिनेट ने इससे संबंधित विधेयक को मजूरी दे दी है और अगर यह बिल संसद से भी मंज़ूर हो जाता है तो फिर बल्ले-बल्ले। हार्वर्ड, येल, कैंब्रिज और ऑक्सफोर्ड की डिग्री अपने देश में। विद्वतजन इसे उच्च शिक्षा की कायापलट के तौर पर देख रहे हैं। हमारे मानवसंसाधन विकास मंत्री और नामी वकील कपिल सिब्बल साहब का तर्क है कि उच्च शिक्षा में गुणवत्ता की कमी है। इसे देखते हुए हमारे युवा विदेशों की ओर रुख कर रहे हैं। इसलिए क्यों न विदेशी विश्वविद्यालयों की पढ़ाई अपने देश में हो? अच्छा विचार है सिब्बल साहब... बिल्कुल होनी चाहिए लेकिन हमारी समझ में नहीं आता कि देश में ही अच्छे विश्वविद्यालय क्यों नहीं खोले जाते? उच्च शिक्षा के बाबत यहां राष्ट्रीय ज्ञान आयोग की रिपोर्ट गौर करने लायक है। रिपोर्ट में आयोग ने कहा था कि देश में करीब सात फीसदी युवा ही उच्च शिक्षा तक पहुंच पाते हैं। 2015 तक इसे बढ़ाकर कम से कम 15 फीसदी किया जाना चाहिए। इसी तरह अभी विश्वविद्यालयों की तादाद 500 के करीब और इन्हें भी बढ़ाकर 1500 किया जाना चाहिए। इन तथ्यों से सरकार को कोई मतलब नहीं और सीधा फार्मूला तय किया गया कि उच्च शिक्षा के कायाकल्प के लिए विदेशी विश्वविद्यालयों को देश में उनके अपने कैंपस खोलने दिए जाएं।
बात सिर्फ 500 विश्वविद्यालयों की नहीं है। इन 500 विश्वविद्यालयों में ढंग के विश्वविद्यालय उंगली में गिने जा सकते हैं। गोरखपुर विश्वविद्यालय, पटना विश्वविद्यालय और खुद मैंने जहां से बीए पास किया है, अवधेशप्रताप सिंह विश्वविद्यालय रीवा... लंबी फेहरिस्त है जनाब। यहां क्या-क्या और कैसे-कैसे होता है, कौन नहीं जानता। एनरोल कोई होता है, परीक्षा कोई और देता है और डिग्री किसी और के नाम अलाट होती है। यह पहेली समझ से बाहर है कि इस तरह की सुविधाओं को दूर करने के प्रयास क्यों नहीं किए जाते? क्या विदेशी विश्वविद्यालययों के देश में कैंपस खोलकर उच्च शिक्षा की दिशा में सुधार संभव है? यह बात तो सोलह आने सच है कि जब कोई विदेशी संस्थान यहां अपनी दुकान खोलेगा तो उसे ग्राहकों की कमी नहीं होगी। खाए-पिए-अघाए का बड़ा वर्ग है अपने मुल्क में। फीस-ऊस की उन्हें कोई चिंता नहीं होगी। लेकिन यहां चिंता तो इस बात की है इन विदेशी दुकानों के दुकानदार कौन होंगे? ये तो तय है कि हार्वर्ड या ऑक्सफोर्ड अपने कैंपस यहां खोलेंगे तो मास्टरी करने वहां से कोई नहीं आने वाला। तब तो यही होगा कि यहां जो अच्छे मास्टर हैं, उनका उपयोग होगा। उपयोग बेहद आसान होगा क्योंकि वे लोग इन्हें दो-चार गुनी सैलरी दे सकते हैं। तब होगा ये कि हमारे अपने संस्थानों में जो दो-चार अच्छे लोग हैं, वे सब भाग जाएंगे उन्हीं संस्थानों में। एक बात और, इन विदेशी मेहमानों को खुली छूट होगी कि वे अपनी फीस अपने तरीके से तय करेंगे। जाहिर है, जब सात समंदर पार करके यहां कोई आएगा तो चैरिटी खोलने तो आएगा नहीं। उन लोगों की फीस भी अच्छी-खासी होगी और उस फीस को अच्छे-खासे लोग ही दे पाएंगे। ऐसे में जिस भारतीय युवा को उच्च शिक्षा देने की बात कही जा रही है, वह एक सरकारी भ्रम के सिवाय और कुछ नहीं है।

Thursday, March 11, 2010

आनंदियां तो रोज मरती हैं

हिंदी फिल्मों में हीरो-हीरोइनों के मरने का रिवाज नहीं है। इसकी एक वजह है कि भारतीय काव्यशास्त्र में ट्रेजडी की अवधारणा नहीं है। अपने यहां दुखांत कलाओं को पसंद नहीं किया जाता। इसके इतर पाश्चात्य काव्यशास्त्र में ट्रेजडी पर जोर दिया गया। आरस्तू का विरेचन सिद्धांत ट्रेजडी को ही आधार बनाता है और शायद यही वजह है कि मशहूर नाटककार शेक्सपीयर के अधिकांश नाटक दुखांत हैं।
बहरहाल, कलर्स चैनल पर प्रसारित होने वाले सीरियल बालिका बधू की मुख्य नायिका आनंदी मर गई। उसे गोली मार दी गई। बालिका बधू ही वह सीरियल है जिसने एकता कपूर के अजर-अमर नायक-नायिकाओं और अनवरत, बारहमासी सीरियलों की बैंड बजाई। देखते-ही देखते कलर्स के आगे दूसरे मनोरंजन चैलनों का रंग फीका पड़ गया। उनकी टीआरपी कलर्स के बरक्श आधे पर ही ठहरती, खासकर बालिका बधू के प्रसारण के समय।
जैसा कि न्यूज़ चैनल वाले बता रहे थे कि देश सदमें में है, आनंदी के मरने से कम से कम मुझे सदमा नहीं लगा क्योंकि इस देश में आनंदियां तो रोज मरती हैं। जिन बाल विवाह और अनमेल विवाह जैसी समस्याओं को केंद्र में रखकर सीरियल की शुरुआत हुई, उसमें आनंदी जैसे किरदारों का मरना तो उनकी नियति है। ऐसी आनंदी, जो सासू मां की हां में हां मिलाने की जगह उससे सवाल करे। घर की इज्जत की परवाह किए बगैर छुट्टा घूमने की आदी हो, बात-बात में पति से भी झगड़ बैठे। मुझे लगता है कि आनंदी की मौत सही समय पर हुई है। निर्माता ज्यादा समय तक उसे जिंदा रखता तो सीरियल की एथेंटिसिटी मर जाती। बालिका बधू क्या, कलर्स में प्रसारित होने वाले सीरियल ऐसे हैं जो प्रेमचंद की कहानियों की याद दिलाते हैं। प्रेमचंद भी अपने पात्रों, खासकर केन्द्रीय पात्रों के साथ कोई हमदर्दी नहीं बरतते। चाहे आप गोदान के होरी को लें या रंगभूमि के सूरदास को या फिर निर्मला। घोर अत्याचार और बद से बदतर जिंदगी गुजारते हैं प्रेमचंद के पात्र। क्यों? क्योंकि भारतीय समाज का यही यथार्थ है। प्रेमचंद या बालिका बधू का निर्माता चाहता तो अपने केन्द्रीय पात्र को लंबे समय तक जिंदा रखता, उनकी जिंदगी को खुशहाल दिखाता लेकिन क्या ऐसा हमारे समाज में भी है?

Friday, March 5, 2010

एक गधे की आत्मकथा

कृश्न चन्दर का  नाम उर्दू के साथ हिंदी में भी बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। एक से बढ़कर एक कहानियां लिखीं। बहरहाल, उनका खासा चर्चित और गुदगुदाने वाला एक उपन्यास है- एक गधे की आत्मकथा। देश की सरकारी संस्कृति पर कोड़े जैसी मार और मार ऐसी  कि मार खाने वाला पीठ भी सहलाता रह जाए और कुछ बोल भी न पाए। आप जिन लोगों ने न पढ़ा हो ज़रूर पढ़िएगा, मज़ा आएगा और व्यवस्था से साक्षात्कार भी । कुछ अंश देखें...
इसके पढ़ने से बहुतों का भला होगा
महानुभाव ! मैं न तो कोई साधु संन्यासी हूं, न कोई महात्मा-धर्मात्मा। न श्री 108 स्वामी गहम गहमानन्द का चेला हूं, न जड़ी बूटियों वाला सूफी गुरमुखसिंह मझेला हूं। न मैं वैद्य हूं, न कोई डाक्टर। न कोई फिल्म स्टार हूं, न राजनीतिज्ञ। मैं तो केवल एक गधा हूं, जिसे बचपन के दुष्कर्मों के कारण समाचार पत्र पढ़ने का घातक रोग लग गया था। होते-होते यह रोग यहां तक बढ़ा कि मैंने ईंटें ढोने का काम छोड़कर केवल समाचार-पत्र पढ़ना आरम्भ कर दिया। उन दिनों मेरा मालिक धब्बू कुम्हार था, जो बाराबंकी में रहता था। (जहां के गधे बहुत प्रसिद्ध हैं) और सैयद करामतअली शाह बार एट ला की कोठी पर ईंटें ढोने का काम करता था। सैयद करामतअली शाह लखनऊ के एक माने हुए बैरिस्टर थे, और अपने पैतृक नगर बाराबंकी में एक आलीशान कोठी स्वयं अपनी निगरानी में बनवा रहे थे। सैयद साहब को पढ़ने-लिखने का बहुत शौक था।
इसलिए अपनी कोठी का जो भाग उन्होंने सबसे पहले बनवाया, वह उनकी लाइब्रेरी का हाल तथा रीडिंग-रूम था, जिसमें वह प्रातःकाल आकर बैठ जाते। वह बाहर बरामदे में कुर्सी डालकर समाचार पत्र पढ़ते और ईंटें ढोने वालों की निगरानी भी करते रहते। उन्हीं दिनों मुझे समाचार पत्र पढ़ने का चस्का पड़ा। होता अधिकतर यों था कि इधर मैंने एक उठती हुई दीवार के नीचे ईंटें फेंकीं, उधर भागता हुआ रीडिंग-रूम की ओर चला गया। बैरिस्टर साहब समाचार पढ़ने में इतने लीन होते कि उन्हें मेरे आने की खबर तक न होती और मैं उनके पीछे खड़ा होकर समाचार-पत्र का अध्ययन शुरू कर देता। बढ़ते-बढ़ते यह शौक यहां तक बढ़ा कि बहुधा मैं बैरिस्टर साहब से पहले ही समाचार पत्र पढ़ने पहुँच जाता। बल्कि प्रायः ऐसा भी हुआ है कि समाचार-पत्र का पहला पन्ना मैं पढ़ रहा हूं और वह सिनेमा के विज्ञापनों वाले पन्ने मुलाहिज़ा फरमा रहे हैं। मैं कह रहा हूं-ओह ! ईडन, आइजन हावर, बुल्गानिन फिर मुलाकात करेंगे और वह कह रहे हैं-अहा !...
दिल्ली का भूगोल
इसके पूर्व में शरणार्थी, पश्चिम में शरणार्थी, दक्षिण में शरणार्थी और उत्तर में शरणार्थी बसते हैं। बीच में भारत की राजधानी है और इसमें स्थान-स्थान पर सिनेमा के अतिरिक्त नपुंसकता की विभिन्न औषधियों और शक्तिवर्धक गोलियों के विज्ञापन लगे हुए हैं, जिससे यहां की सभ्यता तथा संस्कृति की महानता का अनुभव होता है। एक बार मैं चांदनी चौक से गुज़र रहा था कि मैंने एक सुन्दर युवती को देखा, जो तांगे में बैठी पायदान पर पांव रखे अपनी सुन्दरता के नशे में डूबी चली जा रही थी और पायदान पर विज्ञापन चिपका हुआ था, असली शक्तिवर्धक गोली इन्द्रसिंह जलेबी वाले से खरीदिए !’ मैं इस दृश्य के तीखे व्यंग्य से प्रभावित हुए बिना न रह सका और बीच चांदनी चौक में खड़ा होकर कहकहा लगाने लगा। लोग राह चलते-चलते रुक गए और एक गधे को बीच सड़क में कहकहा लगाते देखकर हंसने लगे।...
वे बेचारे मेरी धृष्ट आवाज पर हंस रहे थे और मैं उनकी धृष्ट सभ्यता पर कहकहे लगा रहा था। इतने में एक पुलिस के संतरी ने मुझे डण्डा मारकर टाउन हाल की ओर ढकेल दिया। इन लोगों को मालूम नहीं कि कभी-कभी गधे भी इन्सानों पर हंस सकते हैं। ...
दिल्ली में आने वालों को यह याद रखना चाहिए कि दिल्ली में प्रवेश करने के बहुत से दरवाज़े हैं। दिल्ली दरवाज़ा, अजमेरी दरवाज़ा, तुर्कमान दरवाज़ा इत्यादि। परन्तु आप दिल्ली में इनमें से किसी दरवाज़े के रास्ते भीतर नहीं आ सकते। क्योंकि इन दरवाज़ों के भीतर प्रायः गायें, भैंसें, बैल बैठे रहते हैं या फिर पुलिसवाले चारपाइयां बिछाए ऊंघते रहते हैं। हां, इन दरवाज़ों के दायें-बायें बहुत सी सड़के बनी हुई हैं, जिन पर चलकर आप दिल्ली में प्रवेश कर सकते हैं। अंग्रेजों ने दिल्ली में भी एक इंडिया गेट बनाया है, लेकिन इस गेट से भी गुज़रने का कोई रास्ता नहीं है। दरवाजे के ईर्द-गिर्द घूम-फिरकर जाना पड़ता है। संभव है, दिल्ली के घरों में भी थोड़े दिनों में ऐसे दरवाज़े लग जाएं; फिर लोग खिड़कियों में से कूदकर घरों में प्रवेश किया करेंगे।...
दिल्ली में नई दिल्ली है और नई दिल्ली में कनाटप्लेस है। कनाटप्लेस बड़ी सुन्दर जगह है। शाम के समय मैंने देखा कि लोग लोहे के गधों पर सवार होकर इसकी गोल सड़कों पर घूम रहे हैं। यह लोहे का गधा हमसे तेज़ भाग सकता है, परन्तु हमारी तरह आवाज़ नहीं निकाल सकता। यहां पर मैंने बहुत से लोगों को भेड़ की खाल के बालों के कपड़े पहने हुए देखा है। स्त्रियां अपने मुँह और नाखून रंगती हैं, और अपने बालों को इस प्रकार ऊंचा करके बांधती हैं कि दूर से वे बिल्कुल गधे के कान मालूम होते हैं। अर्थात् इन लोगों को गधे बनने का कितना शौक है, यह आज मालूम हुआ।...

Wednesday, March 3, 2010

फिदा सरकार, हुसेन का इमोशनल अत्याचार

2 मार्च की हॉट खबर थी कि मकबूल फिदा हुसेन ने कतर की नागरिकता हासिल कर ली है। नागरिकता स्वीकार करने के बाद अपने पहले इंटरव्यू में हुसैन ने कहा,   'भारत मेरी मातृभूमि है। मैं अपनी मातृभूमि से घृणा नहीं कर सकता, लेकिन भारत ने मुझे खारिज कर दिया। ऐसे में मुझे भारत में क्यों रहना चाहिए?... जब संघ परिवार ने मेरे ऊपर हमला किया तो उस समय सभी चुप्पी साधे रहे। राजनीतिक नेतृत्व, कलाकारों या बुद्धिजीवियों में से किसी ने भी मेरे पक्ष में आवाज नहीं उठाई, लेकिन मैं इस सच्चाई को जानता हूं कि भारत की 90 प्रतिशत जनता मुझे प्यार करती है।... भारत की सरकारें मेरी हिफाजत नहीं कर सकीं। इसलिए इस तरह के देश में निवास करना मेरे लिए बहुत कठिन है। राजनेताओं की नजर सिर्फ वोट पर है।'
हुसेन ने कहा, 'कतर में मैं पूरी आजादी का आनंद ले रहा हूं। अब कतर ही मेरा स्थान है। यहां मेरी अभिव्यक्ति की आजादी पर किसी का अंकुश नहीं है। मैं यहां बहुत खुश हूं।'
करीब-करीब ठीक कहा है हुसेन साहब आपने। बहुत गंदी है यहां की पॉलिटिक्स । मुबारक हो आपको आपका नया ठिकाना, लेकिन एक गुजारिश है आपसे। आप भारतवासियों पर इमोशनल अत्याचार न करें। किसी की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को आघात लगता है तो हमें भी बड़ी छटपटाहट होती है, लेकिन अफसोस है कि आपकी अभिव्यक्ति हमेशा दोयम दर्जे की रही है। मकबूल साहब बानगी कबूल करें-
इसे अजीब इत्तेफाक कहेंगे कि 2 मार्च को मकबूल साहब ने कतर की नागरिकता हासिल की और दो दिन पहले 28 फरवरी के जनसत्ता के एडिट पेज पर करीब-करीब तीन चौथाई हिस्से में तसलीमा नसरीन का आर्टिकल छपा। तसलीमा ने सलमान रुश्दी और हुसेन साहब के साथ उनका नाम जोड़े जाने पर गहरा क्षोभ व्यक्त किया है। बकौल तसलीमा,  ''दोनों रचनाकारों के प्रति असीम श्रद्धा रखते हुए मैं कह रही हूं कि इन दोनों पुरुषों के साथ कोष्टक में मेरा नाम रखना उचित नहीं है। धर्मयुक्त, विषमतायुक्त, समान अधिकारयुक्त समाज की रचना के लिए मैं जो संघर्ष कर रही हूं, वह अगर किसी को दिखाई नहीं देता तो वह चाहे जितना बड़ा शिल्पी क्यों न हो, मेरे आदर्श के करीब आने की उसमें कोई योग्यता नहीं है''
फिदा साहब से तसलीमा का मोहभंग का कारण तो देखें- ''हुसेन के सरस्वती की नंगी तस्वीर बनाने को लेकर भारत में विवाद हुआ तो मैं स्वाभाविक रूप से चित्रकार की स्वाधीनता के पक्ष में थी। मुसलमानों में नास्तिकों की तादाद बहुत कम है। मैंने मकबूल फिदा हुसेन के चित्रों को हर जगह से खोजकर कर देखने की कि हिंदू धर्म के अलावा किसी और धर्म, खासकर अपने धर्म इस्लाम को लेकर उन्होंने कोई व्यंग्य किया है या नहीं? लेकिन देखा कि बिल्कुल नहीं किया है बल्कि कैनवास पर अरबी में शब्दश: अल्लाह लिखते हैं। हिंदुत्व पर अविश्वास के चलते ही उन्होंने लक्ष्मी और सरस्वती को नंगा चित्रित किया। क्या वे मोहम्मद को नंगा कर सकते हैं? मुझे यकीन है, नहीं कर सकते।...
हुसेन भी उन्हीं धार्मिक लोगों की तरह हैं जो अपने धर्म में तो विश्वास करते हैं लेकिन दूसरे लोगों के उनके धर्म में विश्वास की निंदा करते हैं।....
हुसेन की देश वापसी के लिए सरकार पूरी कोशिश कर रही है, मुझे न तो भारत सरकार लौटने दे रही है न बांग्लादेश सरकार।''
एक बार फिर धवलकेश हुसेन साहब को नए आशियाने की मुबारकवाद और एक बात यह कि भारत को जाकिर हुसेन से कोई घृणा नहीं, मौलाना कलाम आजाद से कोई घृणा नहीं, विस्मिल्ला खान से कोई घृणा नहीं, अहमद-मोहम्मद हुसेन से कोई घृणा नहीं, गुलाम अली और मेंहदी हसन से नहीं, अब्दुल कलाम से नहीं... जायसी-रसखान से नहीं, फिर आपसे क्यों? आप आत्ममंथन करें जनाब।

Wednesday, February 24, 2010

सचिन के कारनामे पर मुझे आश्चर्य नहीं हुआ

...तो आखिरकार सचिन ने सईद अनवर का रिकॉर्ड तोड़ ही दिया। वनडे क्रिकेट का पहला दोहरा शतक! समूचा देश खुश है, मैं भी हूं। ...लेकिन सच पूछिए तो सचिन के इस कारनामे पर मुझे आश्चर्य नहीं हुआ। यह तो होना ही था। पहले भी तो दो-तीन दफा सचिन ड्योढ़ी तक पहुंच ही गए थे। तारीख 21 मई 1997 को चेन्नई में बना सईद अनवर का जो रिकॉर्ड 24 फरवरी 2010 को ग्वालियर में टूटा, बहुत पहले टूट जाना चाहिए था। मुझे इस बात का पूरा भरोसा था कि ऐसा कारनामा सचिन जैसा खिलाड़ी ही कर सकता है।
लोगों को शायद याद न हो लेकिन जिस मैच में सईद अनवर ने 194 रन बनाए थे उसमें भारतीय टीम की कमान सचिन के पास ही थी और इसे संयोग ही कहेंगे कि सचिन की ही गेंद पर अनवर को गांगुली ने लपका था। मुझ जैसे देश के अधिकांश क्रिकेट प्रेमियों ने अनवर की उस पारी के बाद टेलिविजन सेट छोड़ दिया था, तोड़ दिया था और जीत की उम्मीद छोड़ दी थी। आखिर उस वक्त वनडे 327 रन बनना मायने रखता था। अनवर ने 22 चौकों और पांच छक्कों की मदद से 146 गेंदों में वो रन बनाए थे। सचिन ने 147 गेंदों में 25 चौकों और तीन छक्कों के साथ यह दोहरा शतक पूरा किया। अनवर को उस पारी में 19वें ओवर से आखिर तक रनर की जरूरत पड़ी थी मगर सचिन तेंदुलकर पूरे 50 ओवर खेले और आखिर तक बगैर किसी रनर के दौड़े।
बहरहाल, दो मायनों में सचिन की यह पारी मुझे खास लगती है। पहला, अप्रैल में जिंदगी के 37 साल पूरे करने जा रहे इस शख्स को कहां से ऊर्जा मिलती है, सोचने वाली बात है। ज्यादातर तो 15 ओवर खेलने के बाद ही हांफने लगते हैं। सचिन के इस स्टेमिना को सलाम तो करना ही होगा। दूसरा, मैन ऑफ द मैच का खिताब लेने के बाद अनवर ने पारी को 'खास' बताया था, बस। सचिन ने भी अपनी पारी को खास बताया लेकिन यह कहने में संकोच नहीं किया कि यह दोहरा शतक राष्ट्र को समर्पित है। सचिन की यही अदा उन्हें एक क्रिकेटर और एक खिलाड़ी से अलग एक भद्र इंसान बनाती है। यूं, किसी चैनल पर कल लता मंगेशकर ने भी कहा था कि सचिन एक खिलाड़ी से बढ़कर एक अच्छे इंसान हैं जो कामयाबी और शोहरत के बावजूद झुकना जानते हैं। यहां एक बात और याद आती है कि दो साल पहले कंमेंट्री बॉक्स में बैठकर बड़बड़ करने वाले संजय मंजरेकर और वकार युनुस जैसे लफ्फाज क्या अब भी यह कहने की हिम्मत जुटा पाएंगे कि सचिन बुढ़ा गए हैं और उन्हें संन्यास ले लेना चाहिए। याद रहे भाई लोगो, सचिन ने पिछले दो टेस्ट मैचों में लगातार दो शतक बनाए हैं और वनडे की श्रेष्ठ पांच पारियों में से तीन पिछले 12 महीने में खेली हैं।
रिकॉर्ड तो बनते-टूटते रहेंगे। फिलवक्त हम सब यादगार इतिहास के साक्षी बने हैं। इसे खुशी से जी लें, इतना बहुत है।