Thursday, April 7, 2016

चलो करें फिर नई शुरुआत

अब आएगा मजा... फिर कलमतोड़।

Wednesday, May 11, 2011

A Simple Observation....

I watched a movie today named “Spanglish”, obviously because of my intimacy with Spanish language. And that provoked me to write this.


I am not going to write the movie review or something which you expect. It’s just a simple observation about the relationships in reference to Latin American (Spanish speaking countries), western (Specially U.S.) and Asian countries specially India. This is so similar to our country India.


We must know that in western countries, there is not much value given to relations, be it parent-child, husband-wife, girlfriend-boyfriend or any other. There, much focus is given to oneself and one’s priorities. If you are not happy with someone or something, you have every right to leave that person or thing behind and move on. And that is considered their right, rather culturally approved right. You don’t explore much about the possibilities of mending the ways to work that relationship again. You just know a culturally tested formula i.e. leave the person or thing you are bothered about. And you follow it.


But in India you rather work on that thing and find the alternatives to remain in the same relationship. Leaving a relationship is the last thing in one’s mind.


It’s very normal in Western countries to leave people alone when they don’t feel good or upset. But in India if you say “Just leave me alone for sometime”, you are considered mad or someone out of the mind. Also in some cases peopled might label you a maniac or a person worth getting into an asylum.


In the last scene of the movie when Latin American lady’s daughter asks her to leave her alone, she responds “there is no space between us”.


A similarity to our culture swept into my mind with this phrase and I was delighted to pause for a while thinking did I ever use that phrase? Till date I have not and wish the same as well.


Anoop Maurya

Thursday, April 14, 2011

अन्ना के बहाने

सोचा था कि लिखने-पढ़ने का कोई फ़ायदा नहीं है, 'मगर दिल है कि मानता नहीं.' भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन लोकपाल विधेयक की मांग को लेकर अन्ना हजारे के आंदोलन के बाद कुछ लिखने को मज़बूर हूँ.
दरअसल, बहुत पहले इसी ब्लॉग पर एक पोस्ट की थी-  उस दिन मैं बहुत रोया. पोस्ट हरियाणा के चर्चित रुचिका गिहरोत्रा मामले को लेकर थी, उस मामले में कोई उत्सव नाम के युवक ने डीजीपी एसपीएस राठोर के गाल पर छुरा घोंप दिया था. मैंने लिखा था कि इस देश में युवा क्रांति को कोई नहीं रोक सकता. तब सात समंदर पार रह रहे मेरे बहुत करीबी दोस्त आशीष ने कमेन्ट किया था कि आप जज्बाती हो गए हैं और मैं मन मसोसकर चुप रह गया था. तब मुझे लगा था कि वह भी एक किस्म का भ्रष्टाचार है, जिसमें एक दबंग किस्म का पुलिस अधिकारी अपने धन-बल के दम पर दम भर रहा है और एक युवा उसे बर्दाश्त नहीं कर पा रहा.
बहरहाल, मैं मुद्दे पर लौटता हूँ. अन्ना हजारे ने जंतर-मंतर पर भ्रष्टाचार के खिलाफ़ अनशन किया तो उनके सपोर्ट में उतरे लोगों में आधे से ज़्यादा युवा थे और युवा ऐसे नहीं जो निठल्ले या आवारा किस्म के रहे हों. उनमें ज़्यादातर उच्च शिक्षा प्राप्त थे. इतना ही नहीं, जब मिस्र में हुस्ने मुबारक़ के खिलाफ़ वहां जन क्रांति हुई, तो मैंने फेसबुक पर नोट्स लिखा कि भारत में मिस्र क्यों नहीं हो सकता? मगर मेरे दोस्त को तब भी हैरानी हुई. अब अन्ना का आंदोलन सबके सामने है. यहाँ सवाल किया जा सकता है कि हासिल क्या हुआ? मगर ये काफ़ी नहीं कि देश के कोने-कोने में इस आंदोलन को अप्रत्याशित जन-समर्थन मिला और उसमें भी युवकों की बड़ी फौज़ थी.
भ्रष्टाचार के खिलाफ़ अन्ना के आंदोलन को लेकर तमाम तरह के तर्क-कुतर्क हैं और आए दिन वो सामने भी आ रहे हैं. जो लोग इसे वाहियात बता रहे हैं, उनमें अधिकाँश राजनेता हैं. नाम देखिए- दिग्विजय सिंह, कपिल सिब्बल, सलमान ख़ुर्शीद, एच डी कुमारस्वामी वगैरह-वगैरह... दिग्विजय ने तो चुनौती भी दे डाली कि अन्ना चुनाव जीतकर दिखाएँ और इनके पास आंदोलन करने के लिए धन कहाँ से आता है? अब इस चोट्टे दिग्विजय को कौन बताए कि 73 साल का ये जवान एक झोला लेकर चलता है और जहाँ भी अनशन में में बैठता है, दस-पांच रूपए से ही उसका झोला भर जाता है. उसे आदत ही नहीं है शिक्षाकर्मियों की भर्ती में करोड़ों डकार लेने की. समझ में नहीं आता कि इस तरह के हाईकमान के चमचों से देश की राजनीति अपना दामन कब छुड़ा पाएगी?
लिखने-कहने को बहुत सारी बातें हैं, मगर सिर्फ़ इतना ही कि जिन आरामतलबियों को अब भी कोई शक है, वो 15 अगस्त तक का इंतज़ार करें. एक बात और की इस विधेयक के पास हो जाने से इस देश से भ्रष्टाचार ख़त्म हो जाएगा, संभव नहीं है. इसके लिए सबको अपने गिरेबान में झांकना होगा.

Tuesday, November 2, 2010

सड़कें ख़ाली करो कि ओबामा आते हैं!

क्यारियां सजाई जा रही हैं, पार्क हरे किए जा रहे हैं 
गलियाँ बुहारी जा रही हैं दिन में चार बार... 
और हमसे कहा गया- सड़कें ख़ाली करो कि ओबामा आते हैं!
कहा गया कि शोर मत करना उस दरमियां
जब वे हों दिल्ली में...
हमसे कहा गया कि दो दिन के लिए तो घर से बहार भी मत निकलना
हो सके तो रोक लेना टट्टी-पिसाप भी
बगल वाले मंदिर में न बजाए कोई घंटियाँ
मस्जिद में अजान भी न पढ़े कोई...
रिक्शा और ताँगे वालों को तो ख़ास हिदायत है-
न निकलना दिन में धंधा करने- त्यौहार के मौसम में भी
हो सके तो चले जाओ दो-चार के लिए दिन दिल्ली छोड़ के कहीं और
कहा गया हम सब से कि सभ्य रहना दो- चार दिन के लिए
क्योंकि आ रहा है दुनिया का सबसे सभ्य आदमी
यानी अमेरिका का राष्ट्रपति बराक ओबामा!

Monday, October 4, 2010

तीसरे दिन की रामलीला

नवरात्र लगते ही शुरू हुईं रामलीलाएं तमाम
मित्र का बारंबार आग्रह
हम भी पहुंचे देखने
खूब भीड़भाड़, चहल-पहल
हर आयु-वर्ग के लोग पहुंचे थे-आज-
तीसरा दिन था-
मंचन था राम वनवास।

पहला दृश्य:
पत्नी सीता को समझा रहे थे प्रभु श्रीराम-
बोले- 'सीते! तुम मत कष्ट सहो...
तुम मत जाओ मेरे साथ' प्रत्युत्तर-
'मैंने तो पहले ही कर लिया है निर्णय
नहीं जाऊंगी आपके साथ वन को
आप ठहरे मर्यादापुरुषोत्तम, आज्ञाकारी
निभाओ वचन पिता का
मैं क्यों कर जाऊं...
मेरे वश की नहीं यह तपस्या
जंगल भी कोई रहने की जगह है?'
दर्शक हतप्रभ, संयोजक परेशान
आखिर हो क्या रहा है ये
सीता को समझाया गया-
'तुम्हारे वन गये बगैर कैसे होगा तुम्हारा हरण
और कैसे होगा राम-रावण युद्ध, रावण मरण
यह नाटक बंद करो और फौरन जाओ वन राम के साथ।'
जैसे-तैसे तैयार हुईं सीता
अब लक्ष्मण की न-नुकुर
आखिरकार समझा लिया गया उन्हें भी- तर्कों के सहारे।
निकल पड़े वन को तीनों
माताएं रो-रो कर हैरान तीनों
कैकेई को भी पहली बार रोते देखा इस रामलीला में।

दूसरा दृश्य:
गंगा तट पर बैठा था केवट निराश
आज मंदा था धंधा
देखते ही लपका-
'आओ जी, दो मिनट में पहुंचा देता हूं उस पार'
और शीघ्र ही तीनों पहुंचे गंगा पार
केवट से व्यथा सुनाई राम ने
मगर अड़ गया वह भी-
'माफ करो प्रभु
मेरे भी हैं बाल-बच्चे
सबका भरना पड़ता है पेट मुझे ही
साग-सब्जी भी ले जाना है शाम को
...फिर क्यों मूर्ख बनाते हो हम जैसों को
पढ़े-लिखे नहीं, इसलिए?
सब जानता हूं मैं
राजकुमार हो अयोध्या के
सदियों की कमाई रखी है खजाने में
मेरी मजदूरी के लिए इतनी मजबूरी!
फिर कोई खैरात तो नहीं मांगता...
जैसे भी हो, आप ही निकालो रास्ता'
...और अंत में देनी पड़ी अंगूठी सीता की ही
(दर्शकों की गालियां केवट को)
इस बार निषाद भी नहीं पहुंचा आवभगत करने राम की
दिन थे खेती-किसानी के।
किसी तरह रहने लगे चित्रकूट में
राम-लक्ष्मण-सीता पर्णकुटी में।

दृश्य तीन :
कुटिया पर पहुंची सूर्पणखा
विवाह का प्रस्ताव और राम-लक्ष्मण की समझाइश
बात यहां तक पहुंची कि काट ली जाय नाक इसकी
क्रोधित लक्ष्मण तैयार, मगर....
तभी आ धमाका लंकेश यानी रावण
बिना पोशाक के ही मंच पर
लक्ष्मण को लगाई ललकार
'बंद कर यह अनर्थ मूर्ख बालक
मैंने तय कर लिया है
न तुम काटो सूर्पणखा की नाक
न मैं करूंगा सीता का हरण
अब बंद होना चाहिए प्रतिशोध का यह अत्याचार...'
पूरे पंडाल में सन्नाटा, दर्शकों में खामोशी
और संयोजक तो पसीना-पसीना
कोसने लगा रावण को-
'क्यो आ धमके तुम मंच पर समय से पहले?'
रावण के इरादे भी थे खतरनाक
अड़ गया संयोजक से ही-
'सब तुम्हीं लोग कराते हो पैसे की खातिर-
कब तक... आखिर कब तक कटती रहेगी सूपर्णखा की नाक
और होता रहेगा सीता का हरण?'
मंच का माहौल था गरम
दर्शक उठ-उठकर लगे थे जाने
उधर बढ़ती ही जा रही थी रावण संयोजक की बहस
तभी राम ने किया बीच-बचाव
दर्शकों को संबोधित करके बोले
'भद्र जनो! हमें माफ करें
हमारा भी ध्येय नहीं है खून-खराबा
रावण भाई चेत गए हैं
हम लक्ष्मण को भी समझा लेंगे
...तब तक दो-चार लोग ही बचे थे दर्शक दीर्घा में
सब लौट रहे थे घर को
गाली देते राम-रावण को
हम भी लौट आए कुछ सोचते हुए।

Saturday, September 18, 2010

सठिया गए हैं शिवराज सिंह

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह को सुर्खियों में बने रहने का रोग लग गया है। हफ्ते-दस दिन में  कुछ न कुछ ऐसा उगल बैठते हैं, जिससे राष्ट्रीय स्तर पर छा जाते हैं और फिर जब अच्छी-खासी छीछा-लेदर हो जाती है तो फिर या तो माफी मांगते हैं या फिर कहते हैं कि मेरे बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है। फिलहाल, कॉमनवेल्थ खेलों को लेकर अपनी भड़ास निकाली है शिवराज ने। उन्होंने कॉमनवेल्थ से जुड़ी मशाल क्वीन बैटन का बहिष्कार किया है और न केवल मशाल का बहिष्कार किया, उन्होंने तो यहां तक कहा कि मेरा तो मन कर रहा था कि इसकी राज्य में एन्ट्री ही न होने दूं। चुनाव हारे मणिशंकर ऐय्यर को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया गया तो इन खेलों के संबंध में उनकी भड़ास तो समझ में आती है, मगर शिवराज किन वजहों से इसका विरोध कर रहे हैं, समझ में नहीं आता। दरअसल, पहली बार पांच साल में तीन मुख्यमंत्री (भाजपा के) देख चुके मध्यप्रदेश में शिवराज दोबारा मुख्यमंत्री बने तो उन्हें लगा कि सारा किया-धरा उनका है, इसीलिए जनता ने दोबारा सत्ता की चाबी सौंपी है, सो जो भी मन में आएगा, बोलते रहेंगे। यहां शिवराज भूल जाते हैं कि किन्हीं वजहों से जनता अगर उन्हें सत्ता सौंपती है तो इसका मतलब यह कतई नहीं कि वे तानाशाह हो जाएंगे, जैसा कि आजकल उनका रवैया है। अब यहां थोड़ी चर्चा उन वजहों की भी, जिसके बूते वे दोबारा मुख्यमंत्री बने। असल में पहले कार्यकाल के बाद जनता में शिवराज की छवि विकास पुरुष की बन गई। कुछ संयोग ने भी उनका साथ दिया। हुआ यूं कि 10 साल के दिग्विजय सिंह के लूटराज के बाद जब भाजपा की सरकार बनी तो उसी वक्त केंद्र सरकार की राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना की गई। गांव-गांव सड़कें बनीं, तालाब बने और थोक के भाव वृक्षारोपण का काम हुआ। इस कथित विकास में स्थानीय मजदूरों को रोजगार मिला और गांवों की सूरत कुछ-कुछ बदली नजर आने लगी। यह बात अलग है कि नरेगा-मनरेगा में सरपंच-सेकेट्रियों ने इतना घर भर लिया है कि उनकी दो पीढ़ी आलीशान तरीके से न सही तो सामान्य तरीके से बैठे-बैठे खा सकती है। इस विकास कार्य में जिन मजदूरों को काम मिला, वे शिवराज को विकास पुरुष तो कहने ही लगे, अच्छे-अच्छे पढ़े-लिखे और छुटभैये नेता लोगों ने भी उनकी जमकर तारीफ की और इसका असर यह हुआ कि शिवराज के नेतृत्व में दोबारा भाजपा ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया। सच्चाई तो यह है कि शिवराज की विकास पुरुष वाली छवि का आकलन करना हो तो राज्य के किसी भी जिले चले जाएं, वही सब देखने को मिलेगा जो 20 साल पहले था। अलबत्ता, जर्जर पुल, सरकारी इमारतें, बिजली-पानी की किल्लत और सड़ांध मारती गंदी बस्तियों में जरूर इजाफा हुआ है।
फिर से मौजूदा प्रसंग में लौटें तो कॉमनवेल्थ खेलों को लेकर शिवराज की बयानबाजी शर्मनाक है। एक राज्य के मुखिया होने के नाते उनसे इस तरह की उम्मीद नहीं थी, मगर कोई सठिया जाए तो उसके लिए कोई कर भी क्या सकता है? कॉमनवेल्थ खेलों से जुड़ी अनियमितताओं की आलोचना हो सकती है और होनी चाहिए, मगर अब जबकि 15 दिन बाकी रह गए हैं, शिवराज इस बालसुलभ हठ से क्या जाहिर करना चाहते हैं, यह वे जानें या उनके सलाहकार। ये खेल देश की प्रतिष्ठा से जुड़े हैं और जैस-तैसे निपट जाएं, अब हर कोई यही चाहता है। हां, अगर शिवराज का कोई व्यक्तिगत आग्रह-दुराग्रह (जो कि एक सार्वजनिक फिगर के संदर्भ में मान्य नहीं है) है तो उनकी यह सोच उन्हें मुबारक हो। वैसे शिवराज को एक बात नहीं भूलनी चाहिए कि खेल मंत्री एमएस गिल साहब बहुत पहले कह चुके हैं कि इस तरह के आयोजन बेटी के ब्याह की तरह होते हैं, जो बगैर तैयारी के भी ऐन वक्त पर निबटा लिए जाते हैं।

Sunday, September 12, 2010

वेल डन दिग्गी


जमाना हो गया मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के मुखारबिंद से शुभ बातें सुने। हाल-फिलहाल उन्होंने पते की बात कही है। दिग्विजय सिंह ने कहा है कि मानव संसाधन विकास मंत्री को उच्च शिक्षा में सुधार करने की कोशिशों के बजाय प्राथमिक स्तर की शिक्षा में सुधार की तरफ ध्यान देना चाहिए। गौरतलब है कि कपिल सिब्बल पर इन दिनों उच्च शिक्षा में कायापलट का भूत सवार है। कभी वे कहते हैं कि देश में विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय बनाए जाएंगे तो कभी कहते हैं कि आईआईटी में भी डॉक्टरी की तकनीकी शिक्षा दी जाएगी। कपिल सिब्बल का तर्क है कि चूंकि, अपने मुल्क की पचास फीसदी से अधिक आबादी युवा है और इनमें से अधिकांश युवा उच्च शिक्षा में प्रवेश नहीं कर पाते, इसलिए और ज्यादा विश्वविद्यालय खोले जाने की जरूरत है। सिब्बल साहब का तो यहां तक कहना है कि विदेशी विश्वविद्यालयों को भी अपने यहां फ्रेंचाइज़ी खोलने दिया जाएगा और ऐसा करने से हार्वर्ड, कैंब्रिज और ऑक्सफोर्ड जैसे तथाकथित दुनिया के नामी विश्वविद्यालयों की पढ़ाई घर बैठे होगी यानी भारत में। इसके लिए सिब्बल ने सदन में बकायदा अधिनियम भी पारित करवा लिया है। 

इसके उलट कांग्रेस के ही तथाकथित वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह प्राथमिक शिक्षा में सुधार की बात कह रहे हैं। दिग्गी राजा की बात सौ फीसदी सही है कि प्राथमिक शिक्षा में सुधार के बगैर उच्च शिक्षा में गुणवत्ता की कल्पना बेमानी है। दुनिया जानती है और अपने देश के मानव संसाधन विकास मंत्रालय की रिपोर्ट बताती है कि दूरदराज के प्राइमरी स्कूलों के 40 फीसदी बच्चे माध्यमिक स्तर तक नहीं पहुंच पाते और इसी तरह 50 फीसदी छात्र माध्यमिक स्तर से कॉलेज नहीं पहुंच पाते। इसकी बड़ी वजह पढऩे-लिखने के बावजूद रोजगार की समस्या है तो आंशिक वजह आर्थिक है। कई चाहकर भी पढ़ नहीं सकते क्योंकि उन्हें बाप-दादों के साथ काम में हाथ बंटाना होता है। ऐसे में हमें दिग्विजय सिंह की बातों में दम दिखता है, मगर उनका यह बयान वास्तविक चिंता कम, सियासी ज्यादा लगता है। आखिर ये वही दिग्विजय ही हैं, जिन्होंने अपने 10 साल के मुख्यमंत्रित्वकाल में प्राथमिक शिक्षा का सबसे अधिक कवाड़ा किया। ठेके पर मास्टर रखे। अपने पहले कार्यकाल में दिग्गी राजा ने शिक्षा कर्मी की जमकर नियुक्ति की थी और इन्हीं यशस्वी शिक्षकों और उनके नाते-रिश्तेदारों के दम पर दोबारा मुख्यमंत्री बने थे। फिर इन शिक्षाकर्मियों की हालत भिक्षाकर्मियों जैसी हो गई और तीसरी बार राघोगढ़ के इस राजकुमार को सत्ता से रुखसत होना पड़ा था। यहां बता दूं कि शिक्षाकर्मियों को नियुक्ति के समय 50 हजार से लेकर एक लाख तक की घूस देनी पड़ी थी और इनके परमानेंट होने के कोई चांस नहीं थे। पूरे प्रदेश से आए दिन भोपाल में धरना-प्रदर्शन करने जाते थे भाई लोग यानी कुल मिलाकर सड़कछाप हो गए थे। यहां एक दिलचस्प तथ्य है कि दिग्गी राजा के समय 500 रुपये प्रति माह में गुरुजीÓयों की भर्ती हुई थी। इन्हें गांव और वार्ड के स्तर पर बच्चों को पढ़ाना होता था। बाद में शैक्षिक प्रोग्रेस रिपोर्ट सरपंच को देनी होती थी। एक वाकया सुनकर तो आप लोग माथा पीट लेंगे कि कोटे से बनी एक महिला सरपंच ने पंचायत की शैक्षिक प्रोग्रेस रिपोर्ट विकास अधिकारी को भेजी और रिपोर्ट के नीचे सील के साथ सरपंच साहिबा का अंगूठा लगा हुआ था। यहां बता दूं कि प्रदेश में इस तरह का यह इकलौता मामला नहीं था, यह तो मात्र बानगी है। 
बहरहाल, सियासी ही सही, दिग्विजय सिंह के विचारों को तरजीह दी जानी चाहिए। भगवा आतंकवाद... हिंदू आतंकवाद... मुस्लिम तुष्टीकरण और धर्मनिरपेक्षता के आडंबर से हटकर पहली बार उन्होंने अपने पढ़े-लिखे होने का प्रमाण जो दिया है।

Tuesday, September 7, 2010

सुरिजभान काकू आ रहा हूं आपसे मिलने

बीते दिनों उत्तराखंड के लोककवि और जनांदोलनों से जुड़े गिरीश तिवाड़ी उर्फ गिरदा की याद में आयोजित सभा में मैं भी शरीक हुआ। उत्तराखंड बनने से पहले और बाद के दिनों में गिरदा की सक्रिय भागीदारी रही है, चाहे वह चिपको आंदोलन हो, चाहे वह नदी बचाओ आंदोलन हो या फिर उत्तराखंड निर्माण आंदोलन। गिरदा के जीवन-फलक को समझने के बाद मुझे अहसास हुआ कि किसी लोकल शख्श की क्या-क्या तमन्नाएं होती हैं, जीवनसंघर्ष में किस तरह से वह सामाजिक उत्थान के सपने देखता है।
एकाध सामाजिक संगठनों को छोड़कर जीते जी गिरदा के योगदान को किसी ने सलाम नहीं किया। अब तमाम तथाकथित बड़े साहित्यकार, लेखक मसि-कागद खर्च कर रहे हैं।
दरअसल, वाचिक परंपरा वाले इस मुल्क में लोककवियों और लोक कलाकारों की जीते जी कोई पूछ-परख नहीं होती, जबकि इनका आलोक तथाकथित किसी भी भद्र कवि-कलाकार से कम नहीं होता। दूर ग्रामीण अंचलों में ये गुमनामी की जिंदगी जी रहे होते हैं। बानगी के तौर पर अपने सुरिजभान काकू को लीजिए। सुरिजभान काकू का मूल नाम है सूर्यभान सिंह। जैसा कि बोलियों के साथ होता है, सूर्यभान का देशज बन गया सुरिजभान। जिस तरह से शहरों में हर चालीस पार शख्स को लोग अंकल कहने लगते हैं, उसी तरह गांवों में बुजुर्ग लोगों को लोगबाग काका कहते हैं, चाहे वह किसी जाति-धर्म का हो। काका से काकू भी वैसे ही बना, जैसे चाचा से चाचू या मामा से मामू। 
बहरहाल, सुरिजभान काकू पढ़े बिल्कुल नहीं हैं, मगर लढ़े बहुत हैं। हालांकि अब अपना दस्तखत (उनकी बोली में दसकत) हिंदी और अंगरेजी दोनों में कर लेते हैं। शायद कमल, मटक, खटमल.... (पहली-दूसरी जमा में पढऩे वाले बच्चों की तरह) पढ़ लेते हैं क्योंकि बहुत दिनों से उनकी दिली तमन्ना थी- 'लाला मैं एतना पढ़ैं चाहत हौं कि रमायन पढ़ लेवं' (बेटे मैं इतना पढऩा चाहता हूं कि रामायण पढ़ सकूं)। रामायण यानी तुलसी की रामचरित मानस...।
सतना क्षेत्र में जो बोली बोली जाती है, वह विशुद्ध बघेली नहीं बोली जाती, उसमें बघेली और बुंदेली का घालमेल है और यही बोली है अपने सुरिजभान काकू की। इंदिरा गांधी के समय की इमरजेंसी से लेकर हाल-फिलहाल में केंद्र की मनमोहन और राज्य की शिवराज सरकार के कामकाज पर जो दोहे-कुंडलिया रचते हैं, मजाल है कि स्थापित कवि उन गहराइयों तक पहुंचें !! सरकारी कामकाज के झोल की बात हो, सरकारी उपलब्धियों की बात हो, लालफीताशाही हो, पंचायत के पंच-सरपंचों के चाल-चलन और कामकाज की बात हो, सब एक सांस में सुना देते हैं। क्या दोहे गढ़े थे सरकार की नरेगा योजना और शिक्षाकर्मी योजना पर!! मेरा साल में एकाध बार ही गांव जाना होता है और कहीं अगर सुरिजभान काकू से मुलाकात हो गई तो पूरे साल भर के राजनीतिक-सामाजिक घटनाक्रम की जानकारी उनके दोहों-कुंडलियों के जरिए मिल जाती है। अपने काकू को रागों की भी गहरी समझ है। पारंपरिक सोहर-बिआह से लेकर कजरी, दादरा और टप्पा तक और अनूप जलोटा के भजनों से लेकर मुंबइया धुनों की थिरकन उनके लोकगीतों के अंग हैं। सच तो यह है कि सुरिजभान काकू क्या हैं, इस शब्दों मात्र में कहा ही नहीं जा सकता। अपुन को लगता है उन्हें जानने के लिए एक बार उनसे मिलना मांगता है। आप उनसे मिलिए, उनकी जानकारी का कोई विषय बताइए, पांच मिनट उन्हें समय दीजिए और वहीं खड़े-खड़े उस घटना-परिघटना या संबंधित विषय पर दोहा-गीत सुन लीजिए। अब तो काकू के घर भी ट्रैक्टर आ गया है, वरना आज से चार-पांच साल पहले जब अपनी बैलगाड़ी में होते थे तो उनकी स्वरचित फाग और बिरहा सुनते ही बनते थे। चौका-बासन, चना-चबेना, भाजी-रोटी, खेत-खलिहान सब कुछ आपको सुरिजभान काकू की कविता में मिलेगा। 
...मैं अब यहां रुकना चाहता हूं क्योंकि अपने काकू से संबंधित जो भी स्मृतियां हैं, उन्हें याद करते वक्त भावुक हो जाता हूं। बहरहाल, काकू नवंबर में आ रहा हूं, आपसे मिलूंगा जरूर। पंचायत में क्या-क्य हुआ या हो रहा है, सब कुछ मुझे जानकारी चाहिए।
(यहां एक विनम्र निवेदन करना चाहता हूं कि इस तरह की प्रतिभाएं ग्रामीण अंचलों में बहुतायत हैं, उन्हें सहेजने की जरूरत है)

Wednesday, August 18, 2010

love is not an object but a process

As usual when I woke up at 1.30pm for my daily shift, on Aug 17th, 2010, I felt a tinge of freshness because of a good sleep. My watch had just showed me 1.30. I rushed to lavatory and was barely done when I heard my mobile ringing. It was a call from the cab driver at 2.10 to suggest me to board the cab in the next half an hour by 3pm. I did some mental calculation and found out that there was something wrong, either with the driver or with my watch.
I preferred to check the later first as it was easier and was in my vicinity. Unfortunately my watch betrayed me and it was late by 20 minutes. Nevertheless, I did manage to overcome those 20 minutes and embarked on my almost 35 miles journey without fail on time. Nothing worthwhile happened in the office to mention here.
Except one thing. When I checked my watch at 9pm, it was dead, an expected outcome. I was un-easy and perturbed the whole night (I work night-shift) because of that. Every other second my focus was my watch and I was contemplating over my schedule and was planning and cancelling out different time slots to get my watch repaired on a certain day.
Next day was a perfunctory and a humdrum daily routine. Again I had got the call from the cab-driver to board the cab by 3.00pm.
But it was not a usual departure like every day.
I was in a fix. It was choosing either the deep blue see or the devil. I thought of wearing my watch and then abdicated the idea. But again I thought why I should miss my watch, my love. At first I thought, since it serves no purpose, so let it be where it is (it was at my bed lying alone and must be missing me). Then I thought it has been a true companion in my thick and thin days without complains for the last 7 years.
So I conceived of a notion typically associated with the mothers and teenage lovers, when they refuse to leave their wards (mothers, their babies and lovers, their beloved ones). And I relinquished the idea of being callous to my watch and extended my support during its bad days, which it deserved. I would be lying if I do not mention that being generous to my watch was my innermost feeling. It has to do more with the emotions than with logic. As a true friend I picked it up cordially and placed it on my wrist with élan. I don’t know what happened after that but I really felt a lot more relieved and content. As an inveterate teenager who keeps on giving a cursory look to every girl/boy who passes by, I looked at my watch many times the same way!!!
But it never failed to show its consistency of being dead! It never took trouble to greet me with its movement. and it was stuck at 9 o’ clock. At 9.10 pm I decided to go for my supper, my watch took me by surprise as it was back from the coma and was moving its limbs which I found hard to believe. I thought it was just a momentary act which will vanish in thin air in a short while. Thinking that I forced that thought out of my conscience.
But I was destined to prove wrong.
Hours passed by, I was over with my work and had to leave for the day. It was early morning 2a.m (19th Aug).
I checked my watch; lo and behold it was exactly right!!!
I could not believe my eyes and was again under the impression that it must be my hallucination and accused my blind love for it evoking that kind of response. I decided not to budge from the fact that my watch was long dead and I reprimanded myself for being so un-realistic.
Again hours passed by, I was excessively concentrated on my mobile phone and book rather than on my watch when I was again taken aback by my watch. Some anecdotes from the book which I was reading at that point were sweeping through my mind but my watch was recurrent in the sub-conscious. My love for it refused to cow down when I gave nth look to it with a deep sigh and silent smile.
To my astonishment it was matching my mobile watch, the other watches and was up-to-date with its usual pace!!! It had started working properly.
Within 24 hours I had gained back the love and confidence for my watch. This strengthened and cemented my love for it. I am sure; this incident will be etched out in my memory lanes for once and all.
My watch taught me two things.
First if you really love something or somebody, you just need to shower the love and need not expect the same in return. Your act will be a boomerang and you will be surely rewarded for the same.
Second important thing; affection and love should not be devoted only to the people but it should also be spread across to the in-animated objects to feel content and satisfied. It would also avoid reclusiveness. Nothing happens without reaction which is also supported by Newton’s 2nd law of action-reaction. Every activity will yield some kind of return no matter if it is as per your expectation or contrary to that.
I loved (and still love it profoundly) my watch and was rewarded for showing the faith in that(I did not leave my watch when it was not working).
Now as a matter of fact I have chosen an unconditional and everlasting love and have promised un-barter system for my watch and for all other things and people.
For me love is not an object but a process. I just want to immerse in it. While I was writing this, I have been looking at my watch over and over again. And oops I realized it’s time to bade good bye
-Anoop Maurya

Sunday, August 15, 2010

ऑनर किलिंग पर 'मुंबइया आक्रोश'

मुद्दा तो है... बल्कि कहें कि यह गंभीर मुद्दा है। मुद्दा न होता तो भारतीय संसद में इसकी गूंज न सुनाई देती। अब इस पर लगाम लगाने के लिए सरकार कानून बनाने के बारे में सोच रही है। यह बात अलग है कि खाप पंचायतें और इस तरह के सामाजिक संगठन इसे जायज मानते हैं और इस पर किसी भी तरह के नए कानून के खिलाफ हैं।

ऑनर किंलिंग समाज के लिए ऐसा कलंक बनता जा रहा है कि इस पर चिंता स्वाभाविक है। शायद इसीलिए इज्जत के नाम पर प्यार करने वालों के कत्ल का मामला मीडिया और राजनीतिक बहसों के बाद अब फिल्मों तक पहुंच गया है। अब तक हंसी-ठिठोली वाली फिल्में बनाने के लिए मशहूर प्रियदर्शन ने इस ज्वलंत मुद्दे पर आक्रोश फिल्म बना डाली है। राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता प्रियदर्शन की आक्रोश अंतरजातीय पे्रम पर आधारित है। बिहार की पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म में ऑनर किलिंग के इर्द-गिर्द एक पे्रम कहानी बुनी गई है। अजय देवगन स्टारर इस फिल्म के प्रोमो रिलीज हो चुके हैं और यह फिल्म एक अक्तूबर को सिनेमाघरों में प्रदर्शित होगी।

फिल्म के प्रोमो के शुरू में ही बताया जाता है कि 1947 में ऑनर किलिंग के नाम पर 1114 हत्याएं हुई थीं और इस वर्ष यानी 2010 में अब तक 3235 हत्याएं हो चुकी हैं। फिल्म के प्रोमो में सवाल किया जाता है कि क्या हमें आजादी मिल गई? भारतीय समाज में प्रतिष्ठा किसी भी दूसरी वस्तु या इनसान से बड़ी है। इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है प्रतिष्ठा के नाम पर होने वाली हत्याएं। अगर प्रेम विवाह या अंतरजातीय विवाह की आखिरी परिणति हत्या या समाज निकाला है तो फिल्म में किया गया सवाल निश्चय ही बड़ा सवाल है और मुमकिन है कि सवाल खड़ा करने वालाई भी जुल्म का शिकार बने।

दरअसल, भारतीय समाज की पहचान सहनशील और शांतिप्रिय के तौर पर है। हर जुल्म और अपमान को हंसकर सह लेना हमारी खासियत रही है। ऐसा नहीं है कि खुद पर या किसी और पर जुल्म होते देख हममें से किसी को गुस्सा या खीझ नहीं होती। सबको होती है, मगर कभी आदतन तो कभी सामाजिक भय के कारण हम चुप्पी साध लेते हैं। बिरले लोग होते हैं, जो प्रतिकार करने का साहस जुटा पाते हैं या अपना गुस्सा आक्रोश में बदल पाते हैं।

गौरतलब है कि इस आक्रोश से पहले सन 1980 में भी इसी नाम से एक फिल्म आई थी। गोविंद निहिलानी की उस फिल्म में ताजा ताजा बस यही समझ में आता है कि आक्रोश की अपनी असल आवाज उसके सन्नाटे में दबी होती है, मगर अक्सर इस चुप्पी के पीछे एक आक्रोश दबा होता है और वह इतना खामोश रहता है कि उसका होना न होना बनकर समाप्त हो जाता है। आदिवासियों पर होने वाले अत्याचार पर बनी उस आक्रोश में एक अजीब सन्नाटा है। पूरी फिल्म में लहानिया भीखू (ओम पुरी) कुछ नहीं बोलता, लेकिन उसके हावभाव उसके आक्रोश को खुद कह जाते हैं। लहानिया भीखू अपनी पत्नी की हत्या का आरोपी होता है। हालांकि, भीखू और उसके वकील को पता होता है कि दबंग जमीदारों ने उसकी पत्नी का बलात्कार उसे मार दिया है, मगर कोर्ट को तो सबूत चाहिए। आपबीती सुनाने खुद भीखू की बहन आती है, मगर वहीं कुल्हाड़ी से वार करके भीखू उसे मार देता है। इस तरह डर और अशुरक्षा की भावना के चलते भीखू के सारे आक्रोश महज एक दुर्घटना बनकर समाप्त हो जाते हैं। ऑनर किलिंग जैसे गंभीर मुद्दे पर बनी प्रियदर्शन की आक्रोश 1980 वाली आक्रोश की तरह दुर्घटना नहीं होगी, ऐसा ट्रेलर कहा जा सकता है। कौन है गुनहगार? अक्षय खन्ना के इस सवाल पर चेहरे पर झुर्रियां पड़ीं एक बूढ़े की तमतमाती आवाज कि तुम हो गुनहगार... तुमने सब किया है, हमें आश्वस्त करती है कि यह आक्रोश पूरे शिद्दत के साथ युवा वर्ग को झकझोरने का काम करेगी। यूं, अजय देवगन और अक्षय खन्ना के साथ बिपाशा बसु, राइमा सेन, अमिता पाठक और परेश रावल जैसे कलाकार हैं तो मनोरंजन की गुंजाइश तो है ही।

Thursday, July 22, 2010

पीपली लाइव, अमीर खान और हिंदी सिनेमा


फिल्म पीपली लाइव का एक दृश्य
भाई आमिर खान के भेजे की दाद देनी होगी। बंदा जहां भी खोदता है, पानी निकलने की पक्की गारंटी होती है या यूं कह लीजिए कि खुदाई ही वहां करता है, जहां पानी होने की हंड्रेड परसेंट संभावना हो। पीपली लाइव को ही लीजिए न। इस फिल्म की रिलीजिंग डेट तो 13 अगस्त है, मगर इसके गाने अभी से बच्चे-बच्चे की जुबान पर हैं। कोई हैरत की बात नहीं, अगर यह फिल्म थ्री-इडियट्स की कामयाबी को भी पीछे छोड़ दे। मौका भुना लेने की कला कोई आमिर खान से सीखे।
ऐसा नहीं है कि पीपली लाइव कोई नई चीज है। गरीबी, महंगाई और कर्ज के तले दम तोड़ते किसान तो रोजाना अखबारों की सुर्खियां बनते हैं। संपादकीय पृष्ठों पर तमाम चिंतापरक आलेख छपते हैं। पीपली लाइव की कहानी भी कर्ज के बोझ से आत्महत्या करते किसान, मौतों पर सरकारी दया जिसे साफ-साफ शब्दों में कहें तो मुआवजा और फिर मुआवजों पर भी होने वाली राजनीति को पर्दे पर चित्रित किया गया है। कम से कम ट्रेलर देखने पर तो ऐसा ही लगता है, मगर यह फिल्म बिकेगी तो सिर्फ एक बिला पर और वो है- सखि सइयां तो खूबइ कमात हैं, महंगाई डाइन खाय जात है...। इस ठेठ बुंदेली लोकगीत के आगे रंगरंगीला परजातंतर... जैसा व्यवस्था की धज्जियां उड़ाने वाला गीत भी फीका पड़ जा रहा है। बेशक, महंगाई आज की तारीख में सबसे हॉट मुद्दा है। दिखावे के तौर पर ही सही, सरकारें चिंतित हैं। ऐसे माहौल में आमिर ठान बैठा- अब कैश नहीं किया तो कब? गीतकार को छह लाख पकड़ा दिए और अब मनमाना दुहते रहो....।
बहरहाल, ऐसा नहीं है कि आमिर खान को केवल मौकों को कैश करने आदत है। वे प्रयोगधर्मी रहे हैं। लीक से हटकर कुछ नया परोसने की उनकी आदत है। साल में एक-दो फिल्में ही सही, मगर होती हैं खास। आमिर खान की इसी खासियत ने हिंदी सिनेमा का हुलिया बदलकर रख दिया है। लगान और उसके बाद आईं आमिर खान की सभी फिल्मों ने हिंदी फिल्मकारों को सोचने को मजबूर किया और यही वजह है कि आज हिंदी सिनेमा बदला-बदला नजर आ रहा है। फिल्मों की थीम सहित गीत-संगीत सब में बदलाव महसूस किया जा सकता है। बीती सदी के अंतिम दशक के दम तोड़ते भारतीय सिनेमा को जैसे फिर से पर लग गए हैं। कोई कल्पना कर सकता था कि कबुतरी बोले कबूतर से मुझे छेड़ न छत के ऊपर से... और छत पे सोया था बहनोई, मैं तन्ने समझ कर सो गई से निकलकर महंगाई डाइन खाय जात है और बहती हवा सा था वो... उड़ती पतंग सा था वो... जैसे गीतों तक भारतीय सिनेमा पहुंचेगा? फार्मूला फिल्मों की चौहद्दी से निकलकर हिंदी सिनेमा कभी खुशी कभी गम, बागवान, बंटी और बबली, लागा चुनरी में दाग, तारे जमीं पर, वेलकम टु सज्जनपुर, हल्ला बोल, गुलाल, स्लमडॉग मिलनेयर, पा, राजनीति और पीपली लाइव तक पहुंचा है तो इस बदलाव में आमिर का अच्छा-खासा हक है। यह बात अलग है कि इस रंगरंगीले परजातंतर में फिल्म दर फिल्म आमिर, अमीर भी होते गए।
(टाइटल में आमिर खान को जानबूझकर अमीर खान लिखने की गुस्ताखी के लिए पाठक माफ करें...)

Friday, June 18, 2010

भाजपा तो गई काम से...

जिस एक व्यक्ति के सम्मोहन पर देश की जनता ने भाजपा का प्रधानमंत्री बनाया, उसे अब देश की जनता और खुद भाजपा चुका हुआ मान चुकी है। समझने वाले समझ जाएंगे कि मैं बात अटल बिहारी वाजपेयी की कर रहा हूं। अटल के बाद पार्टी में दो नंबर, और कभी-कभी तो एक नंबर की हैसियत रखने वाले लालकृष्ण आडवाणी भी लगभग चुक गए हैं। वेंकैया पार्टी-अध्यक्षी से ज्यादा कुछ कर नहीं सकते, मुरलीमनोहर जोशी को उनके घरवाले ही नहीं पसंद करते (याद रहे पिछली बार इलाहाबाद से लोकसभा का चुनाव हार गए थे) तो राजनाथ की ठकुरइसी उनके आड़े आती है। अरुण जेटली सिर्फ बोल सकते हैं, न तो चुनाव लड़ सकते और न ही जीत सकते (याद रखें, वे राज्यसभा के लिए चुने जाते हैं)। जसवंत तो बिचारे शहीद ही हो गए। बचा कौन? ...अच्छा सुषमा स्वराज। सुषमा जी की भी अब वह सुषमा नहीं रही। तो क्या कहें भाजपा में सब चुके हुए नेता हैं? अफसोस, मगर कहना ही पड़ेगा। भाजपा में कोई 'वीर पुरुष' दिखता नहीं है जो इस पार्टी की डगमगाती नैया को पार लगाए। ताव-ताव में इस वक्त कोई वरुण गांधी का नाम ले सकता है, मगर उनमें पांचवीं पास बच्चे जैसा बचकाना दिमाग है, इसका एहसास खुद वरुण को भी होगा । वैसे भाजपा की यह नैया डूबेगी नहीं, सिर्फ डगमगाती रहेगी। संघ परिवार अपनी इस दत्तक पार्टी को हरगिज़ डूबने नहीं देगा।
दरअसल, यह सब बातें दिमाग में इसलिए आईं कि बीती तेरह तारीख को पटना में भाजपा कार्यकारिणी की बैठक और फिर रैली हुई तो वहां नरेंद्र मोदी ही छाए रहे और बिहार में भाजपा के बड़े नेता सुशील मोदी हाशिये पर दिखे। और तो और, प्रदेश अध्यक्ष सीपी. ठाकुर की भी खास पूछ-परख नहीं हुई जिन्होंने आगामी बिहार चुनावों को देखते हुए इतना बड़ा तामझाम खड़ा किया था।
...तो क्या मान लें कि आज की तारीख में भाजपा का भाग्य विधाता नरेंद्र मोदी हैं? कोई माने या न माने, लेकिन भाजपा से अनुराग रखने वाली देश की 90 फीसदी आबादी नरेंद्र मोदी को सर्वाधिक पसंद करती है। बाकी दस परसेंट में बाकी लोग आते हैं। ग्रामीण इलाकों में केवल 'भाजपा' के नाम पर वोट देने वाले खालिस भाजपाइयों का मंतव्य बता रहा हूं। समझ लीजिए कि छोटे-मोटे एक व्यक्तिगत सर्वे के आधार पर ये बातें कह रहा हूं। यहां सवाल उठता है कि वाजपेयी और आडवाणी के बाद नरेंद्र मोदी इतने हिट कैसे हो गए? एक बहुत आसान-सी और आम धारणा है- गोधरा कांड की वजह से। मगर मुझे लगता है यह पूरा सच नहीं है। गोधरा के अलावा भी मोदी ने 'कुछ' किया है। इस 'कुछ' में कुछ उनका पारदर्शी शासन है, कुछ गुजरात की आर्थिक उन्नति है, कुछ इन्फ्रास्ट्रक्चर का डेवलपमेंट है और बहुत कुछ है कट्टर हिंदुत्व। मोदी का हिंदुत्व आडवाणी के हिंदुत्व की तरह कभी नहीं रहा। सब जानते हैं कि पार्टी में लौहपुरुष का तमगा पाए आडवाणी ने खुद की उदार छवि दिखाने का अनेक बार पाखंड किया है। यह पाखंड नरेंद्र मोदी के पास नहीं है। यही उनके हिट होने को कारणों में से एक है। जनमत और अपने विवेक के आधार पर यह कहने में मुझे कतई परहेज़ नहीं कि मोदी अगर राष्ट्रीय राजनीति में आते हैं तो ज्यादा कुछ नहीं तो अगले चुनाव में वह पार्टी को नो प्रॉफिट, नो लॉस पर रख सकते हैं, मगर एक सच यह भी है कि राष्ट्रीय राजनीति में मोदी को आना ही नहीं है। वजह बहुत साफ है। मोदी खुद कोई रिस्क नहीं लेना चाहेंगे। राजनीति में ग्रह-नक्षत्र बड़ी तेजी से बदलते हैं। मोदी को पता है कि अपनी ब्रांड इमेज के अनुरूप आम चुनावों में सीट नहीं ला पाए तो कहीं के नहीं रह जाएंगे- न घर के न घाट के। इसलिए फिलहाल, भाजपा के बारे में यही कहा जा सकता है कि वह तो गई काम से... राहुल गांधी ने कांग्रेस को बहुत बढ़त दे दी है। यहां किसी के भी मन में यह बात आ सकती है कि यह बंदा मोदी का गुणगान क्यों कर रहा है? इसलिए साफ कर दूं कि मोदी से अपनी कोई रिश्तेदारी नहीं है और न ही भाजपा से कोई खास लगाव। लगाव है तो इस हद तक कि लोकतांत्रिक सराकारों की सत्ता में एक ही दल या पार्टी जब लंबे समय तक काबिज रहती है तो शासन निरंकुश हो जाता है। किसी राष्ट्र या राज्य के लिए यह स्थिति शुभ नहीं है। यहां यह न भूलें कि ब्रिटेन में सत्ता परिवर्तन हुआ है और वहां के इतिहास में पहली बार गठबंधन सरकार बनी है तो कहीं न कहीं आम जनता की मजबूरी रही होगी।
(नोट : करीब महीने भर से इस ब्लॉग पर पोस्टिंग को लेकर प्रॉब्लम थी... कुछ विचारों को पोस्ट करने की कोशिश की थी, मगर पता नहीं किन टेकनिकल वजहों से संभव नहीं हुआ...)

Friday, March 26, 2010

मुझे माफ करना सचिन...

कल की शाम चेन्नई और बंबई के बीच आईपीएल के बीसमबीस मैच मेरे लिए अहम था। चेन्नई ने पहले खेलते हुए 180 रन ठोंक डाले थे। बंबई को नौ के रेट से रन बनाने थे। टी-20 में नौ का रन रेट कोई हौवा नहीं है, लेकिन सब जानते हैं कि बंबई की टीम में सचिन और जयसूर्या को छोड़कर कोई भी ऐसा बल्लेबाज नहीं है जिसकी अंतरराष्ट्रीय क्या, राष्ट्रीय ख्याति भी हो। तिस पर जयसूर्या अनफिट। ऐसे में केवल सचिन के भरोसे एक दोस्त से एक-एक बीयर की शर्त लगा बैठा। यूं, एक बीयर की कीमत बहुत ज्यादा नहीं होती। चालीस रुपल्ली में आ जाती है और यही भाव तो किलो भर परवल या शिमला मिर्च का भी है। लेकिन शर्त में पैसे से ज्यादा कीमत तो अपने कॉन्फीडेंस की होती है।
ओपनिंग करने आए सचिन और शिखर धवन। पहले ओवर में बने केवल पांच रन। अब मैं मन ही मन सचिन को कोसने लगा था। हालांकि दूसरे ओवर के बाद शिखर धवन चौका-छक्का उड़ाए जा रहे थे और रन रेट दस के आस-पास था। में जब शिखर धवन आउट हुए तो बंबई आधा सफर तय कर चुकी थी। फस्र्ट डाउन आए सौरभ तिवारी दो रन बनाकर ही चलते बने। फिर आर सतीश तीन रन पर पवेलियन जा बैठे। इस बीच सचिन भी टुक-टुक करने लगे। अब मेरा थूक सूखने लगा था क्योंकि रन रेट फिर नौ के ऊपर पहुंच गया था। पोलार्ड आए और कुछ पैर जमाया तो जान में जान आई। इस बीच परेरा या थरेरा नाम का कोई बॉलर आया और उसकी जो पिटाई सचिन ने की तो लगा कि अब ज्यादा दिक्कत नहीं होगी। दिक्कत हुई भी नहीं। बाद में दो और विकेट जरूर गिरे लेकिन छह गेंद रहते ही बंबई मजे से मैच जीत चुकी थी लेकिन सचिन को मन ही मन गरियाने की आत्मग्लानि बनी रही। वह भी तब, जब प्रेजेंटेशन सेरमनी में सचिन ने कहा मैं जान-बूझकर बड़े स्ट्रोक नहीं खेल रहा था। मुझे मालूम था कि बड़ा स्कोर है और एक छोर पर मेरा टिका रहना जरूरी था। सचिन ने यह भी कहा मैं तो चाहता था कि मैच फिनिश करके आऊं, लेकिन दुर्भाग्यवश बीसेक रन रहते आउट हो गया। तब जिस तरह मैं मन ही मन सचिन को कोस रहा था, मैंने मन ही मन कहा, सचिन मुझे माफ करना। मुझे क्या मालूम था कि तुम मैच फिनिश करने के इरादे से मैदान पर आए थे। याद रखिए दोस्तो सचिन के प्रति मेरी यह दीवानगी इसलिए नहीं है कि वे बहुत अच्छा खेलते हैं। कल 71 रन की पारी खेलने वाले सचिन से ज्यादा मेरी दीवानगी उस सचिन पर है जो सचिन हर्सा भोगले से सुरेश रैना की तारीफ कर रहा था। अपने ज्यादा दूसरी की प्रतिभा को सलाम करने वाला सचिन। एक खालिस हिंदुस्तानी सचिन।

Monday, March 22, 2010

अगर मैं संपादक होता तो...

यकीन मानिए अगर किसी अखबार का मैं संपादक होता तो सुधीश पचौरी का लिखा हरगिज नहीं छपने देता। खुदा न खास्ता मेरी जानकारी के बगैर कहीं छप भी जाता तो उनका पेमेंट नहीं होने देता। मुमकिन है मेरी इस घोषणा के साथ पचौरी जी के कुछ प्रशंसक तैश में आकर मुझे भला-बुरा कहें लेकिन अब मैं भी अपनी जिद पर आ गया हूं।
ऐसा नहीं है कि पचौरी जी के साथ मेरी कोई निजी दुश्मनी है। मैंने दो साल उनकी क्लास अटेंड की है। पढ़े-लिखे अच्छे इंसान और प्रोफेसर हैं वो। दिल्ली विश्वविद्यालय की सेंट्रल रिफरेंस लाइब्रेरी में हिंदी का शायद ही कोई प्रोफेसर जाता हो लेकिन पचौरी जी वहां अक्सर दिख जाते थे। अब भी दिखते होंगे लेकिन अब मैं वहां नहीं दिखता। बड़े पढ़ाकू और लिक्खाड़ हैं। हिंदी साहित्य में उत्तरआधुनिक विचारधारा (हालांकि कई विद्वान उत्तरआधुनिकता को कोई विचारधारा नहीं मानते) का खूंटा गाड़कर उसको थामे रहने का श्रेय पचौरी जी को तो है ही।
यहां लोग सवाल कर सकते हैं कि सर्वगुण संपन्न एक अच्छे पढ़ाकू और लिक्खाड़ प्रोफेसर के साथ ऐसा दुराग्रह क्यों? वजह बहुत साफ है। पिछले तकरीबन छह साल से मैं दिल्ली में हूं। हर अखबार और बहुद हद तक पत्रिकाओं को देखता-पढ़ता रहा हूं और करीब-करीब हर जगह सुधीश पचौरी की मौजूदगी पाई है। उनकी इस मौजूदगी को देखते हुए उनकी तुलना ब्रह्म से की जा सकती है। ब्रह्म जो व्यापक विरज अज...। यत्र-तत्र-सर्वत्र...। यूँ, किसी पत्रिका में कभी उनका परिचय पढ़ा था, रोजना एक हजार से अधिक शब्द लिखने वाले हिंदी के प्राध्यापक...। सचमुच बहुत लिखते हैं अपने पचौरी जी लेकिन सवाल है कि पचौरी जी जो लिखते हैं, किसके कितने पल्ले पड़ता है? दो बार... चार बार... छह बार पढ़ लीजिए किसी आर्टिकल को, कुछ समझ में ही नहीं आता कि आखिर कहना चाहते हैं जनाब। कई बार लगा शायद अपनी समझ कम है, इसलिए उनका लिखा समझ में नहीं आता लेकिन और जो लगनशील और चेतनापुरुष लोग हैं, उनसे जब पूछा कि आज फलां अखबार में पचौरी जी का फलां आर्टिकल छपा है, कुछ समझ में आया तो उन लोगों ने भी असमर्थता जाहिर की। कोई बहुत समझदार हो तो कल यानी रविवार, 21 मार्च के हिंदुस्तान के एडिट पेज पर सुधीश पचौरी का आर्टिकल छपा है, पढ़ के बता दे उसका सार।
तीन साल पहले मैंने रामदरश मिश्र का इंटरव्यू किया था। पत्र-पत्रिकाओं के सिलसिले में बात की तो उनका कहना था कि जब लोग केवल लिखने के लिए लिखते हैं भला कौन पढ़ेगा और क्या समझेगा। इस प्रसंग में उन्होंने बाकायदा सुधीश पचौरी का नाम लिया था। मिश्र जी ने यह भी कहा था पत्र-पत्रिकाओं में एक भरा-पूरा रैकेट काम कर रहा है। किसका लिखा छापना है, किसको कितनी पेमेंट करनी है... सब कुछ तय होता है। ऐसे में किसी आम पाठक को किसी का लिखा समझ में नहीं आता तो उसकी बला।
किसी भी अखबार का संपादकीय पेज उसकी आत्मा माना जाता है। उसमें छपने वाले लेख और विचार एक वर्ग (कम से कम पढ़े-लिखे वर्ग) की चेतना को जगाने, समाज और व्यवस्था के प्रति उसका नजरिया बदलने का काम करते हैं, कुछ नया करने की प्रेरणा देते हैं। लेकिन सुधीश पचौरी टाइप के लेखक, जो केवल लिखने के लिए लिखते हैं, मुझे निराश करते हैं। इन सठियाए लेखकों से मुझे कोफ्त सी होने लगी है।

Saturday, March 20, 2010

अबकी हंसी आई

भारतीय समाज की परंपरा रही है कि जब प्यास लगती है तो कुआं खोदने की सूझती है। पानी निकले, न निकले अपनी बला से। ऐसा ही कुछ रहा है अपनी सरकारों के साथ। बात ये है कि कल के रोज यानी गुरुवार, 19 तारीख को देश की केंद्रीय  कैबिनेट ने इस बात की मंजूरी दी है कि अब हवाई जहाजों को हाइजैक करने वाले/वालों को सीधे फांसी पर लटाकाया जाएगा। इसके लिए संसद में कानून लाया जाएगा। बात बहुत सीधी सी है कि यह कानून बन भी जाएगा। आखिर नेक विचार तो है ही। केंद्र सरकार में प्रमुख विपक्षी दल भाजपा ने भी इस तरह के कानून का स्वागत किया है। पार्टी प्रवक्ता राजीव प्रताप रूड़ी कह रहे थे कि भाजपा लंबे समय से इस तरह के कानून की मांग करती रही है और अब अगर सरकार इस पर मुहर लगाने जा रही है तो उनकी पार्टी इसका समर्थन करेगी। यह बात अलग है कि सरकार में रहते हुए भाजपा को कभी इस तरह के कानून की जरूरत नहीं पड़ी।
इस खबर को सुनते मैं जमकर हंसा। मेरे हंसने की वजह बहुत साफ है। मैं हंसा इसलिए कि जिन अपराधों के लिए अपने देश में पहले से ही फांसी का प्रावधान है, उसमें अब तक कितनों को फांसी हुई है? भारतीय संसद हमले के दोषी अफजल गुरु को कोर्ट कब का फांसी की सजा सुना चुका है और उसे आज तक फांसी नहीं हुई। मुंबई हमलों का गुनहगार अजमल कसाब की कहानी भी कुछ इसी तरह की है। कभी वह खुले तौर पर गुनाह कबूल करता है और फांसी की मांग करता है तो दाढ़ी-मूंछ मुड़ाकर अपने को नाबालिग बताता है। इस बहुरूपिए का हमारी सरकार क्या करेगी, अभी तक कुछ भी तय नहीं हो सका है। मुमकिन है कोर्ट उसे भी फांसी की सजा सुनाए लेकिन क्या सरकार भी उसे फांसी दे पाएगी? यह सवाल तब तक बना रहेगा जब तक कसाब हमारा सरकारी मेहमान बना रहेगा। सैकड़ों नजीरें हैं इस बाबत। एक बात और। डेविड कोलमेन हेडली नाम का प्राणी मुंबई हमलों का सूत्रधार रहा है। हमारी तथाकथित विश्वविख्यात खुफियां एजेंसियां उसके कारनामों का पता लगाने में नाकाम रही हैं। भला हो उन कमांडोज का जिन्होंने कसाब को जिंदा पकड़ लिया और भला हो अमेरिका का कि उसकी चुस्त-दुरुस्त खुफिया तंत्र ने हेडली को धर दबोचा वरना हमारा सुरक्षा तंत्र हमलावरों का सुराग लगा पाता, यह कहने की हिम्मत नहीं पड़ रही। अब भारत सोच रहा है कि हेडली को उसके हवाले कर दिया जाए लेकिन अमेरिका कहां सौंपने वाला! बगैर कुछ करे-धरे हम अपराधियों को पकडऩा चाहते हैं। याद रहे मुंबई हमलों के साल भर बाद तो हेडली का नाम सामने आया है। इसके बाद भी हमारी सुरक्षा एजेंसियां हेडली के एक फोटो तक का जुगाड़ नहीं कर सकीं कि मीडिया में उसे सार्वजनिक किया जा सके कि हो न हो कही अपने देश के ही किसी गली-मोहल्ले में घूमता हुआ वह मिले तो लोग पुलिस को खबर कर सकें। चार दिन पहले तक अखबारों में हेडली के स्क्रैच ही छपते आए हैं।
अब आप ही बताएं कि सुरक्षा के इतने 'पुख्ता'! हालातों के बीच अगर हवाई जहाज के हाईजैकरों को फांसी की सजा का कानून बनेगा तो उस पर हंसी नहीं आएगी? क्या यह एक सरकारी खानापूर्ति नहीं है?

Thursday, March 18, 2010

देश में बिलायती पढ़ाई, दिल मांगे मोर...

...तो अब करीब-करीब तय हो गया है कि विदेशी विश्वविद्यालय भी हमारे देश में अपने कैंपस खोल सकेंगे। केन्द्रीय कैबिनेट ने इससे संबंधित विधेयक को मजूरी दे दी है और अगर यह बिल संसद से भी मंज़ूर हो जाता है तो फिर बल्ले-बल्ले। हार्वर्ड, येल, कैंब्रिज और ऑक्सफोर्ड की डिग्री अपने देश में। विद्वतजन इसे उच्च शिक्षा की कायापलट के तौर पर देख रहे हैं। हमारे मानवसंसाधन विकास मंत्री और नामी वकील कपिल सिब्बल साहब का तर्क है कि उच्च शिक्षा में गुणवत्ता की कमी है। इसे देखते हुए हमारे युवा विदेशों की ओर रुख कर रहे हैं। इसलिए क्यों न विदेशी विश्वविद्यालयों की पढ़ाई अपने देश में हो? अच्छा विचार है सिब्बल साहब... बिल्कुल होनी चाहिए लेकिन हमारी समझ में नहीं आता कि देश में ही अच्छे विश्वविद्यालय क्यों नहीं खोले जाते? उच्च शिक्षा के बाबत यहां राष्ट्रीय ज्ञान आयोग की रिपोर्ट गौर करने लायक है। रिपोर्ट में आयोग ने कहा था कि देश में करीब सात फीसदी युवा ही उच्च शिक्षा तक पहुंच पाते हैं। 2015 तक इसे बढ़ाकर कम से कम 15 फीसदी किया जाना चाहिए। इसी तरह अभी विश्वविद्यालयों की तादाद 500 के करीब और इन्हें भी बढ़ाकर 1500 किया जाना चाहिए। इन तथ्यों से सरकार को कोई मतलब नहीं और सीधा फार्मूला तय किया गया कि उच्च शिक्षा के कायाकल्प के लिए विदेशी विश्वविद्यालयों को देश में उनके अपने कैंपस खोलने दिए जाएं।
बात सिर्फ 500 विश्वविद्यालयों की नहीं है। इन 500 विश्वविद्यालयों में ढंग के विश्वविद्यालय उंगली में गिने जा सकते हैं। गोरखपुर विश्वविद्यालय, पटना विश्वविद्यालय और खुद मैंने जहां से बीए पास किया है, अवधेशप्रताप सिंह विश्वविद्यालय रीवा... लंबी फेहरिस्त है जनाब। यहां क्या-क्या और कैसे-कैसे होता है, कौन नहीं जानता। एनरोल कोई होता है, परीक्षा कोई और देता है और डिग्री किसी और के नाम अलाट होती है। यह पहेली समझ से बाहर है कि इस तरह की सुविधाओं को दूर करने के प्रयास क्यों नहीं किए जाते? क्या विदेशी विश्वविद्यालययों के देश में कैंपस खोलकर उच्च शिक्षा की दिशा में सुधार संभव है? यह बात तो सोलह आने सच है कि जब कोई विदेशी संस्थान यहां अपनी दुकान खोलेगा तो उसे ग्राहकों की कमी नहीं होगी। खाए-पिए-अघाए का बड़ा वर्ग है अपने मुल्क में। फीस-ऊस की उन्हें कोई चिंता नहीं होगी। लेकिन यहां चिंता तो इस बात की है इन विदेशी दुकानों के दुकानदार कौन होंगे? ये तो तय है कि हार्वर्ड या ऑक्सफोर्ड अपने कैंपस यहां खोलेंगे तो मास्टरी करने वहां से कोई नहीं आने वाला। तब तो यही होगा कि यहां जो अच्छे मास्टर हैं, उनका उपयोग होगा। उपयोग बेहद आसान होगा क्योंकि वे लोग इन्हें दो-चार गुनी सैलरी दे सकते हैं। तब होगा ये कि हमारे अपने संस्थानों में जो दो-चार अच्छे लोग हैं, वे सब भाग जाएंगे उन्हीं संस्थानों में। एक बात और, इन विदेशी मेहमानों को खुली छूट होगी कि वे अपनी फीस अपने तरीके से तय करेंगे। जाहिर है, जब सात समंदर पार करके यहां कोई आएगा तो चैरिटी खोलने तो आएगा नहीं। उन लोगों की फीस भी अच्छी-खासी होगी और उस फीस को अच्छे-खासे लोग ही दे पाएंगे। ऐसे में जिस भारतीय युवा को उच्च शिक्षा देने की बात कही जा रही है, वह एक सरकारी भ्रम के सिवाय और कुछ नहीं है।

Thursday, March 11, 2010

आनंदियां तो रोज मरती हैं

हिंदी फिल्मों में हीरो-हीरोइनों के मरने का रिवाज नहीं है। इसकी एक वजह है कि भारतीय काव्यशास्त्र में ट्रेजडी की अवधारणा नहीं है। अपने यहां दुखांत कलाओं को पसंद नहीं किया जाता। इसके इतर पाश्चात्य काव्यशास्त्र में ट्रेजडी पर जोर दिया गया। आरस्तू का विरेचन सिद्धांत ट्रेजडी को ही आधार बनाता है और शायद यही वजह है कि मशहूर नाटककार शेक्सपीयर के अधिकांश नाटक दुखांत हैं।
बहरहाल, कलर्स चैनल पर प्रसारित होने वाले सीरियल बालिका बधू की मुख्य नायिका आनंदी मर गई। उसे गोली मार दी गई। बालिका बधू ही वह सीरियल है जिसने एकता कपूर के अजर-अमर नायक-नायिकाओं और अनवरत, बारहमासी सीरियलों की बैंड बजाई। देखते-ही देखते कलर्स के आगे दूसरे मनोरंजन चैलनों का रंग फीका पड़ गया। उनकी टीआरपी कलर्स के बरक्श आधे पर ही ठहरती, खासकर बालिका बधू के प्रसारण के समय।
जैसा कि न्यूज़ चैनल वाले बता रहे थे कि देश सदमें में है, आनंदी के मरने से कम से कम मुझे सदमा नहीं लगा क्योंकि इस देश में आनंदियां तो रोज मरती हैं। जिन बाल विवाह और अनमेल विवाह जैसी समस्याओं को केंद्र में रखकर सीरियल की शुरुआत हुई, उसमें आनंदी जैसे किरदारों का मरना तो उनकी नियति है। ऐसी आनंदी, जो सासू मां की हां में हां मिलाने की जगह उससे सवाल करे। घर की इज्जत की परवाह किए बगैर छुट्टा घूमने की आदी हो, बात-बात में पति से भी झगड़ बैठे। मुझे लगता है कि आनंदी की मौत सही समय पर हुई है। निर्माता ज्यादा समय तक उसे जिंदा रखता तो सीरियल की एथेंटिसिटी मर जाती। बालिका बधू क्या, कलर्स में प्रसारित होने वाले सीरियल ऐसे हैं जो प्रेमचंद की कहानियों की याद दिलाते हैं। प्रेमचंद भी अपने पात्रों, खासकर केन्द्रीय पात्रों के साथ कोई हमदर्दी नहीं बरतते। चाहे आप गोदान के होरी को लें या रंगभूमि के सूरदास को या फिर निर्मला। घोर अत्याचार और बद से बदतर जिंदगी गुजारते हैं प्रेमचंद के पात्र। क्यों? क्योंकि भारतीय समाज का यही यथार्थ है। प्रेमचंद या बालिका बधू का निर्माता चाहता तो अपने केन्द्रीय पात्र को लंबे समय तक जिंदा रखता, उनकी जिंदगी को खुशहाल दिखाता लेकिन क्या ऐसा हमारे समाज में भी है?

Friday, March 5, 2010

एक गधे की आत्मकथा

कृश्न चन्दर का  नाम उर्दू के साथ हिंदी में भी बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। एक से बढ़कर एक कहानियां लिखीं। बहरहाल, उनका खासा चर्चित और गुदगुदाने वाला एक उपन्यास है- एक गधे की आत्मकथा। देश की सरकारी संस्कृति पर कोड़े जैसी मार और मार ऐसी  कि मार खाने वाला पीठ भी सहलाता रह जाए और कुछ बोल भी न पाए। आप जिन लोगों ने न पढ़ा हो ज़रूर पढ़िएगा, मज़ा आएगा और व्यवस्था से साक्षात्कार भी । कुछ अंश देखें...
इसके पढ़ने से बहुतों का भला होगा
महानुभाव ! मैं न तो कोई साधु संन्यासी हूं, न कोई महात्मा-धर्मात्मा। न श्री 108 स्वामी गहम गहमानन्द का चेला हूं, न जड़ी बूटियों वाला सूफी गुरमुखसिंह मझेला हूं। न मैं वैद्य हूं, न कोई डाक्टर। न कोई फिल्म स्टार हूं, न राजनीतिज्ञ। मैं तो केवल एक गधा हूं, जिसे बचपन के दुष्कर्मों के कारण समाचार पत्र पढ़ने का घातक रोग लग गया था। होते-होते यह रोग यहां तक बढ़ा कि मैंने ईंटें ढोने का काम छोड़कर केवल समाचार-पत्र पढ़ना आरम्भ कर दिया। उन दिनों मेरा मालिक धब्बू कुम्हार था, जो बाराबंकी में रहता था। (जहां के गधे बहुत प्रसिद्ध हैं) और सैयद करामतअली शाह बार एट ला की कोठी पर ईंटें ढोने का काम करता था। सैयद करामतअली शाह लखनऊ के एक माने हुए बैरिस्टर थे, और अपने पैतृक नगर बाराबंकी में एक आलीशान कोठी स्वयं अपनी निगरानी में बनवा रहे थे। सैयद साहब को पढ़ने-लिखने का बहुत शौक था।
इसलिए अपनी कोठी का जो भाग उन्होंने सबसे पहले बनवाया, वह उनकी लाइब्रेरी का हाल तथा रीडिंग-रूम था, जिसमें वह प्रातःकाल आकर बैठ जाते। वह बाहर बरामदे में कुर्सी डालकर समाचार पत्र पढ़ते और ईंटें ढोने वालों की निगरानी भी करते रहते। उन्हीं दिनों मुझे समाचार पत्र पढ़ने का चस्का पड़ा। होता अधिकतर यों था कि इधर मैंने एक उठती हुई दीवार के नीचे ईंटें फेंकीं, उधर भागता हुआ रीडिंग-रूम की ओर चला गया। बैरिस्टर साहब समाचार पढ़ने में इतने लीन होते कि उन्हें मेरे आने की खबर तक न होती और मैं उनके पीछे खड़ा होकर समाचार-पत्र का अध्ययन शुरू कर देता। बढ़ते-बढ़ते यह शौक यहां तक बढ़ा कि बहुधा मैं बैरिस्टर साहब से पहले ही समाचार पत्र पढ़ने पहुँच जाता। बल्कि प्रायः ऐसा भी हुआ है कि समाचार-पत्र का पहला पन्ना मैं पढ़ रहा हूं और वह सिनेमा के विज्ञापनों वाले पन्ने मुलाहिज़ा फरमा रहे हैं। मैं कह रहा हूं-ओह ! ईडन, आइजन हावर, बुल्गानिन फिर मुलाकात करेंगे और वह कह रहे हैं-अहा !...
दिल्ली का भूगोल
इसके पूर्व में शरणार्थी, पश्चिम में शरणार्थी, दक्षिण में शरणार्थी और उत्तर में शरणार्थी बसते हैं। बीच में भारत की राजधानी है और इसमें स्थान-स्थान पर सिनेमा के अतिरिक्त नपुंसकता की विभिन्न औषधियों और शक्तिवर्धक गोलियों के विज्ञापन लगे हुए हैं, जिससे यहां की सभ्यता तथा संस्कृति की महानता का अनुभव होता है। एक बार मैं चांदनी चौक से गुज़र रहा था कि मैंने एक सुन्दर युवती को देखा, जो तांगे में बैठी पायदान पर पांव रखे अपनी सुन्दरता के नशे में डूबी चली जा रही थी और पायदान पर विज्ञापन चिपका हुआ था, असली शक्तिवर्धक गोली इन्द्रसिंह जलेबी वाले से खरीदिए !’ मैं इस दृश्य के तीखे व्यंग्य से प्रभावित हुए बिना न रह सका और बीच चांदनी चौक में खड़ा होकर कहकहा लगाने लगा। लोग राह चलते-चलते रुक गए और एक गधे को बीच सड़क में कहकहा लगाते देखकर हंसने लगे।...
वे बेचारे मेरी धृष्ट आवाज पर हंस रहे थे और मैं उनकी धृष्ट सभ्यता पर कहकहे लगा रहा था। इतने में एक पुलिस के संतरी ने मुझे डण्डा मारकर टाउन हाल की ओर ढकेल दिया। इन लोगों को मालूम नहीं कि कभी-कभी गधे भी इन्सानों पर हंस सकते हैं। ...
दिल्ली में आने वालों को यह याद रखना चाहिए कि दिल्ली में प्रवेश करने के बहुत से दरवाज़े हैं। दिल्ली दरवाज़ा, अजमेरी दरवाज़ा, तुर्कमान दरवाज़ा इत्यादि। परन्तु आप दिल्ली में इनमें से किसी दरवाज़े के रास्ते भीतर नहीं आ सकते। क्योंकि इन दरवाज़ों के भीतर प्रायः गायें, भैंसें, बैल बैठे रहते हैं या फिर पुलिसवाले चारपाइयां बिछाए ऊंघते रहते हैं। हां, इन दरवाज़ों के दायें-बायें बहुत सी सड़के बनी हुई हैं, जिन पर चलकर आप दिल्ली में प्रवेश कर सकते हैं। अंग्रेजों ने दिल्ली में भी एक इंडिया गेट बनाया है, लेकिन इस गेट से भी गुज़रने का कोई रास्ता नहीं है। दरवाजे के ईर्द-गिर्द घूम-फिरकर जाना पड़ता है। संभव है, दिल्ली के घरों में भी थोड़े दिनों में ऐसे दरवाज़े लग जाएं; फिर लोग खिड़कियों में से कूदकर घरों में प्रवेश किया करेंगे।...
दिल्ली में नई दिल्ली है और नई दिल्ली में कनाटप्लेस है। कनाटप्लेस बड़ी सुन्दर जगह है। शाम के समय मैंने देखा कि लोग लोहे के गधों पर सवार होकर इसकी गोल सड़कों पर घूम रहे हैं। यह लोहे का गधा हमसे तेज़ भाग सकता है, परन्तु हमारी तरह आवाज़ नहीं निकाल सकता। यहां पर मैंने बहुत से लोगों को भेड़ की खाल के बालों के कपड़े पहने हुए देखा है। स्त्रियां अपने मुँह और नाखून रंगती हैं, और अपने बालों को इस प्रकार ऊंचा करके बांधती हैं कि दूर से वे बिल्कुल गधे के कान मालूम होते हैं। अर्थात् इन लोगों को गधे बनने का कितना शौक है, यह आज मालूम हुआ।...

Wednesday, March 3, 2010

फिदा सरकार, हुसेन का इमोशनल अत्याचार

2 मार्च की हॉट खबर थी कि मकबूल फिदा हुसेन ने कतर की नागरिकता हासिल कर ली है। नागरिकता स्वीकार करने के बाद अपने पहले इंटरव्यू में हुसैन ने कहा,   'भारत मेरी मातृभूमि है। मैं अपनी मातृभूमि से घृणा नहीं कर सकता, लेकिन भारत ने मुझे खारिज कर दिया। ऐसे में मुझे भारत में क्यों रहना चाहिए?... जब संघ परिवार ने मेरे ऊपर हमला किया तो उस समय सभी चुप्पी साधे रहे। राजनीतिक नेतृत्व, कलाकारों या बुद्धिजीवियों में से किसी ने भी मेरे पक्ष में आवाज नहीं उठाई, लेकिन मैं इस सच्चाई को जानता हूं कि भारत की 90 प्रतिशत जनता मुझे प्यार करती है।... भारत की सरकारें मेरी हिफाजत नहीं कर सकीं। इसलिए इस तरह के देश में निवास करना मेरे लिए बहुत कठिन है। राजनेताओं की नजर सिर्फ वोट पर है।'
हुसेन ने कहा, 'कतर में मैं पूरी आजादी का आनंद ले रहा हूं। अब कतर ही मेरा स्थान है। यहां मेरी अभिव्यक्ति की आजादी पर किसी का अंकुश नहीं है। मैं यहां बहुत खुश हूं।'
करीब-करीब ठीक कहा है हुसेन साहब आपने। बहुत गंदी है यहां की पॉलिटिक्स । मुबारक हो आपको आपका नया ठिकाना, लेकिन एक गुजारिश है आपसे। आप भारतवासियों पर इमोशनल अत्याचार न करें। किसी की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को आघात लगता है तो हमें भी बड़ी छटपटाहट होती है, लेकिन अफसोस है कि आपकी अभिव्यक्ति हमेशा दोयम दर्जे की रही है। मकबूल साहब बानगी कबूल करें-
इसे अजीब इत्तेफाक कहेंगे कि 2 मार्च को मकबूल साहब ने कतर की नागरिकता हासिल की और दो दिन पहले 28 फरवरी के जनसत्ता के एडिट पेज पर करीब-करीब तीन चौथाई हिस्से में तसलीमा नसरीन का आर्टिकल छपा। तसलीमा ने सलमान रुश्दी और हुसेन साहब के साथ उनका नाम जोड़े जाने पर गहरा क्षोभ व्यक्त किया है। बकौल तसलीमा,  ''दोनों रचनाकारों के प्रति असीम श्रद्धा रखते हुए मैं कह रही हूं कि इन दोनों पुरुषों के साथ कोष्टक में मेरा नाम रखना उचित नहीं है। धर्मयुक्त, विषमतायुक्त, समान अधिकारयुक्त समाज की रचना के लिए मैं जो संघर्ष कर रही हूं, वह अगर किसी को दिखाई नहीं देता तो वह चाहे जितना बड़ा शिल्पी क्यों न हो, मेरे आदर्श के करीब आने की उसमें कोई योग्यता नहीं है''
फिदा साहब से तसलीमा का मोहभंग का कारण तो देखें- ''हुसेन के सरस्वती की नंगी तस्वीर बनाने को लेकर भारत में विवाद हुआ तो मैं स्वाभाविक रूप से चित्रकार की स्वाधीनता के पक्ष में थी। मुसलमानों में नास्तिकों की तादाद बहुत कम है। मैंने मकबूल फिदा हुसेन के चित्रों को हर जगह से खोजकर कर देखने की कि हिंदू धर्म के अलावा किसी और धर्म, खासकर अपने धर्म इस्लाम को लेकर उन्होंने कोई व्यंग्य किया है या नहीं? लेकिन देखा कि बिल्कुल नहीं किया है बल्कि कैनवास पर अरबी में शब्दश: अल्लाह लिखते हैं। हिंदुत्व पर अविश्वास के चलते ही उन्होंने लक्ष्मी और सरस्वती को नंगा चित्रित किया। क्या वे मोहम्मद को नंगा कर सकते हैं? मुझे यकीन है, नहीं कर सकते।...
हुसेन भी उन्हीं धार्मिक लोगों की तरह हैं जो अपने धर्म में तो विश्वास करते हैं लेकिन दूसरे लोगों के उनके धर्म में विश्वास की निंदा करते हैं।....
हुसेन की देश वापसी के लिए सरकार पूरी कोशिश कर रही है, मुझे न तो भारत सरकार लौटने दे रही है न बांग्लादेश सरकार।''
एक बार फिर धवलकेश हुसेन साहब को नए आशियाने की मुबारकवाद और एक बात यह कि भारत को जाकिर हुसेन से कोई घृणा नहीं, मौलाना कलाम आजाद से कोई घृणा नहीं, विस्मिल्ला खान से कोई घृणा नहीं, अहमद-मोहम्मद हुसेन से कोई घृणा नहीं, गुलाम अली और मेंहदी हसन से नहीं, अब्दुल कलाम से नहीं... जायसी-रसखान से नहीं, फिर आपसे क्यों? आप आत्ममंथन करें जनाब।

Wednesday, February 24, 2010

सचिन के कारनामे पर मुझे आश्चर्य नहीं हुआ

...तो आखिरकार सचिन ने सईद अनवर का रिकॉर्ड तोड़ ही दिया। वनडे क्रिकेट का पहला दोहरा शतक! समूचा देश खुश है, मैं भी हूं। ...लेकिन सच पूछिए तो सचिन के इस कारनामे पर मुझे आश्चर्य नहीं हुआ। यह तो होना ही था। पहले भी तो दो-तीन दफा सचिन ड्योढ़ी तक पहुंच ही गए थे। तारीख 21 मई 1997 को चेन्नई में बना सईद अनवर का जो रिकॉर्ड 24 फरवरी 2010 को ग्वालियर में टूटा, बहुत पहले टूट जाना चाहिए था। मुझे इस बात का पूरा भरोसा था कि ऐसा कारनामा सचिन जैसा खिलाड़ी ही कर सकता है।
लोगों को शायद याद न हो लेकिन जिस मैच में सईद अनवर ने 194 रन बनाए थे उसमें भारतीय टीम की कमान सचिन के पास ही थी और इसे संयोग ही कहेंगे कि सचिन की ही गेंद पर अनवर को गांगुली ने लपका था। मुझ जैसे देश के अधिकांश क्रिकेट प्रेमियों ने अनवर की उस पारी के बाद टेलिविजन सेट छोड़ दिया था, तोड़ दिया था और जीत की उम्मीद छोड़ दी थी। आखिर उस वक्त वनडे 327 रन बनना मायने रखता था। अनवर ने 22 चौकों और पांच छक्कों की मदद से 146 गेंदों में वो रन बनाए थे। सचिन ने 147 गेंदों में 25 चौकों और तीन छक्कों के साथ यह दोहरा शतक पूरा किया। अनवर को उस पारी में 19वें ओवर से आखिर तक रनर की जरूरत पड़ी थी मगर सचिन तेंदुलकर पूरे 50 ओवर खेले और आखिर तक बगैर किसी रनर के दौड़े।
बहरहाल, दो मायनों में सचिन की यह पारी मुझे खास लगती है। पहला, अप्रैल में जिंदगी के 37 साल पूरे करने जा रहे इस शख्स को कहां से ऊर्जा मिलती है, सोचने वाली बात है। ज्यादातर तो 15 ओवर खेलने के बाद ही हांफने लगते हैं। सचिन के इस स्टेमिना को सलाम तो करना ही होगा। दूसरा, मैन ऑफ द मैच का खिताब लेने के बाद अनवर ने पारी को 'खास' बताया था, बस। सचिन ने भी अपनी पारी को खास बताया लेकिन यह कहने में संकोच नहीं किया कि यह दोहरा शतक राष्ट्र को समर्पित है। सचिन की यही अदा उन्हें एक क्रिकेटर और एक खिलाड़ी से अलग एक भद्र इंसान बनाती है। यूं, किसी चैनल पर कल लता मंगेशकर ने भी कहा था कि सचिन एक खिलाड़ी से बढ़कर एक अच्छे इंसान हैं जो कामयाबी और शोहरत के बावजूद झुकना जानते हैं। यहां एक बात और याद आती है कि दो साल पहले कंमेंट्री बॉक्स में बैठकर बड़बड़ करने वाले संजय मंजरेकर और वकार युनुस जैसे लफ्फाज क्या अब भी यह कहने की हिम्मत जुटा पाएंगे कि सचिन बुढ़ा गए हैं और उन्हें संन्यास ले लेना चाहिए। याद रहे भाई लोगो, सचिन ने पिछले दो टेस्ट मैचों में लगातार दो शतक बनाए हैं और वनडे की श्रेष्ठ पांच पारियों में से तीन पिछले 12 महीने में खेली हैं।
रिकॉर्ड तो बनते-टूटते रहेंगे। फिलवक्त हम सब यादगार इतिहास के साक्षी बने हैं। इसे खुशी से जी लें, इतना बहुत है।