Thursday, April 7, 2016
Wednesday, May 11, 2011
A Simple Observation....
I am not going to write the movie review or something which you expect. It’s just a simple observation about the relationships in reference to Latin American (Spanish speaking countries), western (Specially U.S.) and Asian countries specially
We must know that in western countries, there is not much value given to relations, be it parent-child, husband-wife, girlfriend-boyfriend or any other. There, much focus is given to oneself and one’s priorities. If you are not happy with someone or something, you have every right to leave that person or thing behind and move on. And that is considered their right, rather culturally approved right. You don’t explore much about the possibilities of mending the ways to work that relationship again. You just know a culturally tested formula i.e. leave the person or thing you are bothered about. And you follow it.
Thursday, April 14, 2011
अन्ना के बहाने
सोचा था कि लिखने-पढ़ने का कोई फ़ायदा नहीं है, 'मगर दिल है कि मानता नहीं.' भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन लोकपाल विधेयक की मांग को लेकर अन्ना हजारे के आंदोलन के बाद कुछ लिखने को मज़बूर हूँ. Tuesday, November 2, 2010
सड़कें ख़ाली करो कि ओबामा आते हैं!
गलियाँ बुहारी जा रही हैं दिन में चार बार...
और हमसे कहा गया- सड़कें ख़ाली करो कि ओबामा आते हैं!
कहा गया कि शोर मत करना उस दरमियां
जब वे हों दिल्ली में...
हमसे कहा गया कि दो दिन के लिए तो घर से बहार भी मत निकलना
हो सके तो रोक लेना टट्टी-पिसाप भी
बगल वाले मंदिर में न बजाए कोई घंटियाँ
मस्जिद में अजान भी न पढ़े कोई...
रिक्शा और ताँगे वालों को तो ख़ास हिदायत है-
न निकलना दिन में धंधा करने- त्यौहार के मौसम में भी
हो सके तो चले जाओ दो-चार के लिए दिन दिल्ली छोड़ के कहीं और
कहा गया हम सब से कि सभ्य रहना दो- चार दिन के लिए
क्योंकि आ रहा है दुनिया का सबसे सभ्य आदमी
यानी अमेरिका का राष्ट्रपति बराक ओबामा!
Monday, October 4, 2010
तीसरे दिन की रामलीला
मित्र का बारंबार आग्रह
हम भी पहुंचे देखने
खूब भीड़भाड़, चहल-पहल
हर आयु-वर्ग के लोग पहुंचे थे-आज-
तीसरा दिन था-
मंचन था राम वनवास।
पहला दृश्य:
पत्नी सीता को समझा रहे थे प्रभु श्रीराम-
बोले- 'सीते! तुम मत कष्ट सहो...
तुम मत जाओ मेरे साथ' प्रत्युत्तर-
'मैंने तो पहले ही कर लिया है निर्णय
नहीं जाऊंगी आपके साथ वन को
आप ठहरे मर्यादापुरुषोत्तम, आज्ञाकारी
निभाओ वचन पिता का
मैं क्यों कर जाऊं...
मेरे वश की नहीं यह तपस्या
जंगल भी कोई रहने की जगह है?'
दर्शक हतप्रभ, संयोजक परेशान
आखिर हो क्या रहा है ये
सीता को समझाया गया-
'तुम्हारे वन गये बगैर कैसे होगा तुम्हारा हरण
और कैसे होगा राम-रावण युद्ध, रावण मरण
यह नाटक बंद करो और फौरन जाओ वन राम के साथ।'
जैसे-तैसे तैयार हुईं सीता
अब लक्ष्मण की न-नुकुर
आखिरकार समझा लिया गया उन्हें भी- तर्कों के सहारे।
निकल पड़े वन को तीनों
माताएं रो-रो कर हैरान तीनों
कैकेई को भी पहली बार रोते देखा इस रामलीला में।
दूसरा दृश्य:
गंगा तट पर बैठा था केवट निराश
आज मंदा था धंधा
देखते ही लपका-
'आओ जी, दो मिनट में पहुंचा देता हूं उस पार'
और शीघ्र ही तीनों पहुंचे गंगा पार
केवट से व्यथा सुनाई राम ने
मगर अड़ गया वह भी-
'माफ करो प्रभु
मेरे भी हैं बाल-बच्चे
सबका भरना पड़ता है पेट मुझे ही
साग-सब्जी भी ले जाना है शाम को
...फिर क्यों मूर्ख बनाते हो हम जैसों को
पढ़े-लिखे नहीं, इसलिए?
सब जानता हूं मैं
राजकुमार हो अयोध्या के
सदियों की कमाई रखी है खजाने में
मेरी मजदूरी के लिए इतनी मजबूरी!
फिर कोई खैरात तो नहीं मांगता...
जैसे भी हो, आप ही निकालो रास्ता'
...और अंत में देनी पड़ी अंगूठी सीता की ही
(दर्शकों की गालियां केवट को)
इस बार निषाद भी नहीं पहुंचा आवभगत करने राम की
दिन थे खेती-किसानी के।
किसी तरह रहने लगे चित्रकूट में
राम-लक्ष्मण-सीता पर्णकुटी में।
दृश्य तीन :
कुटिया पर पहुंची सूर्पणखा
विवाह का प्रस्ताव और राम-लक्ष्मण की समझाइश
बात यहां तक पहुंची कि काट ली जाय नाक इसकी
क्रोधित लक्ष्मण तैयार, मगर....
तभी आ धमाका लंकेश यानी रावण
बिना पोशाक के ही मंच पर
अब बंद होना चाहिए प्रतिशोध का यह अत्याचार...'
पूरे पंडाल में सन्नाटा, दर्शकों में खामोशी
और संयोजक तो पसीना-पसीना
कोसने लगा रावण को-
'क्यो आ धमके तुम मंच पर समय से पहले?'
रावण के इरादे भी थे खतरनाक
अड़ गया संयोजक से ही-
'सब तुम्हीं लोग कराते हो पैसे की खातिर-
कब तक... आखिर कब तक कटती रहेगी सूपर्णखा की नाक
और होता रहेगा सीता का हरण?'
मंच का माहौल था गरम
दर्शक उठ-उठकर लगे थे जाने
Saturday, September 18, 2010
सठिया गए हैं शिवराज सिंह
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह को सुर्खियों में बने रहने का रोग लग गया है। हफ्ते-दस दिन में कुछ न कुछ ऐसा उगल बैठते हैं, जिससे राष्ट्रीय स्तर पर छा जाते हैं और फिर जब अच्छी-खासी छीछा-लेदर हो जाती है तो फिर या तो माफी मांगते हैं या फिर कहते हैं कि मेरे बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है। फिलहाल, कॉमनवेल्थ खेलों को लेकर अपनी भड़ास निकाली है शिवराज ने। उन्होंने कॉमनवेल्थ से जुड़ी मशाल क्वीन बैटन का बहिष्कार किया है और न केवल मशाल का बहिष्कार किया, उन्होंने तो यहां तक कहा कि मेरा तो मन कर रहा था कि इसकी राज्य में एन्ट्री ही न होने दूं। चुनाव हारे मणिशंकर ऐय्यर को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया गया तो इन खेलों के संबंध में उनकी भड़ास तो समझ में आती है, मगर शिवराज किन वजहों से इसका विरोध कर रहे हैं, समझ में नहीं आता। दरअसल, पहली बार पांच साल में तीन मुख्यमंत्री (भाजपा के) देख चुके मध्यप्रदेश में शिवराज दोबारा मुख्यमंत्री बने तो उन्हें लगा कि सारा किया-धरा उनका है, इसीलिए जनता ने दोबारा सत्ता की चाबी सौंपी है, सो जो भी मन में आएगा, बोलते रहेंगे। यहां शिवराज भूल जाते हैं कि किन्हीं वजहों से जनता अगर उन्हें सत्ता सौंपती है तो इसका मतलब यह कतई नहीं कि वे तानाशाह हो जाएंगे, जैसा कि आजकल उनका रवैया है। अब यहां थोड़ी चर्चा उन वजहों की भी, जिसके बूते वे दोबारा मुख्यमंत्री बने। असल में पहले कार्यकाल के बाद जनता में शिवराज की छवि विकास पुरुष की बन गई। कुछ संयोग ने भी उनका साथ दिया। हुआ यूं कि 10 साल के दिग्विजय सिंह के लूटराज के बाद जब भाजपा की सरकार बनी तो उसी वक्त केंद्र सरकार की राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना की गई। गांव-गांव सड़कें बनीं, तालाब बने और थोक के भाव वृक्षारोपण का काम हुआ। इस कथित विकास में स्थानीय मजदूरों को रोजगार मिला और गांवों की सूरत कुछ-कुछ बदली नजर आने लगी। यह बात अलग है कि नरेगा-मनरेगा में सरपंच-सेकेट्रियों ने इतना घर भर लिया है कि उनकी दो पीढ़ी आलीशान तरीके से न सही तो सामान्य तरीके से बैठे-बैठे खा सकती है। इस विकास कार्य में जिन मजदूरों को काम मिला, वे शिवराज को विकास पुरुष तो कहने ही लगे, अच्छे-अच्छे पढ़े-लिखे और छुटभैये नेता लोगों ने भी उनकी जमकर तारीफ की और इसका असर यह हुआ कि शिवराज के नेतृत्व में दोबारा भाजपा ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया। सच्चाई तो यह है कि शिवराज की विकास पुरुष वाली छवि का आकलन करना हो तो राज्य के किसी भी जिले चले जाएं, वही सब देखने को मिलेगा जो 20 साल पहले था। अलबत्ता, जर्जर पुल, सरकारी इमारतें, बिजली-पानी की किल्लत और सड़ांध मारती गंदी बस्तियों में जरूर इजाफा हुआ है।Sunday, September 12, 2010
वेल डन दिग्गी

Tuesday, September 7, 2010
सुरिजभान काकू आ रहा हूं आपसे मिलने
एकाध सामाजिक संगठनों को छोड़कर जीते जी गिरदा के योगदान को किसी ने सलाम नहीं किया। अब तमाम तथाकथित बड़े साहित्यकार, लेखक मसि-कागद खर्च कर रहे हैं।दरअसल, वाचिक परंपरा वाले इस मुल्क में लोककवियों और लोक कलाकारों की जीते जी कोई पूछ-परख नहीं होती, जबकि इनका आलोक तथाकथित किसी भी भद्र कवि-कलाकार से कम नहीं होता। दूर ग्रामीण अंचलों में ये गुमनामी की जिंदगी जी रहे होते हैं। बानगी के तौर पर अपने सुरिजभान काकू को लीजिए। सुरिजभान काकू का मूल नाम है सूर्यभान सिंह। जैसा कि बोलियों के साथ होता है, सूर्यभान का देशज बन गया सुरिजभान। जिस तरह से शहरों में हर चालीस पार शख्स को लोग अंकल कहने लगते हैं, उसी तरह गांवों में बुजुर्ग लोगों को लोगबाग काका कहते हैं, चाहे वह किसी जाति-धर्म का हो। काका से काकू भी वैसे ही बना, जैसे चाचा से चाचू या मामा से मामू।
सतना क्षेत्र में जो बोली बोली जाती है, वह विशुद्ध बघेली नहीं बोली जाती, उसमें बघेली और बुंदेली का घालमेल है और यही बोली है अपने सुरिजभान काकू की। इंदिरा गांधी के समय की इमरजेंसी से लेकर हाल-फिलहाल में केंद्र की मनमोहन और राज्य की शिवराज सरकार के कामकाज पर जो दोहे-कुंडलिया रचते हैं, मजाल है कि स्थापित कवि उन गहराइयों तक पहुंचें !! सरकारी कामकाज के झोल की बात हो, सरकारी उपलब्धियों की बात हो, लालफीताशाही हो, पंचायत के पंच-सरपंचों के चाल-चलन और कामकाज की बात हो, सब एक सांस में सुना देते हैं। क्या दोहे गढ़े थे सरकार की नरेगा योजना और शिक्षाकर्मी योजना पर!! मेरा साल में एकाध बार ही गांव जाना होता है और कहीं अगर सुरिजभान काकू से मुलाकात हो गई तो पूरे साल भर के राजनीतिक-सामाजिक घटनाक्रम की जानकारी उनके दोहों-कुंडलियों के जरिए मिल जाती है। अपने काकू को रागों की भी गहरी समझ है। पारंपरिक सोहर-बिआह से लेकर कजरी, दादरा और टप्पा तक और अनूप जलोटा के भजनों से लेकर मुंबइया धुनों की थिरकन उनके लोकगीतों के अंग हैं। सच तो यह है कि सुरिजभान काकू क्या हैं, इस शब्दों मात्र में कहा ही नहीं जा सकता। अपुन को लगता है उन्हें जानने के लिए एक बार उनसे मिलना मांगता है। आप उनसे मिलिए, उनकी जानकारी का कोई विषय बताइए, पांच मिनट उन्हें समय दीजिए और वहीं खड़े-खड़े उस घटना-परिघटना या संबंधित विषय पर दोहा-गीत सुन लीजिए। अब तो काकू के घर भी ट्रैक्टर आ गया है, वरना आज से चार-पांच साल पहले जब अपनी बैलगाड़ी में होते थे तो उनकी स्वरचित फाग और बिरहा सुनते ही बनते थे। चौका-बासन, चना-चबेना, भाजी-रोटी, खेत-खलिहान सब कुछ आपको सुरिजभान काकू की कविता में मिलेगा।
Wednesday, August 18, 2010
love is not an object but a process
Sunday, August 15, 2010
ऑनर किलिंग पर 'मुंबइया आक्रोश'
Thursday, July 22, 2010
पीपली लाइव, अमीर खान और हिंदी सिनेमा
![]() |
| फिल्म पीपली लाइव का एक दृश्य |
ऐसा नहीं है कि पीपली लाइव कोई नई चीज है। गरीबी, महंगाई और कर्ज के तले दम तोड़ते किसान तो रोजाना अखबारों की सुर्खियां बनते हैं। संपादकीय पृष्ठों पर तमाम चिंतापरक आलेख छपते हैं। पीपली लाइव की कहानी भी कर्ज के बोझ से आत्महत्या करते किसान, मौतों पर सरकारी दया जिसे साफ-साफ शब्दों में कहें तो मुआवजा और फिर मुआवजों पर भी होने वाली राजनीति को पर्दे पर चित्रित किया गया है। कम से कम ट्रेलर देखने पर तो ऐसा ही लगता है, मगर यह फिल्म बिकेगी तो सिर्फ एक बिला पर और वो है- सखि सइयां तो खूबइ कमात हैं, महंगाई डाइन खाय जात है...। इस ठेठ बुंदेली लोकगीत के आगे रंगरंगीला परजातंतर... जैसा व्यवस्था की धज्जियां उड़ाने वाला गीत भी फीका पड़ जा रहा है। बेशक, महंगाई आज की तारीख में सबसे हॉट मुद्दा है। दिखावे के तौर पर ही सही, सरकारें चिंतित हैं। ऐसे माहौल में आमिर ठान बैठा- अब कैश नहीं किया तो कब? गीतकार को छह लाख पकड़ा दिए और अब मनमाना दुहते रहो....।Friday, June 18, 2010
भाजपा तो गई काम से...
जिस एक व्यक्ति के सम्मोहन पर देश की जनता ने भाजपा का प्रधानमंत्री बनाया, उसे अब देश की जनता और खुद भाजपा चुका हुआ मान चुकी है। समझने वाले समझ जाएंगे कि मैं बात अटल बिहारी वाजपेयी की कर रहा हूं। अटल के बाद पार्टी में दो नंबर, और कभी-कभी तो एक नंबर की हैसियत रखने वाले लालकृष्ण आडवाणी भी लगभग चुक गए हैं। वेंकैया पार्टी-अध्यक्षी से ज्यादा कुछ कर नहीं सकते, मुरलीमनोहर जोशी को उनके घरवाले ही नहीं पसंद करते (याद रहे पिछली बार इलाहाबाद से लोकसभा का चुनाव हार गए थे) तो राजनाथ की ठकुरइसी उनके आड़े आती है। अरुण जेटली सिर्फ बोल सकते हैं, न तो चुनाव लड़ सकते और न ही जीत सकते (याद रखें, वे राज्यसभा के लिए चुने जाते हैं)। जसवंत तो बिचारे शहीद ही हो गए। बचा कौन? ...अच्छा सुषमा स्वराज। सुषमा जी की भी अब वह सुषमा नहीं रही। तो क्या कहें भाजपा में सब चुके हुए नेता हैं? अफसोस, मगर कहना ही पड़ेगा। भाजपा में कोई 'वीर पुरुष' दिखता नहीं है जो इस पार्टी की डगमगाती नैया को पार लगाए। ताव-ताव में इस वक्त कोई वरुण गांधी का नाम ले सकता है, मगर उनमें पांचवीं पास बच्चे जैसा बचकाना दिमाग है, इसका एहसास खुद वरुण को भी होगा । वैसे भाजपा की यह नैया डूबेगी नहीं, सिर्फ डगमगाती रहेगी। संघ परिवार अपनी इस दत्तक पार्टी को हरगिज़ डूबने नहीं देगा।(नोट : करीब महीने भर से इस ब्लॉग पर पोस्टिंग को लेकर प्रॉब्लम थी... कुछ विचारों को पोस्ट करने की कोशिश की थी, मगर पता नहीं किन टेकनिकल वजहों से संभव नहीं हुआ...)
Friday, March 26, 2010
मुझे माफ करना सचिन...
कल की शाम चेन्नई और बंबई के बीच आईपीएल के बीसमबीस मैच मेरे लिए अहम था। चेन्नई ने पहले खेलते हुए 180 रन ठोंक डाले थे। बंबई को नौ के रेट से रन बनाने थे। टी-20 में नौ का रन रेट कोई हौवा नहीं है, लेकिन सब जानते हैं कि बंबई की टीम में सचिन और जयसूर्या को छोड़कर कोई भी ऐसा बल्लेबाज नहीं है जिसकी अंतरराष्ट्रीय क्या, राष्ट्रीय ख्याति भी हो। तिस पर जयसूर्या अनफिट। ऐसे में केवल सचिन के भरोसे एक दोस्त से एक-एक बीयर की शर्त लगा बैठा। यूं, एक बीयर की कीमत बहुत ज्यादा नहीं होती। चालीस रुपल्ली में आ जाती है और यही भाव तो किलो भर परवल या शिमला मिर्च का भी है। लेकिन शर्त में पैसे से ज्यादा कीमत तो अपने कॉन्फीडेंस की होती है।Monday, March 22, 2010
अगर मैं संपादक होता तो...
यकीन मानिए अगर किसी अखबार का मैं संपादक होता तो सुधीश पचौरी का लिखा हरगिज नहीं छपने देता। खुदा न खास्ता मेरी जानकारी के बगैर कहीं छप भी जाता तो उनका पेमेंट नहीं होने देता। मुमकिन है मेरी इस घोषणा के साथ पचौरी जी के कुछ प्रशंसक तैश में आकर मुझे भला-बुरा कहें लेकिन अब मैं भी अपनी जिद पर आ गया हूं।
तीन साल पहले मैंने रामदरश मिश्र का इंटरव्यू किया था। पत्र-पत्रिकाओं के सिलसिले में बात की तो उनका कहना था कि जब लोग केवल लिखने के लिए लिखते हैं भला कौन पढ़ेगा और क्या समझेगा। इस प्रसंग में उन्होंने बाकायदा सुधीश पचौरी का नाम लिया था। मिश्र जी ने यह भी कहा था पत्र-पत्रिकाओं में एक भरा-पूरा रैकेट काम कर रहा है। किसका लिखा छापना है, किसको कितनी पेमेंट करनी है... सब कुछ तय होता है। ऐसे में किसी आम पाठक को किसी का लिखा समझ में नहीं आता तो उसकी बला।Saturday, March 20, 2010
अबकी हंसी आई
Thursday, March 18, 2010
देश में बिलायती पढ़ाई, दिल मांगे मोर...
...तो अब करीब-करीब तय हो गया है कि विदेशी विश्वविद्यालय भी हमारे देश में अपने कैंपस खोल सकेंगे। केन्द्रीय कैबिनेट ने इससे संबंधित विधेयक को मजूरी दे दी है और अगर यह बिल संसद से भी मंज़ूर हो जाता है तो फिर बल्ले-बल्ले। हार्वर्ड, येल, कैंब्रिज और ऑक्सफोर्ड की डिग्री अपने देश में। विद्वतजन इसे उच्च शिक्षा की कायापलट के तौर पर देख रहे हैं। हमारे मानवसंसाधन विकास मंत्री और नामी वकील कपिल सिब्बल साहब का तर्क है कि उच्च शिक्षा में गुणवत्ता की कमी है। इसे देखते हुए हमारे युवा विदेशों की ओर रुख कर रहे हैं। इसलिए क्यों न विदेशी विश्वविद्यालयों की पढ़ाई अपने देश में हो? अच्छा विचार है सिब्बल साहब... बिल्कुल होनी चाहिए लेकिन हमारी समझ में नहीं आता कि देश में ही अच्छे विश्वविद्यालय क्यों नहीं खोले जाते? उच्च शिक्षा के बाबत यहां राष्ट्रीय ज्ञान आयोग की रिपोर्ट गौर करने लायक है। रिपोर्ट में आयोग ने कहा था कि देश में करीब सात फीसदी युवा ही उच्च शिक्षा तक पहुंच पाते हैं। 2015 तक इसे बढ़ाकर कम से कम 15 फीसदी किया जाना चाहिए। इसी तरह अभी विश्वविद्यालयों की तादाद 500 के करीब और इन्हें भी बढ़ाकर 1500 किया जाना चाहिए। इन तथ्यों से सरकार को कोई मतलब नहीं और सीधा फार्मूला तय किया गया कि उच्च शिक्षा के कायाकल्प के लिए विदेशी विश्वविद्यालयों को देश में उनके अपने कैंपस खोलने दिए जाएं।Thursday, March 11, 2010
आनंदियां तो रोज मरती हैं
Friday, March 5, 2010
एक गधे की आत्मकथा
Wednesday, March 3, 2010
फिदा सरकार, हुसेन का इमोशनल अत्याचार
2 मार्च की हॉट खबर थी कि मकबूल फिदा हुसेन ने कतर की नागरिकता हासिल कर ली है। नागरिकता स्वीकार करने के बाद अपने पहले इंटरव्यू में हुसैन ने कहा, 'भारत मेरी मातृभूमि है। मैं अपनी मातृभूमि से घृणा नहीं कर सकता, लेकिन भारत ने मुझे खारिज कर दिया। ऐसे में मुझे भारत में क्यों रहना चाहिए?... जब संघ परिवार ने मेरे ऊपर हमला किया तो उस समय सभी चुप्पी साधे रहे। राजनीतिक नेतृत्व, कलाकारों या बुद्धिजीवियों में से किसी ने भी मेरे पक्ष में आवाज नहीं उठाई, लेकिन मैं इस सच्चाई को जानता हूं कि भारत की 90 प्रतिशत जनता मुझे प्यार करती है।... भारत की सरकारें मेरी हिफाजत नहीं कर सकीं। इसलिए इस तरह के देश में निवास करना मेरे लिए बहुत कठिन है। राजनेताओं की नजर सिर्फ वोट पर है।'करीब-करीब ठीक कहा है हुसेन साहब आपने। बहुत गंदी है यहां की पॉलिटिक्स । मुबारक हो आपको आपका नया ठिकाना, लेकिन एक गुजारिश है आपसे। आप भारतवासियों पर इमोशनल अत्याचार न करें। किसी की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को आघात लगता है तो हमें भी बड़ी छटपटाहट होती है, लेकिन अफसोस है कि आपकी अभिव्यक्ति हमेशा दोयम दर्जे की रही है। मकबूल साहब बानगी कबूल करें-
इसे अजीब इत्तेफाक कहेंगे कि 2 मार्च को मकबूल साहब ने कतर की नागरिकता हासिल की और दो दिन पहले 28 फरवरी के जनसत्ता के एडिट पेज पर करीब-करीब तीन चौथाई हिस्से में तसलीमा नसरीन का आर्टिकल छपा। तसलीमा ने सलमान रुश्दी और हुसेन साहब के साथ उनका नाम जोड़े जाने पर गहरा क्षोभ व्यक्त किया है। बकौल तसलीमा, ''दोनों रचनाकारों के प्रति असीम श्रद्धा रखते हुए मैं कह रही हूं कि इन दोनों पुरुषों के साथ कोष्टक में मेरा नाम रखना उचित नहीं है। धर्मयुक्त, विषमतायुक्त, समान अधिकारयुक्त समाज की रचना के लिए मैं जो संघर्ष कर रही हूं, वह अगर किसी को दिखाई नहीं देता तो वह चाहे जितना बड़ा शिल्पी क्यों न हो, मेरे आदर्श के करीब आने की उसमें कोई योग्यता नहीं है''
फिदा साहब से तसलीमा का मोहभंग का कारण तो देखें- ''हुसेन के सरस्वती की नंगी तस्वीर बनाने को लेकर भारत में विवाद हुआ तो मैं स्वाभाविक रूप से चित्रकार की स्वाधीनता के पक्ष में थी। मुसलमानों में नास्तिकों की तादाद बहुत कम है। मैंने मकबूल फिदा हुसेन के चित्रों को हर जगह से खोजकर कर देखने की कि हिंदू धर्म के अलावा किसी और धर्म, खासकर अपने धर्म इस्लाम को लेकर उन्होंने कोई व्यंग्य किया है या नहीं? लेकिन देखा कि बिल्कुल नहीं किया है बल्कि कैनवास पर अरबी में शब्दश: अल्लाह लिखते हैं। हिंदुत्व पर अविश्वास के चलते ही उन्होंने लक्ष्मी और सरस्वती को नंगा चित्रित किया। क्या वे मोहम्मद को नंगा कर सकते हैं? मुझे यकीन है, नहीं कर सकते।...
हुसेन भी उन्हीं धार्मिक लोगों की तरह हैं जो अपने धर्म में तो विश्वास करते हैं लेकिन दूसरे लोगों के उनके धर्म में विश्वास की निंदा करते हैं।....
हुसेन की देश वापसी के लिए सरकार पूरी कोशिश कर रही है, मुझे न तो भारत सरकार लौटने दे रही है न बांग्लादेश सरकार।''
एक बार फिर धवलकेश हुसेन साहब को नए आशियाने की मुबारकवाद और एक बात यह कि भारत को जाकिर हुसेन से कोई घृणा नहीं, मौलाना कलाम आजाद से कोई घृणा नहीं, विस्मिल्ला खान से कोई घृणा नहीं, अहमद-मोहम्मद हुसेन से कोई घृणा नहीं, गुलाम अली और मेंहदी हसन से नहीं, अब्दुल कलाम से नहीं... जायसी-रसखान से नहीं, फिर आपसे क्यों? आप आत्ममंथन करें जनाब।
Wednesday, February 24, 2010
सचिन के कारनामे पर मुझे आश्चर्य नहीं हुआ
...तो आखिरकार सचिन ने सईद अनवर का रिकॉर्ड तोड़ ही दिया। वनडे क्रिकेट का पहला दोहरा शतक! समूचा देश खुश है, मैं भी हूं। ...लेकिन सच पूछिए तो सचिन के इस कारनामे पर मुझे आश्चर्य नहीं हुआ। यह तो होना ही था। पहले भी तो दो-तीन दफा सचिन ड्योढ़ी तक पहुंच ही गए थे। तारीख 21 मई 1997 को चेन्नई में बना सईद अनवर का जो रिकॉर्ड 24 फरवरी 2010 को ग्वालियर में टूटा, बहुत पहले टूट जाना चाहिए था। मुझे इस बात का पूरा भरोसा था कि ऐसा कारनामा सचिन जैसा खिलाड़ी ही कर सकता है। रिकॉर्ड तो बनते-टूटते रहेंगे। फिलवक्त हम सब यादगार इतिहास के साक्षी बने हैं। इसे खुशी से जी लें, इतना बहुत है।





